सोमवार - आगमन का तीसरा सप्ताह



पहला पाठ : गणना 24:2-7,15-17

2) अपनी आँखें ऊपर उठायीं और इस्राएलियों को देखा, जो अपने-अपने वंश के अनुसार शिविर डाल चुके थे। ईश्वर का आत्मा उस पर उतरा

3) और वह अपना यह काव्य सुनाने लगाः

4) यह उसकी भविष्यवाणी है, जो ईश्वर के वचन सुनता

5) याकूब! तुम्हारे तम्बू कितने सुन्दर है!

6) वे घाटियों की तरह फैले हुए हैं,

7) इस्राएलियों के पात्र जल से भरे रहेंगे,

15) इसके बाद बिलआम ने फिर कहा

16) यह उसकी भविष्यवाणी है, जो ईश्वर के वचन सुनता

17) मैं उसे देखता हूँ - किन्तु वर्तमान में नहीं,

सुसमाचार : मत्ती 21:23-27

23) जब ईसा मंदिर पहुँच गये थे और शिक्षा दे रहे थे, तो महायाजक और जनता के नेता उनके पास आ कर बोले, "आप किस अधिकार से यह सब कर रहें हैं? किसने आप को यह अधिकार दिया ?"

24) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "मैं भी आप लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। यदि आप मुझे इसका उत्तर देंगे, तो मैं भी आपको बता दूँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।

25) योहन का बपतिस्मा कहाँ का था? स्वर्ग का अथवा मनुष्यों का?" वे यह कहते हुए आपस में परामर्श करते थे - "यदि हम कहें: ’स्वर्ग का’, तो यह हम से कहेंगे, ’तब आप लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया?’

26) यदि हम कहें: ’मनुष्यों का’, तो जनता से डर है! क्योंकि सब योहन को नबी मानते हैं।"

27) इसलिए उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, "हम नहीं जानते"। इस पर ईसा ने उन से कहा, "तब मैं भी आप लोगों को नहीं बताऊँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।


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