वर्ष -1, ग्यारहवाँ सप्ताह, शनिवार

पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 12:1-10

1) डींग मारने से कोई लाभ नहीं, फिर भी मुझे ऐसा ही करना पड़ रहा है। इसलिए दिव्य दर्शनों और प्रभु द्वारा प्रकट किये हुए रहस्यों की चर्चा करूँगा।

2) मैं मसीह के एक भक्त को जानता हूँ, जो चैदह वर्ष पहले तीसरे स्वर्ग तक ऊपर आरोहित कर लिया गया- सशरीर या दूसरे प्रकार से, यह मैं नहीं जानता, ईश्वर ही जानता है।

3) मैं उस मनुष्य के विषय में जानता हूँ कि वह स्वर्ग में आरोहित कर लिया गया-सशरीर या दूसरे प्रकार से, यह मैं नहीं जानता, ईश्वर ही जानता है।

4) उस मनुष्य ने ऐसी बातों की चर्चा सुनी, जो अनिर्वचनीय है और जिन्हें प्रकट करने की किसी मनुष्य को अनुमति नहीं है।

5) मैं ऐसे व्यक्ति पर गर्व करना चाहूँगा। अपनी दुर्बलताओं के अतिरिक्त मैं अपने विषय में किसी और बात पर गर्व नहीं करूँगा।

6) यदि मैं गर्व करता, तो यह नादानी नहीं होती, क्योंकि मैं सत्य ही बोलता। किन्तु मैं यह नहीं करूँगा। लोग जैसा मुझे देखते और सुनते हैं, उस से बढ़ कर मुझे कुछ भी नहीं समझें।

7) मुझ पर बहुत-सी असाधारण बातों का रहस्य प्रकट किया गया है। मैं इस पर घमण्ड न करूँ, इसलिए मेरे शरीर में एक काँटा चुभा दिया गया है। मुझे शैतान का दूत मिला है, ताकि वह मुझे घूंसे मारता रहे और मैं घमण्ड न करूँ।

8) मैंने तीन बार प्रभु से निवेदन किया कि यह मुझ से दूर हो;

9) किन्तु प्रभु ने कहा-मेरी कृपा तुम्हारे लिए पर्याप्त है, क्योंकि हमारी दुर्बलता में मेरा सामर्थ्य पूर्ण रूप से प्रकट होता है।

10) इसलिए मैं बड़ी खुशी से अपनी दुर्बलताओं पर गौरव करूँगा, जिससे मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया रहे। मैं मसीह के कारण अपनी दुर्बलताओं पर, अपमानों, कष्टों, अत्याचारों और संकटों पर गर्व करता हूँ; क्योंकि मैं जब दुर्बल हूँ, तभी बलवान् हूँ।

सुसमाचार : मत्ती 6:24-34

24) "कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम ईश्वर और धन - दोनों की सेवा नहीं कर सकते।

25) मैं तुम लोगों से कहता हूँ, चिन्ता मत करो- न अपने जीवन-निर्वाह की, कि हम क्या खायें और न अपने शरीर की, कि हम क्या पहनें। क्या जीवन भोजन से बढ कर नहीं ? और क्या शरीर कपडे से बढ़ कर नहीं?

26) आकाश के पक्षियों को देखो। वे न तो बोते हैं, न लुनते हैं और न बखारों में जमा करते हैं। फिर भी तुम्हारा स्वर्गिक पिता उन्हें खिलाता है, क्या तुम उन से बढ़ कर नहीं हो?

27) चिंता करने से तुम में से कौन अपनी आयु घड़ी भर भी बढा सकता है?

28) और कपडों की चिन्ता क्यों करते हो? खेत के फूलों को देखो। वे कैसे बढ़ते हैं! वे न तो श्रम करते हैं और न कातते हैं।

29) फिर भी मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि सुलेमान अपने पूरे ठाट-बाट में उन में से एक की भी बराबरी नहीं कर सकता था।

30) रे अल्पविश्वासियों! खेत की घास आज भर है और कल चूल्हे में झोंक दी जायेगी। यदि उसे भी ईश्वर इस प्रकार सजाता है, तो वह तुम्हें क्यों नहीं पहनायेगा?

31) इसलिए यह कहते हुए चिंता मत करो- हम क्या खायें, क्या पियें, क्या पहनें।

32) इन सब चीजों की खोज में गैर-यहूदी लगे रहते हैं। तुम्हारा स्वर्गिक पिता जानता है कि तुम्हें इन सभी चीजों की ज़रूरत है।

33) तुम सब से पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें, तुम्हें यों ही मिल जायेंगी।

34) कल की चिन्ता मत करो। कल अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा। आज की मुसीबत आज के लिए बहुत है।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु मुख्यतः दो बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हैं, पहले पद पर वे ईश्वर और धन के बारे में बताते हैं, और अंतिम पदों पर वे ईश्वर पर भरोसा के बारे में बताते हैं। पहले पद में कहते हैं, कि ’’कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम ईश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।’’ (मत्ती 6:24)। प्रभु येसु इसे चेतावनी की तरह नहीं कहते, बल्कि इसकी वास्तविकता को बताते हैं। वे यह नहीं कहते कि हमें दो, स्वामियों की सेवा नहीं करनी चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं है। दोनों स्वामियों की सेवा का प्रयास केवल हमें निराशा और समय की बरबादी ही करेगी।

आज के सुसमाचार के दूसरे भाग में प्रभु येसु कहते हैं, ’’चिन्ता मत करो-न अपने जीवन-निवार्ह की, कि हम क्या खायें और न अपने शरीर की, कि हम क्या पहने।’’ (मत्ती 6:25)। चिन्ता और शंका परस्पर विरोधी हैं। रूथ ग्राहम बेल कहते हैं, ’’मैंने सीखा है कि पूजा (worship) और शंका एक हदय में निवास नही कर सकते, वे एक दूसरे के परस्पर अनन्य हैं। किसी ने कहा और अवलोकन कियाः ’’चिन्ता न केवल कल के प्रयास को छीनती, बल्कि आज के खुशी को स्वतः खाली कर देती है। चिन्ता न केवल कल के दुःख को खाली करती, बल्कि आज के शाक्ति को रिक्त कर देती है।’’

फादर आइजक एक्का

📚 REFLECTION


In today’s gospel Jesus mainly emphasizes on two points: in the first verse he tells about God and wealth and in the remaining nine verses he tells about trust in God. In the first verse he says, “ No one can serve two masters, for either he hate the one and love the other; or else he will be devoted to one and despise the other. You cannot serve both God and wealth”(Mt.6:24). Jesus does not state this as a warning, but as a fact. He doesn’t say that we shouldn’t serve two masters, but that isn’t possible. The attempt to serve two masters will just frustrate us and waste of time.

In the second part of the gospel Jesus says, “Don’t be anxious for your life: what you will eat, or what you will drink; nor yet for our body, what you will wear”(Mt.6:25). Worry is the opposite of faith. As Ruth Graham says, “I have learned that worship and worry cannot live in the same heart: they are mutually exclusive.” Someone else made this observation: “Anxiety does not empty tomorrow of its trials—it simply empties today of its joy. Anxiety does not empty tomorrow of its sorrow—it empties today of its strength”.

-Fr. Isaac Ekka


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Praise the Lord!