चालीसा काल का पहला सप्ताह, मंगलवार



पहला पाठ : इसायाह 55:10-11

10) जिस तरह पानी और बर्फ़ आकाश से उतर कर भूमि सींचे बिना, उसे उपजाऊ बनाये और हरियाली से ढके बिना वहाँ नहीं लौटते, जिससे भूमि बीज बोने वाले को बीज और खाने वाले को अनाज दे सके,

11) उसी तरह मेरी वाणी मेरे मुख से निकल कर व्यर्थ ही मेरे पास नहीं लौटती। मैं जो चाहता था, वह उसे कर देती है और मेरा उद्देश्य पूरा करने के बाद ही वह मेरे पास लौट आती है।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 6:7-15

7) "प्रार्थना करते समय ग़ैर-यहूदियों की तरह रट नहीं लगाओ। वे समझते हैं कि लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करने से हमारी सुनवाई होती है।

8) उनके समान नहीं बनो, क्योंकि तुम्हारे माँगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन किन चीज़ों की ज़रूरत है।

9) तो इस प्रकार प्रार्थना किया करो- स्वर्ग में विराजमान हमारे पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाये।

10) तेरा राज्य आये। तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में, वैसे पृथ्वी पर भी पूरी हो।

11) आज हमारा प्रतिदिन का आहार हमें दे।

12) हमारे अपराध क्षमा कर, जैसे हमने भी अपने अपराधियों को क्षमा किया है।

13) और हमें परीक्षा में न डाल, बल्कि बुराई से हमें बचा।

14) यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा।

15) परन्तु यदि तुम दूसरों को क्षमा नहीं करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा नहीं करेगा।

📚 मनन-चिंतन

सुसमाचार में कई बार हम येसु को प्रार्थना में पाते हैं और कभी-कभी वे हमें प्रार्थना करना सिखाते हैं। येसु ने हमें 'हे हमारे पिता' की प्रार्थना सिखाई जिसे हम 'प्रभु की प्रार्थना' भी कहते हैं। ख्रीस्तीय परंपरा में इस प्रार्थना को विशेषाधिकार प्राप्त है क्योंकि यह एकमात्र प्रार्थना है जिसे येसु ने स्पष्ट रूप से हमें सिखाया है। ये एक ऐसी प्रार्थना है जिसे हम हमारे विभिन्न कलीसियाई समुदायों में एक रूप में पाते हैं और यह एक प्रार्थना है जिसे हम सभी एक साथ मिलकर कर सकते हैं। यह प्रार्थना से कहीं अधिक, यह प्रार्थना करने का तरीका है।

प्रार्थना का पहला भाग हमारी अपनी आवश्यकताओं के बजाय ईश्वर पर केंद्रित है - ईश्वर का नाम, उनका राज्य, उनकी इच्छा आदि । प्रार्थना अनिवार्य रूप से स्वयं की सेवा के बजाय ईश्वर की सेवा है। केवल उन याचिकाओं के बाद जो ईश्वर पर केंद्रित हैं येसु हमें सिखाते हैं कि हमें अपनी अपने जीवन की अन्य ज़रूरतों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए - हमारी जीविका की आवश्यकता के लिए प्रार्थना - दोनों भौतिक और आध्यात्मिक, क्षमा की आवश्यकता के लिए- जब हम पाप व बुराई के विरुद्ध संघर्ष करते हैं उस समय उद्धार के लिए। चाहे खुद के लिए प्रार्थना करते हों या औरों के लिए हमारी सभी प्रार्थनाएँ किसी न किसी तरह से प्रभु की प्रार्थना की उन मूलभूत याचिकाओं के अनुरूप हो।


-फादर प्रीतम वसूनिया (इन्दौर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION


The Gospels portray Jesus at prayer many times, and sometimes they give us the content of his prayer. However, only once is Jesus presented as teaching his disciples a prayer for them to pray, and that prayer has become known to us as the Lord’s Prayer. It is a prayer that has had a privileged place within the Christian tradition because it is the only prayer that Jesus explicitly taught us to pray. For all the differences across the various Christian denominations, this prayer is one that we all have in common. It is a prayer we can all pray together. It is more than a prayer; it is also a lesson on how to pray. The first part of the prayer is focuses on God rather than our own needs – God’s name, kingdom, will.

Only after those petitions that focus on God does Jesus teach us to focus on ourselves, our need for sustenance, both material and spiritual, our need for forgiveness, our need for deliverance when the struggle with evil, with what is opposed to God, comes our way. All of our prayers of petition for ourselves and for each other are to conform in some way to those fundamental petitions of the Lord’s Prayer.

-Fr. Preetam Vasuniya (Indore)


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Praise the Lord!