पास्का का सातवाँ सप्ताह - मंगलवार



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 20:17-27

17) पौलुस ने मिलेतुस से एफ़ेसुस की कलीसिया के अध्यक्षों को बुला भेजा

18) और उनके पर उन से यह कहा, ’’आप लोग जानते हैं कि जब मैं पहले एहल एशिया पहुँचा, तो उस दिन से मेरा आचरण आपके बीच कैसा था।

19) यहूदियों के षड्यन्त्रों के कारण मुझ पर अनेक संकट आये, किन्तु मैं आँसू बहा कर बड़ी विनम्रता से प्रभु की करता रहा।

20) जो बातें आप लोगों के लिए हितकर थीं, उन्हें बताने में मैंने कभी संकोच नहीं किया, बल्कि मैं सब के सामने और घर-घर जा कर उनके सम्बन्ध में शिक्षा देता रहा।

21) मैं यहूदियों तथा यूनानियों, दोनों से अनुरोध करता रहा है कि वे ईश्वर की ओर अभिमुख हो जायें और हमारे प्रभु ईसा में विश्वास करें।

22) अब में आत्मा की प्रेरणा से विवश हो कर येरुसालेम जा रहा हूँ। वहाँ मुझ पर क्या बीतेगी, मैं यह नहीं जानता;

23) किन्तु पवित्र आत्मा नगर-नगर में मुझे विश्वास दिलाता है कि वहाँ बेडि़याँ और कष्ट मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

24) किन्तु मेरी दृष्टि में मेरे जीवन का कोई मूल्य नहीं। मैं तो केवल अपनी दौड़ समाप्त करना और ईश्वर की कृपा का सुसमाचार सुनाने का वह कार्य पूरा करना चाहता हूँ, जिसे प्रभु ईसा ने मुझे सौंपा।

25) ’’मैं आप लोगों के बीच राज्य का सन्देश सुनाता रहा। अब, मैं जानता हूँ कि आप में कोई भी मुझे फिर कभी नहीं देख पायेगा।

26) इसलिए मैं आज आप लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैं किसी के दुर्भाग्य का उत्तरदायी नहीं हूँ;

27) क्योंकि मैंने आप लोगों के लिए ईश्वर का विधान पूर्ण रूप से स्पष्ट करने में कुछ भी उठा नहीं रखा।

सुसमाचार : सन्त योहन 17:1-11

1) यह सब कहने के बाद ईसा अपनी आँखें उपर उठाकर बोले, ’’पिता! वह घडी आ गयी है। अपने पुत्र को महिमान्वित कर, जिससे पुत्र तेरी महिमा प्रकट करे।

2) तूने उसे समस्त मानव जाति पर अधिकार दिया है, जिससे वह उन सबों को अनन्त जीवन प्रदान करे, जिन्हें तूने उसे सौंपा है।

3) वे तुझे, एक ही सच्चे ईश्वर को और ईसा मसीह को, जिसे तूने भेजा है जान लें- यही अनन्त जीवन है।

4) जो कार्य तूने मुझे करने को दिया था वह मैंने पूरा किया है। इस तरह मैंने पृथ्वी पर तेरी महिमा प्रकट की है।

5) पिता! संसार की सृष्टि से पहले मुझे तेरे यहाँ जो महिमा प्राप्त थी, अब उस से मुझे विभूषित कर।

6) तूने जिन लोगो को संसार में से चुनकर मुझे सौंपा, उन पर मैने तेरा नाम प्रकट किया है। वे तेरे ही थे। तूने उन्हें मुझे सौंपा और उन्होंने तेरी शिक्षा का पालन किया है।

7) अब वे जान गये हैं कि तूने मुझे जो कुछ दिया है वह सब तुझ से आता है।

8) तूने जो संदेश मुझे दिया, मैने वह सन्देश उन्हें दे दिया। वे उसे ग्रहण कर यह जान गये है कि मैं तेरे यहाँ से आया हूँ और उन्होंने यह विश्वास किया कि तूने मुझे भेजा।

9) मैं उनके लिये विनती करता हूँ। मैं ससार के लिये नहीं, बल्कि उनके लिये विनती करता हूँ, जिन्हें तूने मुझे सौंपा है; क्योंकि वे तेरे ही हैं।

10) जो कुछ मेरा है वह तेरा है और जो तेरा, वह मेरा है। मैं उनके द्वारा महिमान्वित हुआ।

11) अब मैं संसार में नहीं रहूँगा; परन्तु वे संसार में रहेंगे और मैं तेरे पास आ रहा हूँ। परमपावन पिता! तूने जिन्हें मुझे सौंपा है, उन्हें अपने नाम के सामर्थ्य से सुरक्षित रख, जिससे वे हमारी ही तरह एक बने रहें।

📚 मनन-चिंतन

आज का सुसमाचार प्रभु येसु द्वारा अपने शिष्यों के लिए की गयी प्रार्थना के आरम्भ को दर्शाता है। प्रभु येसु अनंत जीवन के रहस्य को हमारे समक्ष रखते हैं। प्रभु येसु सदा से पिता ईश्वर के साथ हैं, और वह चाहते हैं कि जिन्हें वह प्यार करते हैं वे भी उनके साथ अनंत जीवन के सहभागी बनें। और इस अनंत जीवन के सहभागी बनने का रहस्य है पिता को जान लेना, और यह पहचान लेना कि पिता ही एकमात्र ईश्वर है, और प्रभु येसु ख्रिस्त उनके एकमात्र पुत्र, जिसे पिता ने संसार में भेजा है। प्रभु येसु के शिष्यों ने अंततः यह जान लिया और अपने विश्वास की घोषणा की, “हम विश्वास करते हैं कि आप ईश्वर के यहाँ से आए हैं। (योहन १६:३०)।”

हम सब को प्रभु ने उसी अनंत जीवन के सहभागी बनने के लिए चुना है और हमें उस अनंत जीवन को पाने के लिए अपने यह स्वीकार करना और घोषित करना है कि प्रभु ही मुक्तिदाता हैं जिसे पिता ने भेजा है, जिसने हमारे पापों के लिए अपने आप को क्रूस पर क़ुर्बान कर दिया। आइए हम अपने मुक्तिदाता के लिए और हमें अनंत जीवन के सहभागी बनने के लिए चुना इसके लिए पिता ईश्वर को धन्यवाद दें। आमेन।

- फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

Today’s gospel is the beginning of Jesus’ prayer for his disciples. He imparts the secret of eternal life. Jesus is eternally present with the Heavenly Father and he wants that all those who love him, should share the same eternal life. And the secret to this eternal life is to know the Father as only true God and Jesus Christ, whom the father has sent. The disciples had finally realised this and proclaimed their faith in Jesus by saying, “…we believe that you came from God.” (John 16:30).

We are all chosen to inherit the same eternal life and to claim it we just need to confess and believe that Jesus is the Lord and saviour sent by God the Father, who has taken our sins upon his cross on the Calvary. Let us thank the Father for sending us a saviour and allowing us to partake n eternal life. Amen.

-Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)


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Praise the Lord!