1उस व्यक्ति की बात दूसरी है, जो पूरा ध्यान लगा कर सर्वोच्च प्रभु की संहिता का मनन करता है; जो प्राचीन काल के प्रज्ञा-साहित्य का और नबियों के उद्गारों का अध्ययन करता है। 2वह विख्यात पुरुषों की उक्तियों को सुरक्षित रखता और दृष्टान्तों की गहराई तक पहुँचने का प्रयत्न करता है। 3वह जीवन भर सूक्तियों की गहराई का और दृष्टान्तों की पहेलियों का अध्ययन करता रहता है। 4वह उच्च पदाधिकारियों की सेवा में उपस्थित रहता और शासकों का द्वार उसके लिए खुला है। 5वह विदेशी राष्ट्रों का भ्रमण करता और मनुष्यों की भलाई एवं बुराई की जानकारी रखता है। 6वह बड़े सबेरे अपने सृष्टिकर्ता प्रभु की शरण जाता और सारे हृदय से सर्वोच्च ईश्वर से विनय करता है। 7वह अपने होंठों से प्रार्थना करता और अपने पापों की क्षमा माँगता है। 8यदि सर्वोच्च प्रभु ऐसा चाहेगा, तो उसे बुद्धि का आत्मा प्राप्त होगा। 9तब वह प्रज्ञापूर्ण सूक्तियाँ बोलेगा और अपनी प्रार्थना में प्रभु की स्तुति करेगा। 10उसका परामर्श और ज्ञान विवेकपूर्ण होगा और वह ईश्वर के रहस्यों का मनन करेगा। 11जो शिक्षा उसे प्राप्त हुई, वह उसे प्रकट करेगा और ईश्वर के विधान के नियमों पर गर्व करेगा। 12बहुत-से लोग उसकी बुद्धि की प्रशंसा करेंगे और वह कभी नहीं भुलायी जायेगी। 13उसकी स्मृति नहीं मिटेगी। उसका नाम पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहेगा। 14राष्ट्रों में उसकी प्रज्ञा की चरचा होगी और सभा में उसकी प्रशंसा की जायेगी। 15यदि वह बहुत दिनों तक जीवित रहेगा, तो उसका नाम हज़ारों से महान् होगा। और यदि उसकी मृत्यु हो जायेगी, तो उसे कोई चिन्ता नहीं होगी। 16मैं एक बार और अपने विचार प्रकट करूँगा, क्योंकि मैं पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह पूर्ण हूँ। 17भक्त पुत्रों! मेरी बात सुनो और उस गुलाब की तरफ बढ़ो, जो जलस्रोत के निकट लगाया गया है, 18लोबान की तरह सुगन्ध बिखेरो, 19सोसन की तरह खिलो, ऊँचे स्वर में भजन सुनाओ ओैर प्रभु के सभी कार्यों के कारण उसकी स्तुति करो। 20उसके नाम की महिमा घोषित करो, उसका स्तुतिगान करो, गीत गाते और सितार बजाते हुए इन शब्दों में उसकी स्तुति करो: 22उसके आदेश पर पानी एकत्र हो गया, उसके शब्द मात्र से महासागर के भण्डार भर गये। 23उसके आदेश पर उसकी इच्छा पूरी हुई, क्योंकि उसके कल्याण-कार्य में कोई भी बाधा नहीं डाल सकता। 24सभी मनुष्यों के कार्य उसके सामने हैं और कोई भी उसकी दृष्टि से नहीं छिप सकता। 25वह आदि से काल के अन्त तक देखता रहता है; उसकी दृष्टि में कोई बात असाधारण नहीं। 26यह मत पूछो, "यह क्या है? इस से क्या लाभ? " क्योंकि सब कुछ का अपना-अपना प्रयोजन है। 27उसका आशीर्वाद उमड़ती नदी के सदृश है, 28जो सूखी भूमि को प्रलय की तरह सींचती है! जिन राष्ट्रों ने उसकी खोज नहीं की, उसका क्रोध उनका इस तरह विनाश करेगा, 29जिस तरह उसने पानी को खारा कर दिया। सन्तों के लिए उसके मार्ग सीधे हैं, किन्तु दुष्टों के लिए वे काँटों से भरे हैं। 30प्रारम्भ से ही अच्छे लोगों के लिए अच्छी चीज़ों की और बुरे लोगों के लिए बुरी चीज़ों की सृष्टि हुई। 31मनुष्यों के जीवन के लिए ये अत्यावश्यक हैं: पानी, आग, लोहा, नमक, गेहूँ का मैदा, दूध, मधु, दाखरस, तेल और वस्त्र। 32यह सब भक्तों के लिए कल्याणकारी हैं, किन्तु पापियों के लिए अहितकर होता है। 33दण्ड देने के लिए आँधियों की सृष्टि हुई: प्रभु का कोप उनका संकट दुगुना कर देता है। 34समय आने पर वे विनाशलीला रचती और अपने सृष्टिकर्ता का क्रोध शान्त करती हैं। 35आग, ओले, अकाल और मृत्यु- इनकी सृष्टि दण्ड देने के लिए हुई है। 37ये सब सहर्ष उसकी आज्ञा मानते हैं, इनकी उस समय के लिए सृष्टि की गयी है, जब इनकी ज़रूरत पडे़गी; समय आने पर ये उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे। 38इसलिए प्रारम्भ से मेरी यही धारणा थी, मैंने सोच-विचार करने के बाद यह लिखा है: 39"प्रभु के सभी कार्य उत्तम हैं, वह समय पर सब आवश्यकताएँ पूरी करता है"। 40यह मत कहो, "यह उस से बुरा है", क्योंकि सब कुछ अपने समय पर अच्छा प्रमाणित होगा। 41और अब हमारे हृदय से ऊँचे स्वर में गाओे और प्रभु का नाम धन्य कहो।