1मैं तीन बातें पसन्द करता हूँ; वे प्रभु और मनुष्यों को प्रिय हैं: 2भाइयों का मित्रभाव, पड़ोसी का प्रेम और पति-पत्नी का सामंजस्य। 3मेरा हृदय तीन प्रकार के लोगों से घृणा करता है और मुझे उनके आचरण से चिढ़ है: 4घमण्डी दरिद्र, मिथ्यावादी धनी और मूर्ख एवं व्यभिचारी बूढ़ा। 5तुमने युवावस्था में जो इकट्ठा नहीं किया, उसे वृद्धावस्था में कैसे पाओेगे? 6कितना अच्छा लगता है, जब पके बाल न्याय करते और बूढ़े परामर्श देते हैं! 7कितना अच्छा लगता है, जब बूढ़ों में प्रज्ञा हेाती है और प्रतिष्ठित लोगों में विवेक और सत्यपरामर्श! 8प्रचुर अनुभव वृद्धों का मुकुट है और प्रभु पर श्रद्धा उनका गौरव। 9मैं अपने मन में नौ बातों की प्रशंसा करता हूँ और दसवीं की भी चरचा करूँगा: 10वह मनुष्य, जिसे अपने बच्चों में आनन्द आता है; वह, जो अपने जीवनकाल में अपने शत्रुओें का पतन देखता है; 11धन्य है वह, जिसके एक समझदार पत्नी है, वह, जो बैल और गधे के जोड़े से नहीं जोतता, वह, जो अपनी जीभ से पाप नहीं करता, वह, जिसे अपने से छोटे मनुष्य की नौकरी नहीं करनी पड़ती! 12धन्य है वह, जिसे सच्चा मित्र प्राप्त है और वह, जो ध्यान से सुनने वालों को सम्बोधित करता है! 13वह कितन महान् है, जिसे प्रज्ञा और ज्ञान प्राप्त है! किन्तु जो प्रभु पर श्रद्धा रखता, उस से महान् कोई नहीं! 14प्रभु पर श्रद्धा सर्वश्रेष्ठ है। 15जिसे वह प्राप्त है, उसकी तुलना किसी से नहीं हो सकती। 16भक्ति प्रभु पर श्रद्धा से प्रारम्भ होती है, किन्तु मनुष्य विश्वास द्वारा प्रभु से संयुक्त हो जाता है। 17हृदय के दुःख के बराबर कोई दुःख नहीं। स्त्री की बुराई के बराबर कोई बुराई नहीं। 18हृदय के घाव के बराबर कोई घाव नहीं। 19स्त्री की दुष्टता के बराबर कोई दुष्टता नहीं। 20बैरियों द्वारा दिये गये कष्ट के बराबर कोई कष्ट नहीं। 21शत्रुओं के प्रतिशोध के बराबर कोई प्रतिशोध नहीं। 22साँप के विष के बराबर कोई विष नहीं। 23स्त्री के क्रोध के बराबर कोई क्रोध नहीं। दुष्ट पत्नी के साथ रहने की अपेक्षा मैं सिंह और पंखदार सर्प के साथ रहना अधिक पसन्द करूँगा। 24स्त्री की दुष्टता उसकी आकृति बदल देती और उसका चेहरा रीछनी की तरह काला बना देती है। 25उसका पति पड़ोसियों के बीच बैठ कर अनजान में आह भरता है। 26स्त्री की दुष्टता की तुलना में हर दुष्टता छोटी है। उसे पापियों की गति प्राप्त हो! 27शान्तिप्रिय पति के लिए बकवादी पत्नी बूढे़ के पैरों के लिए रेत के चढ़ाव के समान है। 28स्त्री के सौन्दर्य के जाल में मत फँसो और स्त्री का लालच मत करो। 29यदि पत्नी पति का भरण-पोषण करती है, 30तो यह पति के लिए कठोर दासता और कलंक है। 32पति के निष्क्रिय हाथ और काँपते पैर यह उस पत्नी का कार्य है, जो अपने पति को सुख नहीं देती। 33स्त्री के द्वारा पाप का प्रारम्भ हुआ था, हम सब उसी के कारण मर जाते हैं। 34पानी नहीं बहने दो और दुष्ट पत्नी को बोलने की छूट मत दो। 35यदि वह तुम्हारे हाथ के संकेत पर नहीं चलती, तो तुम को अपने शत्रुओं के सामने लज्जित होना पड़ेगा। 36तुम उस से अलग हो जाओ और उसे उसके अपने घर भेज दो।