प्रवक्ता

अध्याय 51

1प्रभु! मेरा राजा! मैं तुझे धन्य कहूँगा। ईश्वर! मेरे मुक्तिदाता! मैं तेरी स्तुति करूँगा। 2मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ; क्येांकि तू मेरी रक्षा और सहायता करता रहा। 3तूने मुझे सर्वनाश से, छल-कपट करने वालों के फन्दे से और झूठ बोलने वालों के षड्यन्त्र से बचाया है। तू मेरे शत्रुओें के विरुद्ध मेरा सहारा रहा। 4अपनी असीम दया तथा महिमामय नाम के अनुरूप तूने इन सब बातों से मेरी रक्षा की है- 5भक्षकों के दाँतों से, हत्या पर उतारू लोगों के पंजों से, आ पड़ने वाली असंख्य विपत्तियों से, 6घेरने वाली आग के धुएँ से, उस अग्नि-ज्वाला से, जिसे मैंने नहीं जलाया, 7अधोलोक के गर्त से, कपटी जीभ की निन्दा से और मुझ पर लगाये हुए मिथ्यावाद से। 8मृत्यु मेरे निकट आ गयी थी, 9मैं अधोलोक के फाटक तक पहुँच गया था। 10उन्होंने मुझे चारों ओर से घेर लिया था। मेरा कोई सहायक नहीं था। कोई भी मनुष्य मुझे सँभालने के लिए तैयार नहीं था। 11प्रभु! तब मैंने तेरी दयालुता और पहले किये हुए तेरे कार्यों का स्मरण किया- 12तू अपने पर भरोसा रखने वालों की रक्षा करता और उन्हें उनके शत्रुओं के पंजे से छुड़ाता है। 13मैंने पृथ्वी पर से प्रभु की दुहाई दी और मृत्यु से रक्षा की प्रार्थन की। 14मैने कहा, "प्रभु! तू मेरा पिता है! घमण्डी शत्रुओं के सामने, मुझे विपत्ति के दिन, असहाय नहीं छोड़। 15मैं निरन्तर तेरा नाम धन्य कहूँगा, मैं धन्यवाद के गीत गाता रहूँगा।" मेरी प्रार्थना सुनी गयी, 16क्योंकि तूने मुझे विनाश से बचाया और विपत्ति से मेरा उद्धार किया। 17इस कारण मैं तेरा धन्यवाद और तेरी स्तुति करूँगा, मैं प्रभु का नाम धन्य कहूँगा। 18अपनी यात्राएँ प्रारम्भ करने से पहले मैं युवावस्था में आग्रह के साथ प्रज्ञा के लिए प्रार्थना करता था। 19मैं मन्दिर के प्रांगण में उसके लिए अनुरोध करता था और अन्त तक उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहूँगा। वह फलते-फूलते हुए अंगूर की तरह मुझ में विकसित हो कर 20मुझे आनन्दित करती रही। मैं सीधे मार्ग पर आगे बढ़ता गया और बचपन से ही प्रज्ञा का अनुगामी बना। 21मैंने थोड़े समय तक उस पर कान दिया था। 22और मुझे प्रचुर मात्रा में शिक्षा मिली। मैं उसी के कारण प्रगति कर सका। 23जिसने मुझे प्रज्ञा प्रदान की है, मैं उसकी महिमा करूँगा। 24मैंने प्रज्ञा के अनुसार आचरण करने का निश्चय किया। मैं भलाई करता रहा। मुझे कभी लज्जित नहीं होना पड़ेगा। 25मैं प्रज्ञा प्राप्त करने के लिए पूरी शक्ति से प्रयास करता रहा। और संहिता के पालन में ईमानदार रहा। 26मैंने आकाश की ओर हाथ ऊपर उठाया और अपनी नासमझी पर दुःख प्रकट किया। 27मै उत्सुकता से प्रज्ञा को खोजता रहा और अपने सदाचरण के कारण मैंने उसे पाया। 28मुझे प्रारम्भ से उसके द्वारा विवेक मिला, इसलिए मुझे कभी परित्यक्त नहं किया जायेगा। 29मैं पूरी शक्ति से उसकी खोज करता रहा और मुझे एक अमूल्य निधि प्राप्त हुई। 30प्रभु ने पुरस्कार के रूप में मुझे कुशल जिह्वा प्रदान की और मैं उस से उसका यश गाऊँगा। 31तुम, जो अशिक्षित हो, मेरे पास आओे और शिक्षा के घर में एकत्र हो जाओ। 32देर क्यों करते हो, जब कि तुम्हारी आत्माएँ उसके लिए तरस रही हैं? 33मैं मुँह खोल कर बोलता हूँ "मुफ्त में प्रज्ञा प्राप्त करो। 34तुम जूए के नीचे गरदन झुकाओे। तुम्हारा हृदय शिक्षा ग्रहण करे; क्येांकि वह तुम्हारे लिए प्रस्तुत है। 35तुम अपनी आँखों से देख सकते हो कि मुझे उसके लिए कम परिश्रम करना पड़ा और मुझे बहुत शान्ति मिली 37तुम प्रभु की दया के कारण आनन्द मनाओ और उसकी स्तुति करने में लज्जा का अनुभव मत करो। 38समय समाप्त होने से पहले अपना कार्य पूरा करो और समय आने पर प्रभु तुम को पुरस्कार प्रदान करेगा।"