पास्का का चौथा सप्ताह - सोमवार



पहला पाठ :प्रेरित-चरित 11:1-8

1) प्रेरितों तथा यहूदिया के भाइयों को यह पता चला कि गै़र-यदूदियों ने भी ईश्वर का वचन स्वीकार किया हैं।

2) जब पेत्रुस येरुसालेम पहुँचा, तो यहूदी विश्वासियों ने उसकी आलोचना करते हुए कहा,

3) "आपने गैर-यहूदियों के घर में प्रवेश किया और उनके साथ भोजन किया"।

4) इस पर पेत्रुस ने क्रम से सारी बातें समझाते हुए कहा,

5) "मैं योप्पे नगर में प्रार्थना करते समय आत्मा से आविष्ट हो गया। मैंने देखा कि लंबी-चैड़ी चादर-जैसी कोई चीज़ स्वर्ग से उतर रही है और उनके चारों कोने मेरे पास पृथ्वी पर रखे जा रहे हैं।

6) मैने उस पर दृष्टि गड़ा कर देखा कि उस में पृथ्वी के चैपाले, जंगली जानवर, रेंगने वाले जीव-जंतु और आकाश के पक्षी हैं।

7) मुझे एक वाणी यह कहते हुए सुनाई पड़ी ’पेत्रुस! उठो, मारो और खाओ।

8) मैंने कहा, ’प्रभु! कभी नहीं! मेरे मुँह में कभी कोई अपवित्र अथवा अशुद्ध वस्तु नहीं पड़ी।’

सुसमाचार : योहन 10:1-10

1) "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- जो फाटक से भेड़शाला में प्रवेश नहीं करता, बल्कि दूसरे रास्ते से चढ़ कर आता है, वह चोर और डाकू है।

2) जो फाटक से प्रवेश करता है, वही भेड़ों का गड़ेरिया है

3) और उसके लिए दरवान फाटक खोल देता है। भेड़ें उसकी आवाज पहचानती हैं। वह नाम ले-ले कर अपनी भेड़ों को बुलाता और बाहर ले जाता है।

4) अपनी भेड़ों को बाहर निकाल लेने के बाद वह उनके आगे-आगे चलता है और वे उसके पीछे-पीछे आती हैं, क्योंकि वे उसकी आवाज पहचानती हैं।

5) वे अपरिचित के पीछे-पीछे नहीं चलेंगी, बल्कि उस से भाग जायेंगी; क्योंकि वे अपरिचितों की आवाज नहीं पहचानतीं।"

6) ईसा ने उन्हें यह दृष्टान्त सुनाया, किन्तु वे नहीं समझे कि वे उन से क्या कह रहे हैं।

7) ईसा ने फिर उन से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- भेड़शाला का द्वार मैं हूँ।

8) जो मुझ से पहले आये, वे सब चोर और डाकू हैं; किन्तु भेड़ों ने उनकी नहीं सुनी।

9) मैं ही द्वार हूँ। यदि कोई मुझ से हो कर प्रवेश करेगा, तो उसे मुक्ति प्राप्त होगी। वह भीतर-बाहर आया-जाया करेगा और उसे चरागाह मिलेगा।

10) "चोर केवल चुराने, मारने और नष्ट करने आता है। मैं इसलिए आया हूँ कि वे जीवन प्राप्त करें- बल्कि परिपूर्ण जीवन प्राप्त करें।

वैकल्पिक सुसमाचार : योहन 10:11-18

11) "भला गड़ेरिया मैं हूँ। भला गड़ेरिया अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण दे देता है।

12) मज़दूर, जो न गड़ेरिया है और न भेड़ों का मालिक, भेडि़ये को आते देख भेड़ों को छोड़ कर भाग जाता है और भेडि़या उन्हें लूट ले जाता है और तितर-बितर कर देता है।

13) मज़दूर भाग जाता है, क्योंकि वह तो मजदूर है और उसे भेड़ों की कोई चिन्ता नहीं।

14) "भला गडेरिया मैं हूँ। जिस तरह पिता मुझे जानता है और मैं पिता को जानता हूँ, उसी तरह मैं अपनी भेड़ों को जानता हूँ और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं।

15) मैं भेड़ों के लिए अपना जीवन अर्पित करता हूँ।

16) मैरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं हैं। मुझे उन्हें भी ले आना है। वे भी मेरी आवाज सुनेंगी। तब एक ही झुण्ड होगा और एक ही गड़ेरिया।

17) पिता मुझे इसलिए प्यार करता है कि मैं अपना जीवन अर्पित करता हूँ; बाद में मैं उसे फिर ग्रहण करूँगा।

18) कोई मुझ से मेरा जीवन नहीं हर सकता; मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता की ओर से यह आदेश मिला है।"

📚 मनन-चिंतन

पेत्रस एक परंपरावादी तथा रूढीवादी यहूदी था। वह भी यहूदी विश्वास और परंपरा की द्रष्टिसे गैर-यहूदियों की मुक्ति को देखता था। हालांकि पेंतेकोस्त के दिन पवित्र आत्मा से पूर्ण होकर वह प्रचार तथा चमत्कार दिखा कर मिशन के विस्तार में महान कार्य कर रहा था किन्तु वह गैर-यहूदियों के प्रति अपनी पैदायशी यहूदी पूर्वाग्रहों से अभी भी ग्रसित था। गैर-यहूदियों की मुक्ति का प्रश्न उसके मिशन कार्यों में एक ज्वलंत प्रश्न था। अपनी परम्परागत तथा रूढिवादी पालन-पोषण के कारण वह अपनी सोच को उनके प्रति उदार और व्यापक नहीं बना पा रहा था।

जब पेत्रुस एक दिन प्रार्थना कर रहा था तब प्रभु ने उसके जीवन तथा सोच को मूल-भूत रूप से बदलने वाले दिव्य दर्शन दिये। यदि पेत्रुस ने अपने प्रार्थना के समय का पाबंदी के साथ पालन नहीं किया होता तो शायद वह ईश्वर के इस दिव्य दर्शन को ग्रहण नहीं कर पाता। हम प्रार्थना में ईश्वर के साथ अपना समय बिताते तथा उन्हें सुनते हैं। यदि हम उनके साथ प्रार्थना में समय नहीं बिताये तो ईश्वर हमारी सोचसमझ को शायद ही बदले। इसलिये हमारे संघर्षों एवं संदेह में ही हमें सदैव प्रार्थना करते रहना चाहिये।

ईश्वर हमें असुविधाजनक परिस्थितियों के अनुभवों के द्वारा झकझोरते तथा हमें बदलाव की ओर ले जाते हैं। ईश्वर अपने दर्शन के द्वारा पेत्रुस के जीवन में हस्तक्षेप करते तथा उन्हें अपने विचारों तथा योजना से अवगत कराते हैं। ईश्वर का यह प्रकटीकरण पेत्रुस को हिला देता है जैसा कि उसके आरंभिक प्रतिक्रियाओं से पता चलता है, जब वह कहता है, ’प्रभु कभी नहीं’। ईश्वर ने पेत्रुस के परंपरावादी सोच को झाकझोर दिया था। कई बार ईश्वर को हमें बदलने के लिये झकझोरना तथा झटका देना पडता है। यदि हम आरामदायक स्थिति में रहते हैं तो हमें बदलने की आवश्यकता नहीं पडती किन्तु यदि हम अचानक नयी और विकट परिस्थिति में पड जाते हैं तो पाते हैं कि हमारे पुराने तौर-तरीके नयी परिस्थितियों में कारगर सिद्ध नहीं होगें। पेत्रुस के जीवन की इस घटना से हमें सिखना चाहिये कि हमें हर परिस्थिति में ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिये तथा उनके बताये मार्गों पर चलना चाहिये।

फादर रोनाल्ड वाँन

📚 REFLECTION


Peter was a traditional and a staunch Jew. He too looked at the salvation of the non-Jews through the prism of Jewish traditions and belief system. Although at the Pentecost he was filled with Holy Spirit and was moving about doing an extensive ministry of preaching and healing. Yet he was not freed from the prejudices that were inbuilt in him. The question about the salvation of the gentiles must have been a burning issue in his ministry. however knowing his traditional upbringing, it was hard for him to think broadly and inclusively.

It was while Peter was praying that the Lord gave him this life-changing vision. If Peter had skipped his prayer time, he might have missed what God wanted to do through him. It is in prayer we spent our time with God and listen to him. God will not change your thinking if you rarely spend time alone with Him.

Secondly God changes us by shaking and shocking us through uncomfortable circumstances. God through the vision intervened in Peter’s life with his ideas and His agenda! And God’s revelation and agenda shocked Peter, as seen by his surprised reply, “By no means, Lord!” It was Lord who had shaken Peter’s traditional mindset.

The Lord often has to shock and shake us to get us to change. If we’re comfortable, we don’t feel any need to change. But if we’re suddenly hit with a new situation that’s outside our comfort zone, we realize that our old ways of thinking will not work anymore. We have to listen to the Lord and trust Him to do something we can’t do in our own strength.

-Fr. Ronald Vaughan


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Praise the Lord!