प्रवक्ता

अध्याय 2

1पुत्र! यदि तुम प्रभु की सेवा करना चाहते हो, तो विपत्ति का सामना करने को तैयार हो जाओ। 2तुम्हारा हृदय निष्कपट हो, तुम दृढ़संकल्प बने रहो, विपत्ति के समय तुम्हारा जी नही घबराये। 3ईश्वर से लिपटे रहो, उसे मत त्यागो, जिससे अन्त में तुम्हारा कल्याण हो। 4जो कुछ तुम पर बीतेगा, उसे स्वीकार करो तथा दुःख और विपत्ति में धीर बने रहो; 5क्योंकि अग्नि में स्वर्ण की परख होती है और दीन-हीनता की घरिया में ईश्वर के कृपापात्रों की। 6ईश्वर पर निर्भर रहो और वह तुम्हारी सहायता करेगा। प्रभु के भरोसे सन्मार्ग पर आगे बढ़ते जाओ। 7प्रभु के श्रद्धालु भक्तो! उसकी दया पर भरोसा रखो। मार्ग से मत भटको; कहीं पतित न हो जाओ। 8प्रभु के श्रद्धालु भक्तों! उस पर भरोसा रखो और तुम्हें निश्चय ही पुरस्कार मिलेगा। 9प्रभु के श्रद्धालु भक्तो! उसके उपकारों की, चिरस्थायी आनन्द और दया की प्रतीक्षा करो। 10प्रभु के श्रद्धालु भक्तों! उस से प्रेम रखो और तुम्हारे हृदयों में प्रकाश का उदय होगा। 11पिछली पीढ़ियों पर विचार कर देखो किसने ईश्वर पर भरोसा रखा और वह निराश हुआ? 12किसने ईश्वर पर श्रद्धा रखी और वह परित्यक्ता हुआ? किसने ईश्वर से प्रार्थना की और वह उपेक्षित रहा? 13क्योंकि ईश्वर अनुकम्पा और दया से परिपूर्ण है। वह पापों को क्षमा करता और संकट के दिन में हमें बचाता है। 14धिक्कार कायर हृदयों, निष्क्रिय हाथों और उस पापी को, जो दो मार्गो पर चलता है! 15धिक्कार निरूत्साह हृदय को, जो भरोसा नहीं रखता! इसलिए उसकी रक्षा नहीं की जायेगी! 16धिक्कार तुम लोगों को, जो धैर्य खो चुके हो! 17तुम क्या करोगे, जब प्रभु लेखा लेने आयेग? 18जो प्रभु पर श्रद्धा रखते हैं, वे उसकी आज्ञाओें की अवज्ञा नहीं करते। जो उससे प्रेम रखते हैं, वे उसके मार्गो पर चलते हैं। 19जो प्रभु पर श्रद्धा रखते हैं, वे वही करते हैं, जो उसे प्रिय है। जो उस से प्रेम रखते हैं, उसकी संहिता उनका सम्बल है। 20जो प्रभु पर श्रद्धा रखते हैं, उनका हृदय प्रस्तुत रहता है। वे उसके सामने अपनी आत्मा को पवित्र करते हैं। 21जो प्रभु पर श्रद्धा रखते हैं, वे उसकी आज्ञाओें का पालन करते हैं और उसके आगमन के दिन तक धैर्य रखेंगे। 22वे कहते हैं, "हम मनुष्यों के हाथों नहीं, बल्कि प्रभु के हाथ पड़ जायेंगे; 23क्योंकि वह जितना महान् है, उतना ही दयालु भी"।