वर्ष -1, सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

पहला पाठ : निर्गमन 32:15-24,30-34

15) मूसा विधान की दोनों पाटियाँ हाथ में लिये पर्वत से उतर कर लौटा। पाटियों पर सामने और पीछे, दोनों ओर लेख अंकित थे।

16) वे पाटियाँ ईश्वर की बनायी हुई थीं और उन पर जो लिपि अंकित थी, वह ईश्वर की अपनी लिपि थी।

17) योशुआ ने लोगों का कोलाहल सुन कर मूसा से कहा, शिविर में से लड़ाई जैसी आवाज़ आ रही है।

18) उसने उत्तर दिया, ''यह न तो विजेताओं का उल्लास है और न पराजितों का विलाप। मैं तो गाने की आवाज़ सुन रहा हूँ।''

19) शिविर के पास पहुँच कर मूसा ने बछड़े की प्रतिमा और लोगों का नृत्य देखा। उसका क्रोध भड़क उठा और उसने अपने हाथ की पाटियों को पहाड़ के निचले भाग पर पटक कर टुकड़े-टुकड़े कर दिये।

20) उसने लोगों का बनाया हुआ बछड़ा ले कर जला दिया। उसने उसकी राख पीस कर चूर-चूर कर डाली और उसे पानी में छिड़क कर इस्राएलियों को पिला दिया।

21) तब मूसा ने हारून से पूछा, ''इन लोगों ने तुम्हारे साथ कौन-सा अन्याय किया, जो तुमने इन्हें इतने घोर पाप में डाल दिया हैं?''

22) हारून ने उत्तर दिया, ''महोदय आप क्रोध न करें। आप जानते ही हैं कि इन लोगों का झुकाव पाप की ओर है।

23) इन्होंने मुझ से कहा, "हमारे लिए एक ऐसा देवता बनाइए, जो हमारे आगे-आगे चले, क्योंकि हम नहीं जानते कि जो मनुष्य हम को मिस्र से निकाल लाया, उस मूसा का क्या हुआ।÷

24) तब मैंने इन से कहा, ''जिसके पास सोने के आभूषण हों, वे उन्हें उतार कर ला दें उन्होंने मुझे सोना ला दिया। मैंने उसे आग में डाला और इस प्रकार यह बछड़ा बन गया।''

30) दूसरे दिन मूसा ने इस्राएलियों से कहा, ''तुम लोगों ने घोर पाप किया है। मैं अब पर्वत पर प्रभु के पास जा रहा हूँ। यदि हो सका, तो मैं तुम्हारे पाप का प्रायश्चित करूँगा।''

31) मूसा ने प्रभु के पास आ कर कहा, हाय; इन लोगों ने घोर पाप किया है। इन्होंने अपने लिए सोने का देवता बनाया है।

32) ओह; यदि तू इन्हें क्षमा कर दे; नहीं तो, मेरा नाम अपनी लिखी हुई पुस्तक से निकाल दे।

33) प्रभु ने उत्तर दिया, ''जिसने मेरे विरुद्ध पाप किया है, उसी को मैं अपनी पुस्तक से निकाल दूँगा।

34) अब तुम जा कर लोगों को उस स्थान ले चलो, जिसे मैंने तुम्हें बताया हैं। मेरा दूत तुम्हारे आग-आगे चलेगा। जब दण्ड देने का दिन आयेगा, तब मैं लोगों को उनके पाप का दण्ड दूँगा।''

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:31-35

31) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, "स्वर्ग का राज्य राई के दाने के सदृश है, जिसे ले कर किसी मनुष्य ने अपने खेत में बोया।

32) वह तो सब बीजों से छोटा है, परन्तु बढ़ कर सब पोधों से बड़ा हो जाता है और ऐसा पेड़ बनता है कि आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करते हैं।"

33) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया,"स्वर्ग का राज्य उस ख़मीर के सदृश है, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया"।

34) ईसा दृष्टान्तों में ही ये सब बातें लोगों को समझाते थे। वह बिना दृष्टान्त के उन से कुछ नहीं कहते थे,

35) जिससे नबी का यह कथन पूरा हो जाये- मैं दृष्टान्तों में बोलूँगा। पृथ्वी के आरम्भ से जो गुप्त रहा, उसे मैं प्रकट करूँगा।

📚 मनन-चिंतन

प्रभु येसु ईश्वर के राज्य के रहस्यों को आसानी से हमें समझाने के लिए हमारे ही दिन-प्रतिदिन में उपयोग की जाने वाली वस्तुओं का उदाहरण देते हैं. आज के सुसमाचार में प्रभु येसु दो दृष्टान्तों द्वारा स्वर्ग के राज्य स्वाभाव को समझाते हैं. पहला उदाहरण है, राई का दाना. हम जानते हैं कि राई का दाना बहुत छोटा होता है, लेकिन जब वह धीरे-धीरे फूट कर पौधा बनता है तो अपने से कई गुना बड़ा बन जाता है, और अनेकों दाने पैदा कर देता है. उसी तरह से दूसरा उदाहरण खमीर का है, जब थोड़ा सा खमीर आटे में मिलाया जाता है तो वह सारे आटे को खमीरा बना देता है. इन दोनों उदाहरणों से हमें पता चलता है कि ईश्वर के राज्य की शुरुआत बहुत छोटी होती है, लेकिन जब वह बढ़ता है तो सब कुछ को अपने में समाहित कर लेता है.

यही बात हमारे ख्रीस्तीय जीवन में लागू होती है. ईश्वरीय राज्य के गुण जैसे कि सत्य, प्रेम, भाईचारा,एकता, सहनशीलता, क्षमाशीलता आदि एक छोटे से रूप में शुरू होते हैं, लेकिन जब बढ़ते हैं, तो सब कुछ पर जीत हासिल कर लेते हैं. हम ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ ख्रीस्तीय मूल्यों पर चलने वालों की संख्या बहुत कम है. 130 करोड़ लोगों की जनसँख्या वाले देश में प्रभु येसु के अनुयायी सिर्फ 2 प्रतिशत के आस-पास ही हैं, लेकिन यदि दो प्रतिशत लोग सच्चे दिल से पूरी ईमानदारी के साथ प्रभु येसु के बताये मार्ग पर चलें तो सारे देश को बदल सकते हैं. आईये हम प्रार्थना करें कि ईश्वर का राज्य हमारे जीवन में फलीभूत हो और हमारे द्वारा दूसरों के जीवन में. आमेन.

फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर)

📚 REFLECTION


In order to explain about the kingdom of heaven, Jesus gives examples from the things used in our day-to-day life. In the gospel today, Jesus gives two examples t explain the nature of the kingdom of God. First example is of a mustard seed. We know that mustard seed is very tiny, but once it sprouts and becomes a plant, it becomes so large that it produces numerable other seeds. Similarly, second example given by Jesus is that of yeast. When a very small quantity is mixed in the flour, the whole flour becomes fermented. These both examples show us that the kingdom has a very humble beginning but when it starts growing, it overtakes everything.

This is also applicable in our christian life. The values of the kingdom of God, like Truth, justice, love, unity, tolerance, forgiveness etc, begin in a small manner and grow in such a way that they conquer everything. We live in a land where people who follow Christ and the kingdom values are very few. The followers of Jesus are hardly 2% out of about 130 corore people, but if these few people sincerely and whole heartedly bear witness with their lives to the teachings of Christ they can bring a dynamic change. Let us pray to God to enable us to live the values of the kingdom of God and take it others. Amen.

-Fr. Johnson B. Maria (Gwalior)


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