चालीसा काल का पहला सप्ताह, बुधवार



पहला पाठ : योना 3:1-10

1) प्रभु के वाणी योना को दूसरी बार यह कहते हुए सुनाई पडी,

2) "उठो! महानगर निनीवे जा कर वहाँ के लोगों को उपदेश दो, जैसा कि मैंने तुम्हें बताया है"।

3) इस पर योना उठ खडा हुआ और प्रभु के आज्ञानुसार निनीवे चला गया। निनीवे एक बहुत बड़ा शहर था। उसे पार करने में तीन दिन लगते थे।

4) योना ने उस में प्रवेश किया और एक दिन की यात्रा पूरी करने के बाद वह इस प्रकार उपदेश देने, लगा "चालीस दिन के बाद निनीवे का विनाश किया जायेगा"।

5) निनीवे के लोगों ने ईश्वर की बात पर विश्वास किया। उन्होंने उपवास की घोषणा की और बडों से लेकर छोटों तक सबों ने टाट ओढ लिया।

6) निनीवे के राजा ने यह खबर सुनी। उसने अपना सिंहासन छोड दिया, अपने वस्त्र उतार कर टाट पहन लिया और वह राख पर बैठ गया।

7) इसके बाद उसने निनीवे में यह आदेश घोषित किया, "यह राजा तथा उसके सामन्तों का आदेश है: चाहे मनुष्य हो या पशु, गाय-बैल हो या भेड-बकरी, कोई भी न तो खायेगा, न चरेगा और न पानी पियेगा।

8) सभी व्यक्ति टाट ओढ कर पूरी शक्ति से ईश्वर की दुहाई देंगे। सभी अपना कुमार्ग तथा अपने हाथों से होने वाले हिंसात्मक कार्य छोड दें।

9) क्या जाने ईश्वर द्रवित हो जाये, उसका क्रोध शान्त हो जाये और हमारा विनाश न हो"।

10) ईश्वर ने देखा कि वे क्या कर रहे हैं और किस प्रकार उन्होंने कुमार्ग छोड दिया है, तो वह द्रवित हो गया और उसने जिस विपत्ति की धमकी दी थी, उसे उन पर नहीं आने दिया।

सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:29-32

29) भीड़-की-भीड़ उनके चारों ओर उमड़ रही थी और वे कहने लगे, "यह एक विधर्मी पीढ़ी है। यह एक चिन्ह माँगती है, परन्तु नबी योनस के चिन्ह को छोड़ इसे और कोई चिन्ह नहीं दिया जायेगा।

30) जिस प्रकार योनस निनिवे-निवासियों के लिए एक चिन्ह बन गया था, उसी प्रकार मानव पुत्र भी इस पीढ़ी के लिए एक चिन्ह बन जायेगा।

31) न्याय के दिन दक्षिण की रानी इस पीढ़ी के लोगों के साथ जी उठेगी और इन्हें दोषी ठहरायेगी, क्योंकि वह सुलेमान की प्रज्ञा सुनने के लिए पृथ्वी के सीमान्तों से आयी थी, और देखो-यहाँ वह है, जो सुलेमान से भी महान् है!

32) न्याय के दिन निनिवे के लोग इस पीढ़ी के साथ जी उठेंगे और इसे दोषी ठहरायेंगे, क्योंकि उन्होंने योनस का उपदेश सुन कर पश्चात्ताप किया था, और देखो-यहाँ वह है, जो योनस से भी महान् है!

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में, येसु ने खुद को सुलेमान व नबी योना से बड़ा घोषित किया। इस सूचि में हम जोड़ सकते हैं- अब्राहम से अधिक, मूसा से अधिक, इसायाह, से अधिक आदि । येसु यहूदी धर्मग्रंथ की सभी प्रमुख हस्तियों से बड़े है क्योंकि येसु का सम्बन्ध पिता ईश्वर से इन सब महान हस्तियों से अधिक गहरा व घनिष्ठ है । येसु के पिता के सम्बन्ध की धनिष्ठा हम उन्हें ईश्वर का पुत्र कहकर व्यक्त करते हैं। ईश्वर के साथ येसु का संबंध अपने आप में अद्वितीय है। वही येसु आज ईश्वर के साथ अपने बहुत करीबी रिश्ते में भागीदार होने के लिए हमें बुलाते हैं । वो हमारे हृदयों अपना आत्मा उंढ़ेलते हैं, जिससे प्रेरित होकर हम ईश्वर को ’अब्बापिता , पिता’ कह सकें। पवित्र आत्मा के माध्यम से, हम येसु के भाई और बहन बन जाते हैं; आज हमारा आह्वान है उस रिश्ते में जुड़ने का जिसके द्वारा येसु के भाई व बहनेँ बनकर पिता ईश्वर की प्रिय संतान बन जाते हैं।


-फादर प्रीतम वसूनिया (इन्दौर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION


In today’s Gospel reading, Jesus declares of himself that he is greater than Solomon and greater than Jonah. We could add to that list – greater than Abraham, greater than Moses, greater than Isaiah or Jeremiah. Jesus is greater than all the leading figures of the Jewish Scriptures because he has a closer relationship with God than all who went before him.

We express this close relationship Jesus has with God by saying that Jesus is the Son of God. Jesus’ relationship with God is unique to himself. Yet, he came into the world to draw us all into his own very close relationship with God. He pours his Spirit, the Holy Spirit, into our hearts, so that we, like him, can call God ‘Abba, Father’. Through the Holy Spirit, we become brothers and sisters of Jesus; we come to share in his own intimate relationship with God. Our calling is to live out of that relationship, to live as brothers and sisters of Jesus, as sons and daughters of God. We pray that this season of Lent would help us to live that calling more fully.

-Fr. Preetam Vasuniya (Indore)


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Praise the Lord!