प्रवक्ता

अध्याय 7

1बुराई मत करो और बुराई तुम पर हावी नहीं होगी। 2अन्याय से दूर रहो और वह तुम्हारे पास नहीं फटकेगा। 3पुत्र! अधर्म के कूँड़ों में बीज न बोओ, तो उसकी सात गुनी फसल नहीं लुनोगे। 4तुम न तो प्रभु से अधिकार माँगो और न राजा से सम्मान का आसन। 5तुम न तो प्रभु के सामने धार्मिकता का और न राजा के सामने प्रज्ञा का स्वाँग भरो। 6न्यायाधीश बनने का प्रयत्न मत करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम अन्याय नहीं दूर कर सको या डर के मारे शासक का पक्ष लो और अपने ईमान पर कलंक लगाओ। 7नगर-सभा के विरुद्ध पाप मत करो और भीड़ की दृष्टि में कलंकित मत बनो। 8एक ही पाप में दो बार मत फॅसो, क्योंकि एक के दण्ड से भी नहीं बचोगे। 9प्रार्थना करते समय माँगने में संकोच मत करो। 10याचना और भिक्षादान की उपेक्षा मत करो। 11यह मत कहो, "ईश्वर मेरे बहुसंख्यक चढ़ावों पर ध्यान देगा। जब मैं प्रभु को चढ़ावे अर्पित करूँगा, तो वह उन्हें स्वीकार करेगा।" 12दुःखी मनुष्य का उपहास मत करो, क्योंकि ईश्वर नीचा भी दिखाता और ऊपर भी उठाता है। 13अपने भाई के विरुद्ध झूठी बातों का प्रचार मत करो और अपने मित्र के साथ भी ऐसा मत करो। 14हर समय झूठ मत बोलो, इस से कोई लाभ नहीं होता। 15बड़े-बूढ़ों की सभा में बकवास मत करो और प्रार्थना करते समय रट मत लगाओे। 16कठोर परिश्रम से घृणा मत करो और न खेती-बारी से, जो सर्वोच्च प्रभु द्वारा निर्धारित है। 17पापियों की संगति मत करो। 18याद रखो कि क्रोध में देर नहीं होगी। 19अपने को बहुत विनम्र बनाये रखो; क्योंकि विधर्मी को आग और कीड़ों से दण्डित किया जायेगा। 20रुपये-पैसे के लिए अपने मित्र को न बेचो और न ओफ़िर के सोने के लिए सच्चे भाई को। 21समझदार और साध्वी पत्नी का परित्याग मत करो, क्येांकि वह स्वर्ण से भी अधिक वांछनीय है। 22ईमानदार नौकर के साथ दुव्र्यवहार मत करो और न उस मजदूर के साथ, जो पूरी लगन से काम करता है। 23तुम बुद्धिमान् दास को अपने समान प्यार करो और उसे मुक्त करना अस्वीकार मत करो। 24यदि तुम्हारे पशु हो, तो उनकी देखरेख करो। यदि उन से लाभ है, तो उन्हें अपने पास रखो। 25यदि तुम्हारे पुत्र हों, तो उन्हें शिक्षा दिलाओ और बचपन से ही उन्हें अनुशासन में रखो। 26यदि तुम्हारी पुत्रियाँ हों, तो उनकी रक्षा करो और उनके साथ ढिलाई मत करो। 27अपनी पुत्री के विवाह का प्रबन्ध करो यह एक महत्वपूर्ण कार्य है। किन्तु उसे एक समझदार व्यक्ति को सौंपो। 28यदि तुम्हारी पत्नी मनपसन्द है, तो उसका परित्याग मत करो। यदि वह तुम को पसन्द नहीं है, तो उस पर विश्वास मत करो। 29सारे हृदय से अपने पिता का आदर करो और अपनी माता का दुःख मत भुलाओ। 30याद रखो कि तुम्हें उन से जन्म मिला; उनके उपकार का बदला कैसे दे सकते हो ? 31सारे हृदय से प्रभु पर श्रद्धा रखो और उसके याजकों का आदर करो। 32अपने सृष्टिकर्ता को अपनी सारी शक्ति से प्यार करो। और उसके सेवकों को निराश मत करो। 33सारे हृदय से ईश्वर का आदर करो और याजको का सम्मान करो। 34प्रज्ञा के अनुसार उन्हें उनका भाग दो: प्रथम फल, प्रायश्चित-बलि, स्कन्धभाग, 35समर्पण-बलि और पवित्र चढ़ावों के प्रथम फल। 36हाथ बढ़ा कर दरिद्र को दान दो, जिससे तुम्हें अशीर्वाद प्राप्त हो। 37सब जीवितों के प्रति उदार बनो, मृतकों को अपने दान से वंचित मत करो। 38रोने वालों को सान्त्वना दो और शोक मनाने वालों के साथ शोक मनाओ। 39बीमारों से मिलने में लापरवाही मत करो। इससे तुम लोकप्रिय बनोगे। 40सब बातों में अपनी अन्तगति याद रखो और तुम जीवन भर पाप नहीं करोगे।