चक्र - स - पास्का का छठवाँ इतवार



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 15:1-2,22-30

1) कुछ लोग यहूदिया से अन्ताखि़या आये और भाइयों को यह शिक्षा देते रहे कि यदि मूसा से चली आयी हुई प्रथा के अनुसार आप लोगों का ख़तना नहीं होगा, तो आप को मुक्ति नहीं मिलेगी।

2) इस विषय पर पौलुस और बरनाबस तथा उन लोगों के बीच तीव्र मतभेद और वाद-विवाद छिड़ गया, और यह निश्चय किया गया कि पौलुस तथा बरनाबस अन्ताखि़या के कुछ लोगों के साथ येरूसालेम जायेंगे और इस समस्या पर प्रेरितों तथा अध्यक्षों से परामर्श करेंगे।

22) तब सारी कलीसिया की सहमति से प्रेरितों तथा अध्यक्षों ने निश्चय किया कि हम में कुछ लोगों को चुन कर पौलुस तथा बरनाबस के साथ अन्ताखि़या भेजा जाये। उन्होंने दो व्यक्तियों को चुना, जो भाइयों में प्रमुख थे, अर्थात् यूदस को, जो बरसब्बास कहलाता था, तथा सीलस को,

23) और उनके हाथ यह पत्र भेजा: "प्रेरित तथा अध्यक्ष, आप लोगों के भाई, अन्ताखि़या, सीरिया तथा किलिकिया के ग़ैर-यहूदी भाइयों को नमस्कार करते हैं।

24) हमने सुना है कि हमारे यहाँ के कुछ लोगों ने, जिन्हें हमने कोई अधिकार नहीं दिया था, अपनी बातों से आप लोगों में घबराहट उत्पन्न की और आपके मन को उलझन में डाल दिया है।

25) इसलिए हमने सर्वसम्मति से निर्णय किया है कि प्रतिनिधियों का चुनाव करें और उन को अपने प्रिय भाई बरनाबस और पौलुस के साथ,

26) जिन्होंने हमारे प्रभु ईसा मसीह के नाम पर अपना जीवन अर्पित किया है, आप लोगों के पास भेजें।

27) इसलिए हम यूदस तथा सीलस को भेज रहे हैं। वे भी आप लोगों को यह सब मौखिक रूप से बता देंगे।

28) पवित्र आत्मा को और हमें यह उचित जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों के सिवा आप लोगों पर कोई और भार न डाला जाये।

29) आप लोग देवमूर्तियों पर चढ़ाये हुए मांस से, रक्त, गला घोंटे हुए पशुओं के मांस और व्यभिचार से परहेज़ करें। इन से अपने को बचाये रखने में आप लोगों का कल्याण है। अलविदा!"

30) वे विदा हो कर अन्ताखि़या चल दिये और वहाँ पहुँच कर उन्होंने भाइयों को एकत्र कर वह पत्र दिया।

दूसरा पाठ : प्रकाशना 21:10-14,22-23

10) मैं आत्मा से आविष्ट हो गया और स्वर्गदूत ने मुझे एक विशाल तथा ऊँचे पर्वत पर ले जा कर पवित्र नगर येरूसालेम दिखाया। वह ईश्वर के यहाँ से आकाश में उतर रहा था।

11) वह ईश्वर की महिमा से विभूषित था और बहुमूल्य रत्न तथा उज्ज्वल सूर्यकान्त की तरह चमकता था।

12) उसके चारों ओर एक बड़ी और उँची दीवार थी, जिस में बारह फाटक थे और हर एक फाटक के सामने एक स्वर्गदूत खड़ा था। फाटकों पर इस्राएल के बारह वंशों के नाम अंकित थे।

13) पूर्व की आरे तीन, उत्तर की और तीन, पश्चिम की आरे तीन और दक्षिण की ओर तीन फाटक थे।

14) नगर की दीवार नींव के बारह पत्थरों पर खड़ी थी और उन पर मेमने के बारह प्रेरितों के नाम अंकित थे।

15) जो मुझ से बातें कर रहा था, उसके पास नगर, उसके फाटक और उसकी दीवार नापने के लिए एक मापक-दण्ड, सोने का सरकण्डा था।

16) नगर वर्गाकार था। उसकी लम्बाई उसकी चौड़ाई के बराबर थी। उसने सरकण्डे से नगर नापा, तो बारह हजार ुफरलांग निकला। उसकी लम्बाई, चौड़ाई और उंचाई बराबर थी।

17) उसने उसकी दीवार नापी, तो- मनुष्यों में प्रचिलत माप के अनुसार, जिसका स्वर्गदूत ने उपयोग किया- एक सौ चौवालीस हाथ निकला।

18) नगर की दीवार सूर्यकान्त की बनी थी, लेकिन नगर विशुद्ध स्वर्ण का बना था, जो स्फटिक जैसा चमकता था।

19) दीवार की नींव नाना प्रकार के रत्नों की बनी थी। पहली परत सूर्यकान्त की थी, दूसरी नीलम की, तीसरी गोदन्ती की, चौथी मरकत की,

20) पांचवी गोमेदक की, छठी रूधिराख्य की, सातवीं स्वर्णमणि की, आठवीं फीरोजे की, नवीं पुखराज की, दसवीं रूद्राक्षक की, ग्यारहवीं धूम्रकान्त की और बाहरवीं चन्द्रकान्त की।

21) बारह फाटक बारह मोतियों के बने थे, प्रत्येक फाटक एक-एक मोती का बना था। नगर का चौक पारदर्शी स्फटिक-जैसे विशुद्ध सोने का बना था।

22) मैंने उस में कोई मन्दिर नहीं देखा, क्योंकि सर्वशक्तिमान् प्रभु-ईश्वर उसका मन्दिर है और मेमना भी।

23) नगर को सूर्य अथवा चन्द्रमा के प्रकाश की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ईश्वर की महिमा उसकी ज्योति और मेमना उसका प्रदीप है।

सुसमाचार : योहन 14:23-29

23) ईसा ने उसे उत्तर दिया यदि कोई मुझे प्यार करेगा तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आकर उस में निवास करेंगे।

24) जो मुझे प्यार नहीं करता, वह मेरी शिक्षा पर नहीं चलता। जो शिक्षा तुम सुनते हो, वह मेरी नहीं बल्कि उस पिता की है, जिसने मुझे भेजा।

25) तुम्हारे साथ रहते समय मैंने तुम लोगों को इतना ही बताया है।

26) परन्तु वह सहायक, वह पवित्र आत्मा, जिसे पिता मेरे नाम पर भेजेगा तुम्हें सब कुछ समझा देगा। मैंने तुम्हें जो कुछ बताया, वह उसका स्मरण दिलायेगा।

27) मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो।

28) तुमने मुझ को यह कहते सुना- मैं जा रहा हूँ और फिर तुम्हारे पास आऊँगा। यदि तुम मुझे प्यार करते, तो आनन्दित होते कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ, क्योंकि पिता मुझ से महान है।

29) मैंने पहले ही तुम लोगों को यह बताया, जिससे ऐसा हो जाने पर तुम विश्वास करो।

मनन-चिंतन

प्रभु ईश्वर ने मूसा को दस नियम दिये और उनमें से पहला नियम सम्पूर्ण संहिता और हमारे जीवन के लिए सबसे बड़ी आज्ञा है। ‘‘ईसा ने उस से कहा, ‘अपने ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो। यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है’’’ (मत्ती 9:36)। हमारे जीवन में अशांति, तनाव, अधूरापन, असंतुष्टि इत्यादि का कारण यही है कि हम अपने जीवन में ईश्वर की सबसे बड़ी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं। पुनरुत्थान के बाद प्रभु येसु ने पेत्रुस से तीन बार यह प्रश्न किया कि क्या तुम मुझे प्यार करते हो? (योहन 21:15-17)। आज प्रभु येसु हम सब से भी यही प्रश्न करते हैं कि क्या हम उन्हें प्यार करते हैं? अगर हम किसी ख्रीस्तीय से पूछे कि क्या आप येसु को प्यार करता है, तो उसका जवाब यही होगा - हाँ, मै करता हूँ या करती हूँ। परन्तु हमको यह कैसे मालूम हो जायेगा कि कौन प्रभु से सबसे अधिक या सच्चा प्रेम करता है। आज का वचन कहता है, ‘‘यदि कोई मुझे प्यार करेगा, तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा।’’ अगर हम किसी से अत्याधिक प्रेम करते हंत तो वह व्यक्ति हम से जो भी कहता है हम वही करते हैं - चाहे वह सही काम हो या बुरा। ठीक उसी प्रकार प्रभु की शिक्षा पर चलना यह दर्शाता है कि हम उनसे प्रेम करते हैं। प्रेम का प्रकटीकरण हमारे कार्यों द्वारा होता है। आज बहुत सारे लोग ख्रीस्तीय हैं, इसाई हैं, परन्तु क्या सभी ख्रीस्तीय प्रभु से प्रेम करते हैं? यह एक प्रश्न चिन्ह है। जो ख्रीस्तीय सचमुच में ईश्वर से प्रेम करते हैं, वह प्रेम उनके जीवन में, उनके व्यवहारों में प्रकट हो जाता है। क्योंकि येसु की दूसरी आज्ञा है ‘‘अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।’’

हम सब येसु से प्रेम करते हैं - यह सत्य है परन्तु यह भी सत्य है कि हम दूसरी चीज़ो से भी प्रेम करते हैं। इसलिए जरुरत आने पर अपनी सुविधा के अनुसार हम कुछ शिक्षा का पालन करते हैं और कुछ का नही। अर्थात् हमारा प्रेम बटां हुआ है। प्रभु येसु कहते हैं, ‘‘कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा’’ (मत्ती 6:24)। ‘‘जो अपने पिता या अपनी माता को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं।’’(मत्ती 10:37)। हम प्रभु से प्रेम तो करते हैं परन्तु सम्पूर्ण दिल से प्रेम नहीं करते। इसलिए जब कभी हमारे जीवन में कुछ संकट, कठिनाई आती है तब हम विचलित हो जाते हैं। परन्तु प्रभु का वचन कहता है ‘‘यदि तुमने मेरी आज्ञाओं का पालन किया होता, तो तुम्हारी सुख-शांति नदी की तरह उमड़ती रहती और तुम्हारी धार्मिकता समुद्र की लहरों की तरह’’ (इसा0 48:18)।

आज के सुसमाचार के अनुसार प्रभु इस संसार से जाते जाते हमें दो और उपहार दे कर गये। पहला पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा और दूसरा अपनी शांति। पवित्र आत्मा का आगमन हम पेन्तेकोस्त के दिन पाते हैं जहाँ पर माँ मरियम के साथ शिष्यगण प्रार्थना कर रहे थे और पवित्र आत्मा उन पर उतरा (प्रे0 च0 2)। यह इस बात का साक्ष्य है कि प्रभु ईसा ने हमें इस संसार में अकेला नहीं छोड़ा है परंतु हमारे लिए एक सहायक प्रदान किया है जिससे हम इस आधुनिक संसार में भी उसके वचनों पर चल सकें और उनके कार्य को आगे बढ़ा सकें। पवित्र आत्मा की सहायता के बिना पवित्र जीवन बिताना असंभव है। इसके साथ साथ प्रभु येसु अपनी शांति हम सभी के लिए छोड़ कर जाते हैं। यह शांति इस संसार की शांति जैसी नहीं है, परंतु दिव्य शांति है जो किसी और से प्राप्त नहीं हो सकती। इस आधुनिक दुनिया में सब कोई शांति की खोज में है, बहुत लोगों के पास सब कुछ है परंतु शांति नहीं है। और यह शांति सिर्फ प्रभु ईसा से प्राप्त हो सकती है।

आज के वचनों के द्वारा ईसा अपने शिष्यों को उस दिन के लिए तैयार करते हैं जब वे शारीरिक रूप से इस संसार में नहीं रहेंगे। जिनको बाद में होने वाली घटना का ज्ञान न हो तो उनके लिए उस समय येसु का उन से दूर चले जाना जीवन का सबसे बड़ा झटका था और बहुत ही दुविधा भरा समय था। इसलिए प्रभु उन्हें आने वाले समय के लिए तैयार करते हैं।

प्रभु येसु अपने अनुयाइयों को लौकिक या भौतिक वस्तुओं पर आसक्त न रह कर उसके साथ गहराई पूर्ण रिश्ते में जुड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं। अक्सर हम पुरानी चीजों को छोड़कर नयी चीजों को अपनाना नहीं चाहते जिससे हम पुराने जीवन में जीते रहते हैं और अपने वर्तमान को मृत्यु की ओर अग्रसर करते जाते हैं। आईये हम प्रभु ईसा के द्वारा हमारे जीवन में होने वाले पवित्र आत्मा के नये कार्य पर हम दृष्टि लगायें। प्रभु ईश्वर हम सबसे कहते हैं, ’’पिछली बातें भुला दो, पुरानी बातें जाने दो। देखो, मैं एक नया कार्य करने जा रहा हूँ। वह प्रारम्भ हो चुका है। क्या तुम उसे नहीं देखते?’’(इसा0 43:19)। आइए हम अपने जीवन में हमारे लिए ईश्वर की योजनाओं को समझने के लिए पवित्र आत्मा से सहायता माँगें।

-फादर डेन्नीस तिग्गा


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