वर्ष -1, दूसरा सप्ताह, शुक्रवार

पहला पाठ : इब्रानियो 8:6-13

6) अब, जो धर्मसेवा मसीह को मिली है, वह कहीं अधिक ऊँची है; क्योंकि वे एक ऐसे विधान के मध्यस्थ हैं; जो श्रेष्ठतर है और श्रेष्ठतर प्रतिज्ञाओं पर आधारित हैं।

7) यदि पहला विधान परिपूर्ण होता, तो उसके स्थान पर दूसरे की क्या आवश्यकता थी?

8) ईश्वर उन लागों की निन्दा करते हुए कहता है- प्रभु यह कहता हैः वे दिन आ रहे हैं, जब मैं इस्राएल के घराने के लिए और यूदा के घराने के लिए एक नया विधान निर्धारित करूँगा।

9) यह उस विधान की तरह नहीं होगा, जिसे मैंने उनके पूर्वजों के लिए उस समय निर्धारित किया था, जब मैंने उन्हें मिस्र से निकालने के लिए उनके हाथ थामे थे।

10) प्रभु यह कहता है: उन्होंने मेरे विधान का पालन नहीं किया, इसलिए मैंने भी उनकी सुध नहीं ली। प्रभु यह कहता है: वह समय बीत जाने के बाद मैं इस्राएल के लिए यह विधान निर्धारित करूँगा - मैं अपने नियम उनके मन में रख दूँगा, मैं उनके हृदय पर अंकित करूँगा। मैं उनका ईश्वर होऊँगा और वे मेरी प्रजा होंगे।

11) इसकी ज़रूरत नहीं रहेगी कि वे एक दूसरे को शिक्षा दें और अपने भाइयों से कहें, ’प्रभु का ज्ञान प्राप्त कीजिए’; क्योंकि छोटे और बड़े, सब-के-सब मुझे जानेंगे।

12) मैं उनके अपराध क्षमा कर दूँगा और उनके पापों को याद भी नहीं रखूँगा।

13) ईश्वर इस विधान को ’नया’ कह कर पुकारता है, इसलिए उसने पहला विधान रद्द कर दिया है। जो पुराना और जराग्रस्त हो गया है, वह लुप्त होने को है।


सुसमाचार : मारकुस 3:13-19

13) ईसा पहाड़ी पर चढ़े। वे जिन को चाहते थे, उन को उन्होंने अपने पास बुला लिया। वे उनके पास आये

14 (14-15) और ईसा ने उन में से बारह को नियुक्त किया, जिससे वे लोग उनके साथ रहें और वह उन्हें अपदूतों को निकालने का अधिकार दे कर सुसमाचार का प्रचार करने भेज सकें।

16) ईसा ने इन बारहों को नियुक्त किया- सिमोन को, जिसका नाम उन्होंने पेत्रुस रखा;

17) ज़ेबेदी के पुत्र याकूब और उसके भाई योहन को, जिनका नाम उन्होंने बोआनेर्गेस अर्थात् गर्जन के पुत्र रखा;

18) अन्दे्रयस, फिलिप, बरथोलोमी, मत्ती, थोमस, अलफ़ाई के पुत्र याकूब, थद्देयुस और सिमोन को, जो उत्साही कहलाता है;

19) और यदूस इसकारियोती को, जिसने ईसा को पकड़वाया।

📚 मनन-चिंतन

आज हम इस पर मनन-चिंतन करते हैं कि किस तरह प्रभु येसु पर्वत पर जाते हैं और शिष्यों का चुनाव करते हैं ताकि वे उनके साथ रहें और उनके मिशन कार्य को आगे बढ़ाने के लिए दूर-दूर जाएँ। जब हम चुने हुए इन शिष्यों को देखते हैं तो पाते हैं कि प्रभु येसु के शिष्य बनने के लिए कोई विशेष योग्यता अथवा गुण की आवश्यकता नहीं थी। इसका मतलब यह है कि ईश्वर किसी ख़ास व्यक्ति को नहीं बुलाते। उनका बुलावा सभी तरह के लोगों के लिए है, चाहे आप किसी भी समाज, वर्ग, जाति आदि से हो, ईश्वर बिना किसी भेड़-भाव के सबको बुलाते हैं, क्योंकि वह अयोग्य व्यक्ति को चुनकर योग्य बनाते हैं।

ईश्वर सबको बुलाते हैं, लेकिन किसलिए? वह अपने शिष्यों को उनके साथ रहने और दुनिया के कोने-कोने में भेजे जाने के लिए बुलाते हैं। यही दो कारण हैं। जब हम उनके साथ रहते हैं तो उन्हें गहराई से जान जाते हैं, हमारे लिए उनकी योजना को हम समझ लेंगे, इस दुनिया में आने के हमारे मक़सद को हम समझ पाएँगे। जब हम ईश्वर के अनुग्रह और प्रेम से भर जाते हैं तो उसे हमें दूसरों के साथ भी बाँटना है। ईश्वर के द्वारा बुलाया जाना और फिर भेजा जाना एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं। क्या मैं प्रभु येसु के बुलावे को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ?

-फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION


In today's gospel we see Jesus going on the mountain and calling and choosing those whom he wanted, to be with him and to be sent out to continue his mission. When we see and reflect on the names of these chosen ones, we find that perhaps there was no fixed criteria for Jesus, as to whom he should choose, or who is eligible and worthy to be his disciple. It shows that there is no fixed category of people that God calls. His invitation is open for all, whether you belong to any category, any caste, race, creed, society, you are suitable to be called by him, because he doesn't see any qualification, but grants qualification after calling.

All are given an invitation by God, and chosen, but for what? He calls his disciples to be with him and to be sent out to the world. These are the only two reasons – he calls us so that we can be with him, and we can be sent out. When we are with Jesus, we will know him deeply, we will understand his plan for us, we will understand the real purpose of our coming into this world. Once we are filled with his love and grace, we are called to share the same with others. Being called and then being sent out are complimentary to each other. Do I accept the invitation of Jesus?

-Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)


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Praise the Lord!