प्रवक्ता

अध्याय 50

1ओनियस के पुत्र प्रधानयाजक सिमोन ने अपने जीवनकाल में निवास का पुनर्निर्माण किया और अपने दिनों में मन्दिर को सुदृढ़ बनाया। 2उनके दिनों में राजमहल के पास दीवार और मन्दिर की मीनारों का निर्माण किया गया। 3उनके दिनों में एक जलकुण्ड खोदा गया, एक तालाब, जो समुद्र-जैसा विस्तृत था। 4उन्होंने अपने लोगो को विनाश से बचाया और शत्रुओें के विरुद्ध नगर को किलाबन्द किया। 5वह कितने देदीप्यमान थे, जब वह परमपावन् स्थान से, मन्दिर के परदे के पीछे से निकलते थे! 6वह बादलों के बीच प्रभात-तारे के सदृश थे, पूर्णिमा के दिनों में चन्द्रमा के सदृश, 7राजमहल पर चमकते हुए सूर्य के सदृश, 8महिमामय बादलों के बीच इन्द्रधनुष के सदृश, वसन्त के समय गुलाब के फूल के सदृश, जलस्रोत के निकट सोसन के सदृश, ग्रीष्म-ऋतु में लेबानोन की हरियाली के सदृश, 9धूपदान में जलते लोबान के सदृश, 10मणियों से जटित ठोस सोने के पात्र के सदृश, 12पवित्र वेदी की ओर बढ़ते थे, तो वह मन्दिर के प्रांगण को महिमान्वित करते थे। 13जब वह वेदी के अग्निकुण्ड के निकट खड़े हो कर याजकों के चढ़ावे स्वीकार करते थे, तो उनके भाई-बन्धु लेबानोन के देवदारों की तरह, 14खजूर के वृक्षों की तरह उन्हें चारों ओर से घेरे रहते थे। सुन्दर वस्त्रों से सुशोभित हारून के सभी पुत्र, 15प्रभु का चढ़ावा अपने हाथ में लिये इस्राएल के सारे समुदाय के सामने एकत्र थे। सिमोन वेदी को सजा कर और उस पर सर्वशक्तिमान् का चढ़ावा रख कर, 16पात्र की ओर बढ़ाते और अंगूर-रस का अघ्र्य अर्पित करते थे। 17वह उसे सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान् प्रभु को सुगन्ध चढ़ावे के रूप में वेदी के आधार पर उँड़ेलते थे। 18तब हारून के पुत्र प्रभु को स्मरण कराने के लिए ऊँचे स्वर में पुकारते और धातु की तुरहियाँ बजाते थे। 19इस सब पर लोग एक साथ मुँह के बल गिर कर सर्वशक्तिमान् सर्वोच्च प्रभु की आराधना करते 20और गायक अपने भजनों से उसकी स्तुति करते थे। उनका मधुर गान दूर-दूर तक गूँजता था। 21जब तक प्रभु का समारोह समाप्त नहीं हुआ और लोगों ने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया, तब तक वे दयासागर के सामने नतमस्तक हो कर सर्वोच्च प्रभु से प्रार्थना करते रहे। 22इसके बाद सिमोन नीचे उतर कर और सारे इस्राएली समुदाय के ऊपर हाथ फैला कर अपने होंठों से प्रभु की ओर से आशीर्वाद देते थे और उसके नाम का उच्चारण कर अपने को धन्य समझते थे। 23लोग सर्वशक्तिमान् का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दूसरी बार मुँह के बल गिरते थे। 24आओ! सर्वेश्वर को धन्य कहो। वह सर्वत्र महान् कार्य करता है। वह माता के गर्भ से मनुष्य का विकास करता है और अपनी इच्छा के अनुसार उसे गढ़ता हैं 25वह हमारे हृदय को आनन्द प्रदान करे और हमारे समय में भी पहले की तरह इस्राएल में सदा के लिए शान्ति बनाये रखे। 26उसकी कृपादृष्टि हम पर बनी रहे और हमारे दिनों में हमारा उद्धार करे। 27मेरी आत्मा को दो राष्ट्रों से घृणा है और तीसरा राष्ट्र कहलाने योग्य नहीं। 28सेईर पर्वत के निवासी, फिलिस्तीनी ओैर सिखेम में रहने वाले मूर्ख लोग। 29येरूसालेम-निवासी, एलआज़ार के तीन पौत्र, सीरह के पुत्र येशूआ ने, अपने हृदय का भण्डार खोल कर, इस ग्रन्थ में प्रज्ञा और ज्ञान की शिक्षा को लिपिबद्ध किया। 30धन्य है वह, जो इसका मनन करेगा! जो इसे अपने हृदय में धारण करेगा, उसे प्रज्ञा प्राप्त होगी। 31जो इसके अनुसार आचरण करेगा, वह सब कुछ करने में समर्थ हेागा; क्येांकि प्रभु पर श्रद्धा उसका पथप्रदर्शन करेगी।