चक्र ’अ’ -चालीसा काल का चौथा इतवार



📒 पहला पाठ : 1समुएल 16:1ब,6-7,10-13अ

1) प्रभु ने समूएल से कहा, "तुम कब तक उस साऊल के कारण शोक मनाते रहोगे, जिसे मैंने इस्राएल के राजा के रूप में अस्वीकार किया है? तुम सींग में तेल भर कर जाओ। मैं तुम्हें बेथलेहेम-निवासी यिशय के यहाँ भेजता हूँ, क्योंकि मैंने उसके पुत्रों में एक को राजा चुना है।"

6) जब वे आये और समूएल ने एलीआब को देखा, तो वह यह सोचने लगा कि निश्चय ही यही ईश्वर का अभिषिक्त है।

7) परन्तु ईश्वर ने समूएल से कहा, "उसके रूप-रंग और लम्बे क़द का ध्यान न रखो। मैं उसे नहीं चाहता। प्रभु मनुष्य की तरह विचार नहीं करता। मनुष्य तो बाहरी रूप-रंग देखता है, किन्तु प्रभु हृदय देखता है।"

10) इस प्रकार यिशय ने अपने सात पुत्रों को समूएल के सामने उपस्थित किया। किन्तु समूएल ने यिशय से कहा, "प्रभु ने उन में किसी को भी नहीं चुना।"

11) उसने यिशय से पूछा, "क्या तुम्हारे पुत्र इतने ही है? "यिशय ने उत्तर दिया, "सब से छोटा यहाँ नहीं है। वह भेडे़ चरा रहा है।" तब समूएल ने यिशय से कहा, "उसे बुला भेजो। जब तक वह नहीं आयेगा, हम भोजन पर नहीं बैठेंगे।"

12) इसलिए यिशय ने उसे बुला भेजा। लड़के का रंग गुलाबी, उसकी आँखें सुन्दर और उसका शरीर सुडौल था। ईश्वर ने समूएल से कहा, "उठो, इसका अभिशेक करो। यह वही है।"

13) समूएल ने तेल का सींग हाथ में ले लिया और उसके भाइयों के सामने उसका अभिशेक किया। ईश्वर का आत्मा दाऊद पर छा गया और उसी दिन से उसके साथ विद्यमान रहा। समूएल लौट कर रामा चल दिया।

📕 दूसरा पाठ : एफेसियों 5:8-14

8) आप लोग पहले ’अन्धकार’ थे, अब प्रभु के शिष्य होने के नाते ’ज्योति’ बन गये हैं। इसलिए ज्योति की सन्तान की तरह आचरण करें।

9) जहाँ ज्योति है, वहाँ पर हर प्रकार की भलाई, धार्मिकता तथा सच्चाई उत्पन्न होती है।

10) आप यह पता लगाते रहें कि प्रभु को कौन-सी बातें प्रिय हैं,

11) लोग जो व्यर्थ के काम अंधकार में करते हैं, उन से आप दूर रहें और उनकी बुराई प्रकट करें।

12) वे जो काम गुप्त रूप से करते हैं, उनकी चर्चा करने में भी लज्जा आती है।

13) ज्योति इन सब बातों की बुराई प्रकट करती और इनका वास्तविक रूप स्पष्ट कर देती है।

14) ज्योति जिसे आलोकित करती है, वह स्वयं ज्येाति बन जाता है। इसलिए कहा गया है -नींद से जागो, मृतकों में से जी उठो और मसीह तुम को आलोकित कर देंगे।

📙 सुसमाचार : योहन 9:1-41 अथवा 9:1,6-9,13-17,34-38

1) रास्ते में ईसा ने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म से अन्धा था।

2) उनके शिष्यों ने उन से पूछा, "गुरुवर! किसने पाप किया था, इसने अथवा इसके माँ-बाप ने, जो यह मनुष्य जन्म से अन्धा है?"

3) ईसा ने उत्तर दिया, "न तो इस मनुष्य ने पाप किया और न इसके माँ-बाप ने। यह इसलिए जन्म से अन्धा है कि इसे चंगा करने से ईश्वर का सामर्थ्य प्रकट हो जाये।

4) जिसने मुझे भेजा, हमें उसका कार्य दिन बीतने से पहले ही पूरा कर देना है। रात आ रही है, जब कोई भी काम नहीं कर सकता।

5) मैं जब तक संसार में हूँ, तब तक संसार की ज्योति हूँ।"

6) उन्होंने यह कह कर भूमि पर थूका, थूक से मिट्टी सानी और वह मिट्टी अन्धे की आँखों पर लगा कर

7) उस से कहा, "जाओ, सिलोआम के कुण्ड में नहा लो"। सिलोआम का अर्थ है ‘प्रेषित’। वह मनुष्य गया और नहा कर वहाँ से देखता हुआ लौटा।

8) उसके पड़ोसी और वे लोग, जो उसे पहले भीख माँगते देखा करते थे, बोले, "क्या यह वही नहीं है, जो बैठे हुए भीख माँगा करता था?"

9) कुछ लोगों ने कहा, "हाँ, यह वही है"। कुछ ने कहा, "नहीं, यह उस-जैसा कोई और होगा"। उसने कहा, मैं वही हूँ"।

10) इस पर लोगों ने उस से पूछा, "तो, तुम कैसे देखने लगे?"

11) उसने उत्तर दिया, "जो मनुष्य ईसा कहलाते हैं, उन्होंने मिट्टी सानी और उसे मेरी आँखों पर लगा कर कहा- सिलोआम जाओ और नहा लो। मैं गया और नहाने के बाद देखने लगा।"

12) उन्होंने उस से पूछा, "वह कहाँ है?" और उसने उत्तर दिया, "मैं नहीं जानता"।

13) लोग उस मनुष्य को, जो पहले अन्धा था, फरीसियों के पास ले गये।

14) जिस दिन ईसा ने मिट्टी सान कर उसकी आँखें अच्छी की थीं, वह विश्राम का दिन था।

15) फिरीसियों ने भी उस से पूछा कि वह कैसे देखने लगा। उसने उन से कहा, "उन्होंने मेरी आँखों पर मिट्टी लगा दी, मैंने नहाया और अब मैं देखता हूँ"।

16) इस पर कुछ फरीसियों ने कहा, "वह मनुष्य ईश्वर के यहाँ से नहीं आया है; क्योंकि वह विश्राम-दिवस के नियम का पालन नहीं करता"। कुछ लोगों ने कहा, "पापी मनुष्य ऐसे चमत्कार कैसे दिखा सकता है?" इस तरह उन में मतभेद हो गया।

17) उन्होंने फिर अन्धे से पूछा, "जिस मनुष्य ने तुम्हारी आँखें अच्छी की हैं, उसके विषय में तुम क्या कहते हो?" उसने उत्तर दिया, "वह नबी है"।

18) यहूदियों को विश्वास नहीं हो रहा था कि वह अन्धा था और अब देखने लगा है। इसलिए उन्होंने उसके माता-पिता को बुला भेजा

19) और पूछा, "क्या यह तुम्हारा बेटा है, जिसके विषय में तुम यह कहते हो कि यह जन्म से अन्धा था? तो अब यह कैसे देखता है?"

20) उसके माता-पिता ने उत्तर दिया, "हम जानते हैं कि यह हमारा बेटा है और यह जन्म से अन्धा था;

21) किन्तु अब यह कैसे देखता है- हम यह नहीं जानते। हम यह भी नहीं जानते कि किसने इसकी आँखें अच्छी की हैं। यह सयाना है, इसी से पूछ लीजिए। यह अपनी बात आप ही बोलगा।"

22) उसके माता-पिता ने यह इसलिए कहा कि वे यहूदियों से डरते थे। यहूदी यह निर्णय कर चूके थे कि यदि कोई ईसा को मसीह मानेगा, तो वह सभागृह से बहिष्कृत कर दिया जायेगा।

23) इसलिए उसके माता-पिता ने कहा-"यह सयाना है, इसी से पूछ लीजिए’।

24) उन्होंने उस मनुष्य को, जो पहले अन्धा था, फिर बुला भेजा और उसे शपथ दिला कर कहा, "हम जानते हैं कि वह मनुष्य पापी है"।

25) उसने उत्तर दिया, "वह पापी है या नहीं, इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। मैं यही जानता हूँ कि मैं अन्धा था और अब देखता हूँ।"

26) इस पर उन्होंने उस से फिर पूछा, "उसने तुम्हारे साथ क्या किया? उसने तुम्हारी आँखे कैसे अच्छी कीं?

27) उसने उत्तर दिया, "मैं आप लोगों को बता चुका हूँ, लेकिन आपने उस पर ध्यान नहीं दिया। अब फिर क्यों सुनना चाहते हैं? क्या आप लोग भी उनके शिष्य बनना चाहते हैं?"

28) वे उसे बुरा-भला कहते हुए बोले, "तू ही उसका शिष्य बन जा। हम तो मूसा के शिष्य हैं।

29) हम जानते हैं कि ईश्वर ने मूसा से बात की है, किन्तु उस मनुष्य के विषय में हम नहीं जानते कि वह कहाँ का है।"

30) उसने उन्हें उत्तर दिया, "यही तो आश्चर्य की बात है। उन्होंने मुझे आँखे दी हैं और आप लोग यह भी नहीं जानते कि वह कहाँ के हैं।

31) हम जानते हैं कि ईश्वर पापियों की नहीं सुनता। वह उन लोगों की सुनता है, जो भक्त हैं और उसकी इच्छा पूरी करते हैं।

32) यह कभी सुनने में नही आया कि किसी ने जन्मान्ध को आँखें दी हैं।

33) यदि वह मनुष्य ईश्वर के यहाँ से नहीं आया होता, तो वह कुछ भी नहीं कर सकता।"

34) उन्होंने उस से कहा, "तू तो बिलकुल पाप में ही जन्मा है। तू हमें सिखाने चला है?" और उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया।

35) ईसा ने सुना कि फरीसियों ने उसे बाहर निकाल दिया है; इसलिए मिलने पर उन्होंने उस से कहा, "क्या तुम मानव पूत्र में विश्वास करते हो?"

36) उसने उत्तर दिया, "महोदय! मुझे बता दीजिए कि वह कौन है, जिससे मैं उस में विश्वास कर सकूँ।

37) ईसा ने उस से कहा, "तुमने उसे देखा है। वह तो तुम से बातें कर रहा है।"

38) उसने उन्हें दण्डवत् करते हुए कहा "प्र्रभु! मैं विश्वास करता हूँ"।

39) ईसा ने कहा, "मैं लोगों के प्रथक्करण का निमित्त बन कर संसार में आया हूँ, जिससे जो अन्धे हैं, वे देखने लगें और जो देखते हैं, वे अन्धे हो जायें"।

40) जो फरीसी उनके साथ थे, वे यह सुन कर बोले, "क्या हम भी अन्धे हैं?"

41) ईसा ने उन से कहा, "यदि तुम लोग अन्धे होते, तो तुम्हें पाप नहीं लगता, परन्तु तुम तो कहते हो कि हम देखते हैं; इसलिए तुम्हारा पाप बना रहता है।

प्रवचन - 01

समस्याएं, बीमारी, परेशानियॉ जीवन का अभिन्न अंग है। ये बातें सामान्य जीवन में अवरोधक हैं। सभी इससे बचने का प्रयत्न करते हैं किन्तु कोई भी प्राणी इससे अछूता नहीं रह सकता है। जिस प्रकार हम इन अवरोधों का सामना करते हैं वह हमारे जीवन को परिभाषित करता था उसे निर्धारित करता है। संत योहन के सुसमाचार अध्याय 9 में हम जंमांध अंधे को पाते हैं। उस जंमांध अंधे को देखकर सभी लोग अपना-अपना राग अलाप रहे थे। शिष्य भी इसके बारे में अधिक सकारात्मक नहीं सोचते थे। वे येसु से पूछते हैं, ’’गुरुवर! किसने पाप किया था, इसने अथवा इसके माँ-बाप ने, जो यह मनुष्य जन्म से अन्धा है?’’ शिष्यों तथा शायद अधिकांश लोगों के लिये उस व्यक्ति का अंधापन एक समस्या है। उसका अंधापन किसी के पाप का कारण है किन्तु येसु के लिये यह समस्या एक अवसर है। येसु के लिये अंधकार, ज्योति को लाने का अवसर है। इसलिये वे कहते हैं, ’’न तो इस मनुष्य ने पाप किया और न इसके माँ-बाप ने। यह इसलिए जन्म से अन्धा है कि इसे चंगा करने से ईश्वर का सामर्थ्य प्रकट हो जाये।’’ येसु के लिये उसका अंधापन पिता ईश्वर की कृपा को चंगाई के रूप में उस पर प्रकट करने का अवसर था।

कई बार हम समस्याओं को बाधा मानते हैं किन्तु येसु हमें सिखाते हैं कि समस्याएं बाधा नहीं बल्कि अपनी क्षमताओं और सामर्थ्य को प्रदर्शित करने का अवसर है। संत मत्ती के सुसमाचार अध्याय 14 में हम रोटियों के चमत्कार का वर्णन पाते हैं। जब येसु भीड़ को देखते हैं तो उन्हें उन पर तरस आता है तथा वे उनमें जो रोगी थे उनको चंगा करते हैं। जब दिन ढलने को होता है तो शिष्यों के लिये यह भीड एक समस्या तथा बोझ बन जाती है। वे इससे छुटकारा पाने के लिये येसु को पूर्व में ही सूचित करते हुये कहते हैं, ’’यह स्थान निर्जन है और दिन ढल चुका है। लोगों को विदा कीजिए, जिससे वे गाँवों में जा कर अपने लिए खाना खरीद लें।’’ किन्तु येसु उनसे कहते हैं, ’’उन्हें जाने की जरूरत नहीं। तुम लोग ही उन्हें खाना दे दो। इस पर शिष्यों ने कहा ’पाँच रोटियों और दो मछलियों के सिवा यहाँ हमारे पास कुछ नहीं है।’’ येसु इस समस्या को अवसर के रूप में प्रदर्शित करते हुये शिष्यों से जो कुछ उनके पास था उसे उनके पास ले आने के लिये कहते हैं, ’’उन्हें यहाँ मेरे पास ले आओ।’’ (मत्ती 14:15-18) येसु उन पर आशिष की प्रार्थना कर उसे सभी के लिये भोजन में बना देते हैं। इस प्रकार जो शिष्यों के लिये समस्या थी उसे येसु पिता की दया को प्रदर्शित करने का अवसर बना देते हैं। रोचक तथ्य यह है कि बचे हुये टुकडों से बारह टोकरियॉ भर जाती है। ऐसा इसलिये प्रतीत होता है मानो बारह टोकरियॉ येसु के बारह शिष्यों के लिये एक पाठ या सीख हो कि समझों ईश्वर किस प्रकार हमारे अभावों या समस्याओं को अपने महान चमत्कार के द्वारा हमारी समझ से ज्यादा परितृप्त कर सकता है।

लाजरूस की बीमारी, उसकी मृत्यु तथा मृत अवस्था से पुनः जीवन पाने का घटनाक्रम इस बात को और भी अधिक रूप से प्रतिपादिक करता है कि येसु के लिये समस्या या जाटिल परिस्थिति पिता की महिमा प्रकट करने का अवसर है। लाजरूस की ’’बहनों ने ईसा को कहला भेजा, प्रभु! देखिये, जिसे आप प्यार करते हैं, वह बीमार है। ईसा ने यह सुनकर कहा, ’यह बीमारी मृत्यु के लिये नहीं, बल्कि ईश्वर की महिमा के लिये आयी है। इसके द्वारा ईश्वर का पुत्र महिमान्वित होगा।’’(योहन 11:3-4) येसु का यह कथन आने वाले घटनाक्रम के लिये था जिसके द्वारा वे न सिर्फ मृत लाजरूस को पुनः जीवन प्रदान करने का महान कार्य करेंगे बल्कि दूसरों तथा विशेषकर उनकी बहनों मरथा और मरियम में पुनरूत्थान के प्रति विश्वास भी दृढ़ बनायेंगे। (देखिये योहन 11:1-44)

संत लूकस के सुसमाचार 8:41-53 में जैरूस की पुत्री के पुनः जीवन पाने की घटना है। जब सभागृह का अधिकारी जैरूस येसु के पास आता है तो उसकी बारह बरस की बेटी मरने को थी। येसु के लिये उस तक जल्द-से-जल्द से पहुॅचना अनिवार्य था अन्यथा वह मर जायेगी। येसु इस कार्य हेतु निकल भी पडते हैं। किन्तु रास्ते में कोई उन्हें छू लेता है। ऐसी आपातकालीन परिस्थिति में भी येसु उस रक्तस्राव से पीडित महिला को नजरअंदाज नहीं करते वरन उस स्त्री के ’विश्वास के स्पर्श’, जो उसके विश्वास की अभिव्यक्ति थी, को सारी भीड के सामने दिखाने का अवसर देखते हैं। इस दौरान देर हो जाती तथा मार्ग में ही सूचना मिलती है कि जैरूस की बेटी मर चुकी है। येसु इस शोकमय परिस्थिति को पिता की महिमा दिखाने के अवसर के रूप में देखते हैं और घर जाकर मृत बालिका से कहते हैं, ’’ओ लड़की! उठो!’’ उसके प्राण लौट आये और वह उसी क्षण उठ खड़ी हो गयी। ईसा ने उसे कुछ खिलाने को कहा।’’ (लूकस 8:54-55)

इस प्रकार येसु हर बीमारी, विवाद, पूछताछ आदि की समस्याग्रसित परिस्थितियों को अपनी शिक्षा देने पिता ईश्वर की महिमा प्रकट करने तथा उनकी योजना को प्रदर्शित करने के अवसर के रूप में देखते हैं। यहॉ तक कि उनका दुखभोग, क्रूस पर प्राणपीडा, मृत्यु जैसी घोर परिस्थितियॉ भी येसु को इन्हें पिता का साक्ष्य देने के अवसर बनाने से नहीं रोक सके।

शिष्यों तथा अन्यों के लिये वह जंमांध व्यक्ति एक नकारात्मक समस्या था। उनके लिये वह पाप का प्रतीक था किन्तु येसु के लिये वह अवसर था। हम अपने जीवन की समस्यों एवं चुनौतियों को कैसे लेते हैं? शायद कुडकुडाकर या उदास होकर या फिर स्वयं को बेचारा समझकर। किन्तु यही वह समय होता जब हम अपने विश्वास के द्वारा इन्हें अपने विश्वास की अभिव्यक्ति के अवसर के रूप में देख सकते हैं। हमें जीवन की समस्याओं को अवसर मानना तथा बनाना चाहिये। येसु का जीवन हमें इसी बात को सिखाता है।

- फादर रोनाल्ड वाँन

HOMILY - 01

Problems, sicknesses, tensions are integral part of human life. However, these things are deterrent to our normal life. We all try to escape and run away from these deterrents but no one can escape from them. Our problems do not define us but how we handle them shape and mould our life. In St. John’s gospel chapter 9 we encounter a man born blind. Many people have their own theories and opinions about his blindness. Even the disciples were not exception to this. They asked Jesus, “Rabbi, who sinned, this man or his parents, that he was born blind?” For them his blindness is a problem because they think it is an outcome of sin. But Jesus sees differently. For him it is an opportunity to manifest God’s glory as he says, “Neither this man nor his parents sinned; he was born blind so that God’s works might be revealed in him.”

Many a times and very often we consider our difficulties as problems but the Lord Jesus teaches us problems are occasion to show forth our strength and calibre. In Matthew 14 we have the miracle of multiplication of bread. When Jesus sees the crowd, he had pity on them and he healed many of them. When the day was coming to end the crowd become a problem for the disciples. So they caution Jesus to disperse them, ‘This is a deserted place, and the hour is now late; send the crowds away so that they may go into the villages and buy food for themselves.’ Jesus said to them, ‘They need not go away; you give them something to eat.’ They replied, ‘We have nothing here but five loaves and two fish.’ And he said, ‘Bring them here to me.’ (Mt. 14:15-18) Lord blesses the five loaves and two fish and turns them into a food for thousands of them. What was a problem for the disciples Jesus turns it into an occasion to manifest God’s glory. Interestingly the twelve baskets leftover crumbs seem to be left for the twelve disciples to believe and remember how a problem was turned into a miracle.

The events of Lazarus’s illness, his death and rising to life prove this point much more powerfully that a grave situation or a difficulty is an opportunity for Jesus. “So the sisters sent a message to Jesus, ‘Lord, he whom you love is ill.’ But when Jesus heard it, he said, ‘This illness does not lead to death; rather it is for God’s glory, so that the Son of God may be glorified through it.” (John 11:3-4) Jesus’ statement was an indication of the things that would follow and he would not only give life to dead Lazarus but also stir and strengthen the faith of others specially of Lazarus’ sisters Marth and Mary in the resurrection.

Luke’s gospel 8:41-53 narrates how the daughter of Jairus was raised to life. When the official Jairus approached Jesus, his daughter was about to die. It was important that Jesus should reach his house at the earliest. However, on the way Jesus encounter great crowd and in it a woman who touches the fringe of his garment to be healed. Jesus amidst this commotion makes this ‘touch of faith’ of the woman to become an example of faith to all. So, he calls her to bear witness to the healing she had received. All this happening had delayed Jesus and meanwhile the daughter had died. Yet Jesus is not discouraged but he further exploits the grave situation to manifest God’s glory and raises the dead girl to life. “He took her by the hand and called out, ‘Child, get up!’ Her spirit returned, and she got up at once. Then he directed them to give her something to eat.” (Luke 8:54-55)

Jesus always saw the sickness, opposition, inquiry etc. as occasions and opportunity to teach and give glory to God and manifest his plan for the world. Even he considered his trial, passion and death to be an occasion to bear witness to the will of God the father.

For the disciples and perhaps for many people the man born blind was a negative situation. It was perceived to be a cause of sin but for the Lord it was an occasion. How do we see the difficulties and challenges of our life? How do we accept and handle them? Many a times we grumble and curse the situation and sadly drag beneath them. But those are the moments we need to sum up our faith and turn them into opportunities to bear witness to the world of our faith.

-Fr. Ronald Vaughan


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Praise the Lord!