वर्ष -1, नौवाँ सप्ताह, शुक्रवार

पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 11:5-17

5) इस बीच अन्ना बाहर बैठी हुई अपने पुत्र की राह देख रही थी।

6) उसने उसे आते देखा और उसके पिता से कहा, "देखो, तुम्हारा पुत्र और वह व्यक्ति, जो उसके साथ गया था, आ रहे हैं"।

7) पिता के पास पहुँचने से पहले रफ़ाएल ने टोबीयाह से कहा, "मैं जानता हूँ कि उनकी आँखें अच्छी हो जायेंगी।

8) उन की आँखों पर मछली का पित्त लगाओ। इस से मातियाबिन्द की झिल्ली उनकी आँखों पर से निकल जायेगी और तुम्हारे पिता फिर प्रकाश देख सकेंगे।"

9) अन्ना दौड़ते हुए अपने पुत्र से मिली और यह कहते हुए उसे गले लगाया, "बेटा! मैंने तुम को फिर देखा; अब मरने को तैयार हूँ" और वह रोने लगी।

10) टोबीत उठ कर लड़खड़ाता हुआ अपने आँगन के द्वार से निकला।

11) टोबीयाह हाथ में मछली का पित्त लिये उसके पास आया और उसे सँभालते हुए उसकी आँखों पर फँूक मारी और बोला, "पिताजी! ढारस रखिए!" इसके बाद उसने उन पर दवा लगायी

12) और अपने दोनों हाथों से अपने पिता की आँखों के कोरों से मोतियाबिन्द की झिल्ली निकाली।

13) टोबीत ने अपने पुत्र को देख कर उसे गले लगाया

14) और रोते हुए उस से कहा, "बेटा! मैं तुम को, अपनी आँखों की ज्योति को देखता हूँ" उसने फिर कहा, "धन्य है ईश्वर, धन्य है उसका महान् नाम और उसके सब स्वर्गदूत युग-युग धन्य है;

15) क्योंकि उसने मुझे मारा और अब वह मुझे अपने पुत्र टोबीयाह के दर्शन कराता है"। टोबीत और उसकी पत्नी अन्ना आनन्दित को कर घर के अन्दर आये और उन्होंने ऊँचे स्वर में ईश्वर को धन्यवाद देते हुए सबों को बताया कि उनके साथ क्या-क्या हुआ। टोबीयाह ने अपने पिता को बताया कि उसकी यात्रा प्रभु-ईश्वर की कृपा से सफ़ल रही, वह रुपया ले आया, उसने रगुएल की पुत्री से विवाह किया और यह कि वह आने वाली है, क्योंकि यह नीनवे के फ़ाटक पर पहुँच रही है। यह सुनकर टोबीत और अन्ना को बडा आनन्द हुआ

16) और वे अपनी बहू की अगवानी करने नीनवे के फाटक गये। जब नीनवे के निवासियों ने देखा कि टोबीत पूर्ण स्वस्थ हो कर चलता-फिरता है और कोई उसका हाथ पकड़ कर उसे नहीं ले चलता, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ।

17) उनके सामने ऊँचे स्वर में ईश्वर को धन्यवाद देते हुए टोबीत यह बताता था कि ईश्वर ने उस पर कैसे दया की और उसकी आँखों को अच्छा किया। टोबीत ने अपने पुत्र टोबीयाह की पत्नी सारा के पास आ कर उसे यह कहते हुए आशीर्वाद दिया, " पुत्री ! सकुशल पधारो। पुत्री!

सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:35-37

35) ईसा ने, मन्दिर में शिक्षा देते समय, यह प्रश्न उठाया, “शास्त्री लोग कैसे कह सकते हैं कि मसीह दाऊद के पुत्र हैं?

36) दाऊद ने स्वयं पवित्र आत्मा की प्रेरणा से कहा- प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, तुम तब तक मेरे दाहिने बैठे रहो, जब तक मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारे पैरों तले न डाल दूँ।

37) दाऊद स्वयं उन्हें प्रभु कहते हैं, तो वह उनके पुत्र कैसे हो सकते हैं?" एक विशाल जन समूह बड़ी रुचि से ईसा की बातें सुन रहा था।

📚 मनन-चिंतन

हम जानते हैं कि हर व्यक्ति का अपना अलग पहचान होता है और उसी पहचान से उसे जाना या पुकारा जाता है। यह पहचान व्यक्ति के नाम से भी संबंध रखता है। जैसे कि आज के सुसमाचार पाठ में हम पाते हैं, ईसा ने मंदिर में शिक्षा देते समय, प्रश्न उठायाय शास्त्री लोग कैसे कह सकते हैं कि मसीह दाऊद के पुत्र हैं? (मारकुस 12:35) जब हम किसी प्रसिध्द व्यक्ति के बारे में पढ़ते या सुनते हैं, तब हम सबसे पहले उसके उदगम को जानना चाहते है, और वह उसका पहचान बन जाता है। स्त्रोत्र 110:1 में हम पढ़ते हैं, प्रभु ने मेरे प्रभु ने कहाः तुम मेरे दहिने बैठ जाओ मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारा पावदान बना दूँगा। यहाँ पर ईसा एक अखडनीय तथ्य के बारे में बताते हैं कि ईसा दाऊद के पुत्र हैं। असल में ईसा के दिनों में शास्त्री और यहुदी नये विधान और कलीसिया की पुष्टि करते हैं। इसी को हम संत पौलुस के नाम फिलिपियों 2:9 में पाते हैं इसलिए ईश्वर ने उन्हें महान बनाया और उन को वह नाम प्रदान किया, जो सब नामों में श्रेष्ठ है।

आइये हम आज के सुसमाचार को समझने का प्रयास करें और मनन-चिंतन करें जिससे हम ईसा मसीह को जाने एवं पहचान सकें। हम स्वयं से प्रश्न करें क्या हमारा बुध्दि, ज्ञान ईसा मसीह पर कितना गहरा है?

फादर आइजक एक्का

📚 REFLECTION


We know that each individual has an identity, and he/she is known and called by that identity. This identity also signifies the particular trait of the individual. We find it in today’s gospel reading, while Jesus was teaching in the temple, he said, “How can Scribes say that the Messiah is the son of David”? (Mk12:35). When we read or hear about well-known personality; we at first enquire his/ her whereabouts and origin, and it becomes his/ her identity or whole mark. Psalm 110: 1 The Lord says to my lord, “Sit at my right hand until I make your enemies your footstool”. Here Jesus makes an irrefutable fact that he is the son of David. In fact during the time of Jesus, the Scribes and the Jewish people testify the New Testament and the church. We find this in St. Paul’s letter to the Philippians 2:9, Therefore God also highly exalted him and gave him the name that is above every name”.

As we meditate today on this gospel passage, let’s try to understand the true message of Jesus, so that we may be able to know and understand Jesus more deeply.

-Fr. Isaac Ekka


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Praise the Lord!