प्रवक्ता

अध्याय 33

1जो प्रभु पर श्रद्धा रखता, उस पर विपत्ति नहीं पड़ेगी। प्रभु हर संकट में उसकी रक्षा करेगा और उसे सब बुराईयों से बचायेगा। 2प्रज्ञासम्पन्न व्यक्ति आज्ञाओें और धर्माचरण से घृणा नहीं करता; वह आँधी में जहाज की तरह हचकोले नहीं खाता। 3समझदार व्यक्ति प्रभु के वचन पर निर्भर रहता और संहिता को देववाणी समझता है। 4अपने भाषण की तैयारी करो और लोग तुम को ध्यान से सुनेंगे। प्राप्त ज्ञान पर विचार करने के बाद ही उत्तर दो। 5मूर्ख का हृदय गाड़ी के पहिये-जैसा है और उसका चिन्तन घूमती धुरी-जैसा। 6उपहास करने वाला मित्र उस सवारी घोड़े जैसा है, जो हिनहिनाता है, जब कोई उस पर सवार होता है। 7कोई दिन किसी दूसरे दिन से अधिक महत्व क्यों रखता है, जबकि वर्ष भर के दिन सूर्य से ही प्रकाश पाते हैं? 8प्रभु की प्रज्ञा उन में अन्तर उत्पन्न करती है। 9उसने विभिन्न ऋतुएँ और पर्व निर्धारित किये। 10उसने कुछ दिनों को महत्व दे कर पवित्र किया और कुछ को साधारण दिनों की श्रेणी में रखा। मिट्टी से सब मनुष्यों की उत्पत्ति हुई और पृथ्वी से आदम की सृष्टि हुई। 11प्रभु ने अपनी अपार प्रज्ञा से उन्हें असमान बनाया और उनके लिए भिन्न-भिन्न मार्ग निर्धारित किये। 12उसने कुछ को आशीर्वाद दिया और महान् बनाया, कुछ को पवित्र किया और अपने निकट आने दिया और कुछ को अभिशाप दिया, नीचा दिखाया और उनके स्थान से उन्हें गिराया। 13जैसे कुम्हार अपने हाथ से मिट्टी गढ़ता और अपनी इच्छा के अनुसार उसे आकार देता है, 14वैसे ही सृष्टिकर्ता का हाथ मनुष्य को अपने निर्णय के अनुसार बनाता है। 15जिस तरह बुराई और भलाई में, मृत्यु और जीवन में विरोध होता है, उसी तरह सद्धर्मी और पापी में। इस प्रकार सर्वोच्च प्रभु की सब कृतियों में परस्पर-विरोधी दो-दो तत्व देखो। 16मैं तो सब के बाद जागा और अंगूर तोड़ने वाले के पीछे अंगूर बटोरता हूँ; 17किन्तु प्रभु के आशीर्वाद से मैं आगे बढ़ा और दूसरों की तरह मैंने अपना अंगूर कुण्ड भर दिया। 18यह समझो कि मैंने अपने लिए ही नहीं, बल्कि उन सब के लिए परिश्रम किया, जो शिक्षा की खोज में लगे रहते हैं। 19प्रजा के शासको! मेरी बात सुनो, सभा के नेताओें! ध्यान दो। 20तुम अपने जीवनकाल में किस को अपने ऊपर अधिकार मत दो- न तो अपने पुत्र को, न अपनी पत्नी, अपने भाई और अपने मित्र को। किसी दूसरे को अपनी सम्पत्ति मत दो। कहीं ऐसा न हो कि तुम को पछता कर उसे वापस माँगना पड़े। 21जब तक जीते और साँस लेते हो, किसी को अपने ऊपर हावी न हेाने दो। 22अपने पुत्रों की इच्छा पर निर्भर रहने की अपेक्षा यही अच्छा है कि तुम्हारे पुत्र तुम से माँगें। 23अपने सभी कार्य अच्छी तरह सम्पन्न करो। 24अपने नाम पर कलंक न लगने दो जब तुम्हारे अन्तिम दिन आ गये और तुम्हारी मृत्यु की घडी आ पहुँची, तो अपनी विरासत बाँट दो। 25गधे के लिए चारा, लाठी और बोझ; दास के लिए रोटी, दण्ड और परिश्रम। 26नौकर को काम में लगाओे ओर तुम को आराम मिलेगा। उसके हाथ ढीले पड़ने दो और वह मुक्त होना चाहेगा। 27जूआ और लगाम गर्दन झुकाती है। कठोर परिश्रम नौकर को अनुशासन में रखता है। 29आलस्य अनेक बुराईयों की जड़ है। 30उसे ऐसे काम में लगाओ, जो उसके योग्य हो। यदि वह आज्ञा नहीं मानता, तो उसे बेड़ियाँ पहनाओ, किन्तु किसी से औचित्य से अधिक काम मत लो और किसी के साथ अन्याय मत करो। 31यदि तुम्हारे एक नौकर हो, तो उसे अपने जैसा समझो; क्योंकि तुम को अपनी-जैसी उसकी आवश्यकता है। यदि तुम्हारे एक नौकर हो, तो उसके साथ भाई-जैसा व्यवहार करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम अपने रक्तबन्धु पर क्रोध करो। 32यदि तुम उसके साथ अन्याय करोगे, तो वह तुम को छोड़ कर भाग जायेगा। 33यदि वह भाग कर चला जाता, तो तुम उसे कहाँ ढूँढ़ोगे?