1अधर्मी पुत्रों के कारण आनन्द मत मनाओे। यदि वे ईश्वर पर श्रद्धा नहीं रखते, तो उनकी बढ़ती संख्या पर प्रसन्न मत हो। 2उनकी लम्बी आयु का भरोसा मत करो और उनकी संख्या पर निर्भर मत रहो। 3हज़ार अधर्मी पुत्रों की अपेक्षा एक भक्त पुत्र अच्छा है। 4अधर्मी पुत्रों की अपेक्षा निस्सन्तान मरना अच्छा है। 5एक समझदार व्यक्ति से नगर की रक्षा होती है, किन्तु दुष्टों की पीढ़ी नष्ट हो जायेगी। 6मैंने यह सब अपनी आँखो से बार-बार देखा और इससे अधिक प्रभावकारी उदाहरण सुने। 7पापियों की सभा में आग प्रज्वलित होती है और विद्रोही भीड़ के विरुद्ध कोप भड़कता है। 8प्रभु ने भीमकाय लोगों को क्षमा नहीं किया, जिन्होंने अपनी शक्ति के बल पर विद्रोह किया था। 9उसने लोट के नगर की रक्षा नहीं की; क्योंकि उसे उसके घमण्ड से घृणा थी। 10उसने विनाश की प्रजाति पर दया नहीं की; वह अपने पापों के कारण नष्ट की गयी। 11उसने छः लाख पैदल सैनिकों के साथ वही किया, जिन्होंने हठपूर्वक उस से विद्रोह किया था। यदि केवल एक ही हठीला विद्रोही हुआ होता और वह बच गया होता, तो बड़े आश्चर्य की बात होती; 12क्योंकि उसके पास दया और क्रोध है; वह बड़ा दयालु है, किन्तु अपने क्रोध को भी भड़कने देता है। 13उसकी दया जितनी बड़ी है, उतनी ही महान् है उसकी डाँट। वह कर्मों के अनुसार मनुष्यों का न्याय करता है। 14पापी अपनी लूट के साथ नहीं भाग सकेगा और धर्मी की आशा पूर्ण हो जायेगी। 15जो भलाई करता है, उसे पुरस्कार मिलेगा और सब को अपने कर्मों का फल दिया जायेगा। प्रभु ने फिराउन का हृदय कठोर बना दिया; जिससे वह प्रभु को नहीं पहचाने और प्रभु के कार्य सर्वत्र सम्पन्न हों। सारी सृष्टि पर प्रभु की कृपा प्रकट हो गयी है। उसने प्रकाश और अन्धकार, दोनों को मनुष्यों में बाँट दिया। 16यह मत कहो, "मैं प्रभु के सामने से छिप जाऊँगा, वहाँ आकाश में मुझे कौन याद करेगा? 17अपार भीड़ में मुझे कौन पहचानेगा? समस्त सृष्टि में मैं क्या हूँ? 18प्रभु के आगमन पर आकाश, सर्वोच्च आकाश, महागत्र्त और पृथ्वी सब-के-सब हिलाये जायेंगे। 19जब प्रभु उन पर दृष्टि डालेगा, तो पर्वत और पृथ्वी के आधार डर के मारे काँप उठेंगे। 20फिर भी वह मुझ पर ध्यान नहीं देता। मेरे मार्ग का निरीक्षण कौन करेगा? 21जब मैं पाप करता, तो काई नहीं देखता; जब मैं गुप्त में अपराध करता, तो कौन जानता है? 22कौन भले कामों की चरचा करता है? कौन उनकी प्रतीक्षा करता है? न्याय का दिन दूर है।" 23ये नासमझ के विचार हैं, अविवेकी ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें सोचता है। 24पुत्र! मेरी बात सुनो और ज्ञान ग्रहण करो। 25मैं तुम केा सन्तुलित शिक्षा प्रदान करूँगा और अपना ज्ञान अच्छी तरह समझाऊँगा। मेरी बातों में मन लगाओ। 26प्रभु ने प्रारम्भ से अपने कार्य सम्पन्न किये और प्रत्येक कृति का अपना स्थान निर्धारित किया। 27उसने सदा के लिए उनका कार्यक्षेत्र निश्चित किया और उनकी अपनी प्रकृति के अनुसार उन को अधिकार दिया। 28उन्हें न तो भूख लगती और न थकावट होती, वे अपने कार्य नहीं छोड़तीं। 29कोई न तो उसकी निकटवर्ती कृति से टकराती और न उसके आदेश की अवज्ञा करती। 30इसके बाद प्रभु ने पृथ्वी पर दृष्टि डाली और उसे अपने बरदानों से भर दिया। 31उसने पृथ्वीतल हर प्रकार के प्राणियों से भर दिया और उन्हें उसी में लौटना होगा।