चक्र ’अ’ - वर्ष का पाँचवाँ सामान्य इतवार



📒 पहला पाठ : इसायाह 58:7-10

7) अपनी रोटी भूखों के साथ खाना, बेघर दरिद्रों को अपने यहाँ ठहराना। जो नंगा है, उसे कपड़े पहनाना और अपने भाई से मुँह नहीं मोड़ना।

8) तब तुम्हारी ज्योति उषा की तरह फूट निकलेगी और तुम्हारा घाव शीघ्र ही भर जायेगा। तुम्हारी धार्मिकता तुम्हारे आगे-आगे चलेगी और ईश्वर की महिमा तुम्हारे पीछे-पीछे आती रहेगी।

9) यदि तुम पुकारोगे, तो ईश्वर उत्तर देगा। यदि तुम दुहाई दोगे, तो वह कहेगा-‘देखो, मैं प्रस्तुत हूँ‘। यदि तुम अपने बीच से अत्याचार दूर करोगे, किसी पर अभियोग नहीं लगाओगे और किसी की निन्दा नहीं करोगे;

10) यदि तुम भूखों को अपनी रोटी खिलाओगे और पद्दलितों को तृप्त करोगे, तो अन्घकार में तुम्हारी ज्योति का उदय होगा और तुम्हारा अन्धकार दिन का प्रकाश बन जायेगा।

📕 दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 2:1-5

1) भाइयो! जब मैं ईश्वर का सन्देश सुनाने आप लोगों के यहाँ आया, तो मैंने शब्दाडम्बर अथवा पाण्डित्य का प्रदर्शन नहीं किया।

2) मैंने निश्चय किया था कि मैं आप लोगों से ईसा मसीह और क्रूस पर उनके मरण के अतिरिक्त किसी और विषय पर बात नहीं करूँगा।

3) वास्तव में मैं आप लोगों के बीच रहते समय दुर्बल, संकोची और भीरू था।

4) मेरे प्रवचन तथा मेरे संदेश में विद्वतापूर्ण शब्दों का आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा का सामर्थ्य था,

5) जिससे आप लोगों का विश्वास मानवीय प्रज्ञा पर नहीं, बल्कि ईश्वर के सामर्थ्य पर आधारित हो।

📙 सुसमाचार : मत्ती 5:13-16

(13) "तुम पृथ्वी के नमक हो। यदि नमक फीका पड़ जाये, तो वह किस से नमकीन किया जायेगा? वह किसी काम का नहीं रह जाता। वह बाहर फेंका और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाता है।

(14) "तुम संसार की ज्योति हो। पहाड़ पर बसा हुआ नगर छिप नहीं सकता।

(15) लोग दीपक जला कर पैमाने के नीचे नहीं, बल्कि दीवट पर रखते हैं, जहाँ से वह घर के सब लोगों को प्रकाश देता है।

(16) उसी प्रकार तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सामने चमकती रहे, जिससे वे तुम्हारे भले कामों को देख कर तुम्हारे स्वर्गिक पिता की महिमा करें।

📚 मनन-चिंतन

नमक खाने को स्वादिष्ट बनाता है। फिर भी यह गुप्त रहता है। नमक एक परिरक्षक भी है। वह कई चीज़ों को खराब होने से बचाता है। नमक खाद के रूप में भी काम करता है। यह बहुत तेजी से अपने आप को खो देता है। यह अपने आस-पास की सामग्री का हिस्सा बन जाता है और अंत में अपनी सेवा में अपनी व्यष्टित्व खो देता है। जब भी नमक नही रहता या कम या अधिक होता है - लोग उस पर ध्यान रखते हैं। जब यह पर्याप्त मात्रा में होता है तो लोग वास्तव में इसकी उपस्थिति पर ध्यान ही नहीं देते हैं। येसु हमें याद दिलाते हैं कि हमें पृथ्वी के लिए नमक बनना चाहिए। ख्रीस्तीय विश्वासियों को समाज का अंत:करण बनना चाहिए। उनका कर्तव्य है कि वे समाज की अच्छाई को बचाए रखें, उन सभी समुदायों और संगठनों को स्वादिष्ट बनायें जहां वे मौजूद हैं। उन्हें हर समाज में अच्छाई का पोषण करना चाहिए। वे दूसरों के लिए जीने में अपनी सार्थकता पाते हैं। आइए हम लगातार इस उदात्त बुलाहट के बारे में अवगत हो कर आगे बढ़ते जायें।

-फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

Salt adds taste to food. Yet it remains unseen. It is a preservative. It acts as manure too. It gets diluted very fast. It becomes part of the material around it and finally loses its individuality in its service. Whenever it is absent or less or more – people take note of it. When it is in adequate quantity people do not really take note of its presence. Jesus reminds us that we are to be salt for the earth. Christians are to be the conscience of the society. They have a duty to preserve the goodness of the society, to add taste to the all communities and organizations where they are present. They are to nurture the goodness in every society. They become meaningful in being for others. Let us constantly be aware of this sublime vocation.

-Fr. Francis Scaria


Copyright © www.jayesu.com
Praise the Lord!