1व्यर्थ आशा नासमझ व्यक्ति को धोखा देती है और स्वप्नों के कारण मूर्खों का सिर फिर जाता है। 2जो स्वप्नों का ध्यान रखता, वह मानो छाया पकड़ता या हवा का पीछा करता है। 3स्वप्न में छाया मात्र दिखाई देता है, जैसे मुख के सामने दर्पण में उसका प्रतिबिम्ब। 4क्या दूषण से पवित्रता और झूठ से सत्य निकल सकता है? 5भविष्य-फल, शकुन और स्वप्न- ये सब व्यर्थ 6और प्रसव-पीड़िता की कल्पनाएँ मात्र है। यदि स्वप्न सर्वोच्च प्रभु द्वारा न भेजा गया हो, तो उस पर कोई ध्यान मत दो। 7स्वप्नों के कारण बहुत-से लोग भटक गये और उन पर भरोसा रख कर निराश हुए। 8इन झूठी बातों के बिना संहिता प्रमाणित है और ईमानदार व्यक्ति के मुख में प्रज्ञा की परिपूर्णता है। 9जिसने दूर की यात्रा की है, उसने बहुत सीख लिया ओैर जो अनुभवी है, वह ज्ञान की बातें कहता है। 10(10-11) जिसे अनुभव नहीं, वह कम जानता है, किन्तु जिसने यात्रा की है, वह व्यवहार कुशल है। 12मैंने अपनी यात्राओें में बहुत कुछ देखा और बहुत-सी बातोें का ज्ञान प्राप्त किया है। 13मुझे कई बार जीवन की जोखिम का सामना करना पड़ा, किन्तु मैं अपने अनुभव के कारण बच गया। 14जो प्रभु पर श्रद्धा रखते हैं, उनकी आयु लम्बी होगी और उन्हें प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त होगा; 15क्योंकि उन्हें उसका भरोसा है, जो उनकी रक्षा करने में समर्थ है। प्रभु की आँखें अपने भक्तों पर टिकी रहती है। 16जो प्रभु पर श्रद्धा रखता, वह किसी से नहीं डरता। वह कभी नहीं घबराता, क्योंकि उसे प्रभु का भरोसा है। 17जो प्रभु पर श्रद्धा रखता, उसकी आत्मा धन्य है। 18वह किस पर निर्भर रहता है? उसे कौन सँभालता है? 19जो लोग प्रभु पर श्रद्धा रखते हैं, उन पर प्रभु की आँखे टिकी रहती है। प्रभु पक्की ढाल, सुदृढ़ आधार, लू से आश्रय, दोपहर की धूप से छाया है। 20वह ठोकर खाने से बचाता और गिरने वालों की सहायता करता है। वह आत्मा को ऊपर उठता और आँखों को ज्योति प्रदान करता है। 21जो प्रभु पर भरोसा रखते हैं, वह उन्हें सत्य और धर्म के मार्ग पर ले चलता है। 22अन्याय की कमाई का चढ़ावा दूषित है। पापियों की भेटें प्रभु को ग्राह्य नहीं होती। 23सर्वोच्च प्रभु को पापियों के चढ़ावे प्रिय नहीं होते, वह बलिदानों की बहुलता के कारण पाप क्षमा नहीं करता। 24जो दरिद्रों की सम्पत्ति से बलिदान चढ़ाता है, वह उस व्यक्ति-जैसा है, जो पिता की आँखों के सामने उसके पुत्र का वध करता है। 25भीख की रोटी से दरिद्र का निर्वाह होता है। जो उसे छीनता है, वह रक्तपात करता है। 26जो अपने पड़ोसी की जीविका छीनता है, वह मानो उसका वध करता है, 27जो मजदूर का वेतन दबाता है, वह हत्यारे के बराबर है। 28एक निर्माण करता और दूसरा ढा देता है। उस से क्या लाभ? दोनों ने व्यर्थ परिश्रम किया। 29एक आशीर्वाद और दूसरा अभिशाप देता है। ईश्वर को किसकी बात माननी चाहिए? 30कोई शव स्पर्श कर नहाता और फिर शव स्पर्श करता है, तो उसे नहाने से क्या लाभ? 31यही उस व्यक्ति की दशा है, जो अपने पापों के लिए अनषन करता है और उसके बाद जा कर फिर वहीं पाप करता है।