1साध्वी स्त्री का पति धन्य है! उसकी आयु दुगुनी हो जाती है। 2सुयोग्य पत्नी अपने पति को आनन्दित करती है, वह अपने जीवन का पूरा समय शान्ति में बिताता है। 3साध्वी पत्नी ईश्वर का वरदान है, वह ईश्वर-भक्तों को ही प्राप्त होती है। 4वे धनी हों या दरिद्र, किन्तु दोनों संतुष्ट हैं और उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है। 5मेरा हृदय तीन बातों से काँप जाता है और मैं चैथी से डरता हूँ: 6नगर में बदनामी, उत्तेजित भीड़ 7और झूठा दोषारोपण- ये सब मृत्यु से भी बदतर हैं ; 10दुष्ट पत्नी ढीले जूए की तरह दुःखदायी है। जो उस पर नियन्त्रण रखना चाहता, वह मानो हाथ से बिच्छू उठाता है। 11मदिरा पीने वाली पत्नी घृणा उत्पन्न करती है, वह अपना कलंक नहीं छिपा सकेगी। 12निर्लज्ज आँखों और कनखियों से व्यभिचारिणी पत्नी पहचानी जा सकती है। 13चंचल पत्नी पर सख्त निगरानी रखो। वह अवसर पाते ही उस से लाभ उठाती है। 14उसकी निर्लज्ज आँखों से सावधान रहो। जब वह तुम्हारे साथ विश्वासघात करे, तो आश्चर्य मत करो। 15वह प्यासे यात्री की तरह मुँह खोल कर अपने पड़ोस का हर पानी पीती है। वह तम्बू की हर खूँटी के सामने बैठती और वाण निकालने के लिए अपना तरकष खोलती है। 16पत्नी का लावण्य पति को मोहित करता है। 17उसकी कार्यकुशलता उसे सुस्वस्थ बनाती है। 18कम बोलने वाली पत्नी ईश्वर का वरदान है। सुशिक्षित पत्नी अमूल्य है। 19शालीन पत्नी का लावण्य असीम है। 20जो साध्वी है, उसका मूल्य अपार है। 21सुव्यवस्थित घर में साध्वी का सौन्दर्य ईश्वर के पर्वत पर उदीयमान सूर्य के सदृश है। 22उसके सुस्वस्थ शरीर पर उसके मुख का सौन्दर्य पवित्र दीपवृक्ष पर चमकते हुए दीपक की तरह शोभायमान है। 23उसकी सुदृढ़ एड़ियों पर उसके सुन्दर पैर चाँदी की पीठिका पर स्वर्ण खम्भों की तरह शोभायमान है। 24साध्वी पत्नी के हृदय में ईश्वर की आज्ञाएँ सुदृढ़ आधार पर शाश्वत नींव की तरह संस्थापित है। 25दो बातें मेरा दिल दुखाती हैं और तीसरी मुझ में क्रोध उत्पन्न करती है: 26सैनिक, जो दरिद्र बनता है, समझदार व्यक्ति, जिसका तिरस्कार किया जाता है 27और सद्धर्मी, जो पाप की ओर झुकता है; प्रभु उसे तलवार का शिकार बनने देगा। 28व्यापारी शायद ही अपराध से बच सकेगा और दुकानदार पाप से मुक्त नहीं रहेगा।