1चिकित्सक का सम्मान करो, तुम को उसकी आवश्यकता है। सर्वोच्च प्रभु ने उसकी भी सृष्टि की है। 2सर्वोच्च प्रभु से स्वास्थ्यलाभ होता और राजा की ओर से चिकित्सक को उपहार मिलता है। 3चिकित्सक का उसके विज्ञान के कारण सम्मान किया जाता और बडे़ लोग उसकी प्रशंसा करते हैं। 4प्रभु पृथ्वी से जड़ी-बूटियाँ उत्पन्न करता है और समझदार व्यक्ति उनकी उपेक्षा नहीं करता। 5क्या पानी लकड़ी द्वारा मीठा नहीं बना, 6जिससे मनुष्य प्रभु का सामर्थ्य पहचान सके? 7उसने मनुष्यों को विज्ञान प्रदान किया है, जिससे वे उसके चमत्कारों के कारण प्रभु की महिमा करें। 8चिकित्सक जड़ी-बूटियों द्वारा पीड़ा दूर करता हैं। भेषजज्ञ उनका मिश्रण तैयार करता है, जिससे प्रभु की कृतियाँ नष्ट न हों। 9पुत्र! अपनी बीमारी में लापरवाह न बनो; प्रभु से प्रार्थना करो और वह तुम्हें स्वास्थ्य प्रदान करेगा। 10अपने अपराधों पर पश्चात्तप करो, अपने हाथ निर्दोष रखो और अपना हृदय हर पाप से शुद्ध रखो। 11सुगन्धयुक्त धूप एवं अन्न-बलि चढ़ाओे और शक्ति भर तेल का अर्पण करो। चिकित्सक को निवास दो, 12क्योंकि प्रभु ने उसकी भी सृष्टि की है। वह तुम से दूर न जाये, क्योंकि तुम को उसकी ज़रूरत है; 13क्योंकि कभी-कभी तुम्हारा स्वास्थ्य लाभ उनके हाथ में है। 14वे भी प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें निदान पहचानने में और जीवन की रक्षा में सफलता प्रदान करें। 15जो अपने सृष्टिकर्ता के सामने पाप करेगा, वह चिकित्सक के हाथों पड़ेगा। 16पुत्र! मृतक पर आँसू बहाओ और दुःखी हो कर विलाप करो। उसका शरीर योग्य रीति से दफनाओे और उसकी कब्र का ध्यान रखो। 18लोगों की निन्दा से बचने के लिए एकाध दिन मृतक की योग्यता के अनुसार शोक मनाओे और इसके बाद अपना दुःख शान्त हो जाने दो; 19क्योंकि शोक मृत्यु का कारण बन सकता है और मन का दुःख शक्ति घटाता है। 20शोक विपत्ति में बना रहता है और दरिद्रता का जीवन हृदय के लिए अभिशाप है। 21अपना हृदय शोक में मत डूबने दो, उसे हटाओे और अपनी अन्तगति पर विचार करो। 22मृतक को भूल जाओ, वह लौट कर नहीं आयेगा। उसे तुम से कोई लाभ नहीं होता और तुम अपने को हानि पहुँचाते हो। 23यह याद रखो कि उसकी गति तुम्हारी भी होगी- कल उसकी और आज तुम्हारी। 24मृत्यु के बाद मृतक की स्मृति मिट जाने दो, उसके प्राण निकलने के बाद अपना दुःख शान्त होने दो। 25अवकाष मिलने के कारण ही शास्त्री को प्रज्ञा प्राप्त होती है। जो काम-धन्धों में नहीं फँसा रहता, वही प्रज्ञ बन सकता है। 26जो हल चलाता और घमण्ड से पैना भाँजता है, जो बैलों को जोतता और उनके कामों में लगा रहता है, जो अपने साँड़ों की ही बात करता है, उसे प्रज्ञा कैसे प्राप्त हो सकती है? 27वह हल की रेखा खींचने की चिन्ता करता रहता और रात में देर तक बछड़ों को चारा देता है। 28यही हाल प्रत्येक शिल्पकार और हर कारीगर का है, जो दिन-रात अपने काम में लगा रहता है। यही हाल उन लोगों का है, जो मुद्राएँ उकेरते हैं और निरन्तर नयी आकृतियाँ बनाते रहते हैं। ऐसा व्यक्ति सच्ची प्रतिकृति बनाने में तल्लीन रहता और रात में देर तक अपनी कृति का परिष्कार करता है। 29यही हाल लोहार का है, जो निकाई के पास बैठ मन लगा कर लोहे का काम करता है। आग की भाप उसका शरीर गलाती है; वह भट्टी की गरमी में परिश्रम करता रहता है। 30हथोड़े की आवाज उसके कानों में निरन्तर गूँजती रहती है। उसकी आँखेें अपनी कृति के नमूने पर टिकी रहती हैं। 31यह दत्तचित्त हो कर अपने कार्य में लगा रहता। और रात में देर तक उसका परिष्कार करता है। 32यही हाल कुम्हार का है, जो अपने चाक के पास बैठ कर उसे अपने पैरों से घुमाता रहता है। वह अपने काम पर निरन्तर ध्यान रखता और समय पर उसे पूरा करने की चिन्ता करता है। 33वह अपने हाथों से मिट्टी के लोंदे बनाता और पैरों से उसे गूँधता है। 34वह दत्तचित्त होकर बरतनों पर रोगन लगाता और रात में देर तक अपना आँवा साफ करता है। 35इन सबों को अपने हस्तकौशल का भरोसा है। ये सभी अपने-अपने कार्य में निपुण हैं। 36इनके बिना कोई भी नगर नहीं बसाया जा सकता। 37इनके बिना यहाँ न तो कोई रह सकता और न कोई आ-जा सकता; किन्तु नगर परिषद में इन से परामर्श नहीं लिया जायेगा। इन्हें सार्वजनिक सभाओें में प्रमुख स्थान नहीं दिये जायेंगे। 38ये न्यायाधीश के आसन पर नहीं बैठेंगे। ये न तो संहिता के निर्णय समझते और न शिक्षा एवं न्याय के क्षेत्र में योग देते हैं। शासकों में इन में से कोई नहीं, 39किन्तु ये ईश्वर की सृष्टि बनाये रखते हैं। इनका काम ही इनकी प्रार्थना है।