1समस्त प्रज्ञा प्रभु से उत्पन्न होती है, वह सदा उसके पास विद्यमान है। 2समुद्रतट के बालू-कण, वर्षा की बूॅदें और अनन्त काल के दिन कौन गिन सकता है ? आकाश की ऊॅचाई, पृथ्वी का विस्तार और महागत्र्त की गहराई कौन नाप सकता है ? 3किसने ईश्वर की प्रज्ञा का अनुसन्धान किया, जो सब से पहले विद्यमान थी? 4सबसे पहले प्रज्ञा की सृष्टि हुई थी। विवेकपूर्ण बुद्धि अनादिकाल से बनी हुई है। 5प्रज्ञा का स्त्रोत है- स्वर्ग में ईश्वर का शब्द। प्रज्ञा के मार्ग हैं- शाश्वत आदेश। 6प्रज्ञा की जड़ तक कौन पहुँचा है? उसकी बारीकियाँ कौन समझता है? 7प्रज्ञा की शिक्षा किस को मिली है? उसके विविध मार्ग कौन जानता है? 8परमश्रद्धेय प्रभु ही प्रज्ञासम्पन्न है, वह अपने सिंहासन पर विराजमान है। 9प्रभु ने ही प्रज्ञा की सृष्टि की है। उसने उसका अवलोकन एवं मूल्यांकन किया 10और उसे अपने सभी कार्यों में सन्निविष्ट किया है। उसने उसे अपनी उदारता के अनुरूप सब प्राणियों और अपने भक्तों को प्रचुर मात्रा में प्रदान किया है। 11प्रभु पर श्रद्धा महिमा और गौरव, आनन्द और उल्लास की पराकाष्ठा है। 12प्रभु पर श्रद्धा हृदय में स्फूर्ति भरती और आनन्द, प्रसन्नता एवं दीर्घ जीवन प्रदान करती हैं। 13जो प्रभु पर श्रद्धा रखता है, उसका अन्त में भला होगा, वह अपनी मृत्यु के दिन धन्य माना जायेगा। 14ईश्वर के प्रति प्रेम सम्मान्य प्रज्ञा है। 15जिन लोगों को यह वरदान मिलता है, वह उन्हें ईश्वर के दर्शन और उन से उसके महान् कार्यो की स्तुति कराता है। 16प्रज्ञा का मूल स्रोत प्रभु पर श्रद्धा है। वह भक्तों को जन्म से प्राप्त होती है। उसने अपने लिए मनुष्यों के बीच सदा के लिए अपना निवास बनाया और वह उनके वंशजों के प्रति ईमानदार रहेगी। 17प्रभु पर श्रद्धा ज्ञानसम्मत धार्मिकता है। 18धार्मिकता हृदय को सुरक्षित रखेगी 19और उसे प्रसन्नता एवं आनन्द प्रदान करेगी। 20प्रभु पर श्रद्धा प्रज्ञा की परिपूर्णता है; वह अपने फलों से मनुष्यों को तृप्त करती है। 21वह उनके घर बहुमूल्य वस्तुओं से और उनके बखार उपज से भर देती है। 22प्रभु पर श्रद्धा प्रज्ञा का मुकुट है, उसके द्वारा शान्ति और स्वास्थ्य की वृद्धि होती है। 23दोनो ईश्वर के वरदान हैं। 24प्रज्ञा वर्षा की तरह ज्ञान और विवेक बरसाती है; जो उस से सम्पन्न हैं, वह उनके यष की वृद्धि करती है। 25प्रभु पर श्रद्धा प्रज्ञा की जड़ है, उसकी शाखाऍॅ लम्बी आयु है। 26प्रज्ञा के भण्डार में विवेक और ज्ञानसम्मत धार्मिकता है; उसका तिरस्कार पापियों की समझदारी है। 27प्रभु पर श्रद्धा पाप हरती और जब तक वह विद्यमान है, (प्रभु का) क्रोध दूर करती है। 28जो अकारण क्रोध करता है, वह दोषी है; क्रोध का आवेग उसके विनाश का कारण बनता है। 29धैर्यवान् तब तक दुःख सहता है, जब तक उसके हृदय में आनन्द का विकास नहीं होता। 30वह तब तक अपने विचार प्रकट नहीं करता, जब तक बहुत-से लोग उसके विवेक की चरचा न करें। 31प्रज्ञा के भण्डार में ज्ञानपूर्ण सूक्तियाँ हैं, 32किन्तु पापी भक्ति से घृणा करता है। 33पुत्र! यदि तुम प्रज्ञा चाहते हो, तो आज्ञाओें का पालन करो और प्रभु उसे तुम को प्रदान करेगा। 34प्रभु की श्रद्धा प्रज्ञा और अनुशासन में निहित है। 35निष्ठा और विनम्रता प्रभु को प्रिय हैं। 36प्रभु पर श्रद्धा का विरोध नहीं करो, कपटपूर्ण हृदय से उसके पास नहीं जाओ। 37मनुष्यों के सामने पाखण्डी मत बनो अपने शब्दों पर नियन्त्रण रखो। 38घमण्डी मत बनो; नहीं तो तुम्हारा पतन होगा और तुम पर कलंक लगेगा; 39ईश्वर तुम्हारे गुप्त कार्य प्रकट करेगा और तुम को भरी सभा में नीचा दिखायेगा; 40क्योंकि तुम में ईश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं है और तुम्हारा हृदय कपट से भरा है।