1प्रभु ने मिट्टी से मनुष्य को गढ़ा। उसने उसे अपना प्रतिरूप बनाया। 2वह उसे फिर मिट्टी में मिला देता है। उसने उसे अपने सदृश शक्ति प्रदान की। 3उसने मनुष्यों की आयु की सीमा निर्धारित की और उन्हें पृथ्वी की सब वस्तुओं पर अधिकार दिया। 4उसने सब प्राणियों में मनुष्य के प्रति भय उत्पन्न किया और उसे सब पशुओं तथा पक्षियों पर अधिकार दिया। 5उसने मनुष्यों को बुद्धि, भाषा, आँखें तथा कान दिये और विचार करने का मन भी। 6उसने उन्हें विवेक से सम्पन्न किया और भलाई तथा बुराई की पहचान से। 7उसने उनके मन की आँखों को ज्योति प्रदान की, जिससे वे उसके कार्यों की महिमा देख सकें 8और उसके पवित्र नाम का स्तुतिगान एवं महिमामय कार्यों का बखान करें। 9उसने उन्हें ज्ञान का वरदान और जीवनप्रद नियम दिया। 10उसने उनके लिए चिरस्थायी विधान निर्धारित किया और उन्हें अपनी आज्ञाओें की शिक्षा दी। 11उनकी आँखों में उसके महिमामय ऐश्वर्य को देखा और उनके कानों ने उनकी महिमामय वाणी सुनी। उसने उन से यह कहा, "हर प्रकार की बुराई से दूर रहो"। 12उसने प्रत्येक को दूसरों के प्रति कर्तव्य सिखाया। 13मनुष्य जो कुछ करता है, वह सदा उसके लिए प्रकट है और उसकी आँखों से छिपा हुआ नहीं रह सकता। 14उसने प्रत्येक राष्ट्र के लिए एक शासक नियुक्त किया, 15किन्तु इस्राएल प्रभु की विरासत है। 16मनुष्यों के सभी कार्य दिन के प्रकाश की तरह प्रभु के सामने प्रकट है; वह उनके मार्गों पर निरन्तर दृष्टि दौड़ाता है। 17उनका अधर्म उस से छिपा नहीं है; उनके सभी पाप प्रभु के सामने हैं। 18मनुष्य का भिक्षादान मुहर की तरह उसकी रक्षा करता है। प्रभु मनुष्य का परोपकार आँख की पुतली की तरह सुरक्षित रखता है। 19वह अन्त में उठ कर उन्हें प्रतिफल प्रदान करेगा। वह उनका पुरस्कार उनके सिर पर रख देगा। 20ईश्वर पश्चात्ताप करने वालों को अपने पास लौटने देता और निराश लोगों केा ढ़ारस बँधाता है। 21पाप छोड़ कर सर्वोच्च ईश्वर के पास लौट जाओ। 22उस से प्रार्थना करो और उसे अप्रसन्न मत किया करो। 23अन्याय छोड़ कर सर्वोच्च ईश्वर के पास लौट जाओ और अधर्म से अत्यधिक घृणा करो। 24ईश्वर का न्यायोचित निर्णय पहचान लो और सर्वोच्च प्रभु से विनय और प्रार्थना करो। 25यदि जीवित लोग ईश्वर का धन्यवाद नहीं करते, तो अधोलोक में कौन उसका स्तुतिगान करेगा? 26अधर्मियों की भ्रान्ति में मत रहो और मृत्यु से पहले प्रभु की स्तुति करो। जो मर चुका है, वह प्रभु का स्तुतिगान नहीं करता। 27जो जीवित और सकुशल है, वही प्रभु को धन्य कहता है। जीवित और सकुशल रहते हुए प्रभु को धन्य कहो। प्रभु की स्तुति करो और उसकी दया पर गौरव करो। 28कितनी महान् है ईश्वर की दया और उसके पास लौटने वालों के लिए उसकी क्षमाशीलता! 29सब कुछ मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है, क्येांकि मनुष्य अमर नहीं है। 30सूर्य से अधिक प्रकाशमय क्या है? किन्तु उस पर भी ग्रहण लग जाता है। रक्त-मांस का मनुष्य तो बुराई की बात सोचता है। 31ईश्वर विश्वमण्डल पर दृष्टि दौड़ाता है, किन्तु मनुष्य मिट्टी और राख मात्र है।