काथलिक धर्मशिक्षा

पारस्परिक उत्तरदायित्व एवं जिम्मेदारी

सामूहिक कार्यः लूकस 16:19-31 को ध्यान से पढिए।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में रहता है। अपना जीवन बिताते समय मनुष्यों को एक-दूसरे के सम्पर्क में रहना तथा एक दूसरे की मदद करना ज़रूरी है। एक बच्चा अपनी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है। वह अपनी ज़रूरतों के समय रोने लगता है। उसे मालूम है कि उसके रोने पर कोई न कोई उसकी सहायता करने के लिए अवष्य पहुँच जायेगा। बडे़ होने पर भी मनुष्य को दूसरों की मदद की ज़रूरत होती है। यह ज़रूरत हम संवाद तथा आवेदन के द्वारा प्रकट करते हैं। हमारी जीवन-षैली ऐसी है कि हमें अपने जीवन को ठीक से बिताने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। न जाने रोज हम अपना जीवन बिताने के लिए कितने लोगों पर निर्भर रहते हैं। सुबह हमें ज़रूरत पड़नेवाले दंतमंजन तथा साबुन से लेकर चाय पत्ती तक की वस्तुओं की तैयारी में न जाने कितने लोगों का हाथ हैं! हमें स्कूल या आॅफिस पहुँचाने वाले बस के ड्राइवर से लेकर हमारे घर अखबार पहुँचाने वाले व्यक्ति तक कितने लोगों पर हमें विश्वास करना पड़ता है! मनुष्य स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी है। ईश्वर की योजना भी मनुष्य को सामुदायिक प्राणी का ही दर्जा देती है। ईश्वर का यह कहना कि “अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं है” (उत्पत्ति 2:18) इसी सत्य को दर्शाता है।

सामुदायिक जीवन परिवार में ही शुरू होता है। परिवार व्यक्ति और समुदाय के बीच का पुल माना जाता है। परिवार के सदस्यों की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए परिवार में कामों का बंटवारा किया जाता है। एक साधारण परिवार में पैसा कमाना, घर की सफाई करना, कपडे़ धोना, खाना पकाना, खरीददारी करना आदि कामों का बंटवारा होता ही है। इस प्रकार परिवार के सदस्य एक-दूसरे की मदद करते हैं और एक-दूसरे पर अपनी ही ज़रूरतों के लिए निर्भर रहते हैं। जैसे जैसे एक बच्चा आगे बढ़ता है उसके सामुदायिक जीवन की सीमा बढ़ती जाती है। वह स्कूल, बाद में कॉलेज के सहपाठियों तथा अध्यापकों के सम्पर्क में आता है। घर के पास-पड़ोसियों तथा जिनके पास अपनी तथा अपने परिवार की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए जाना पड़ता है, उन सबसे उसका परिचय हो जाता है तथा उन संबंधों को उसे बनाये रखना पडता है। इन सब के बीच वह परिवार तथा अपने परिचित समाज से नैतिक मूल्यों तथा गुणों को अपनाता है। वह अपने घर के वातावरण में ही भाषा सहज ही सीख लेता है जिसके द्वारा वह दूसरों के साथ विचारों का आदान-प्रदान कर सकता है। समाज के रीति-रिवाज़ भी उसके जीवन के अंग बन जाते हैं।

कहा जाता है कि कोई भी व्यक्ति अपने में एक द्वीप नहीं है, वह दूसरों से जुडे रहता है। अपने जीवन की सफलता तथा सार्थकता के लिए उसे दूसरों से संबंध जोडना तथा उन संबंधों को बनाये रखना ज़रूरी है। जो अपने को दूसरों से अलग करता है, उसका जीवन अधूरा ही रहता है।

इन सब सामाजिक सच्चाईयों से परे ख्रीस्तीय विश्वास हमें सिखाता है कि ईश्वर हमारे पिता हैं और हम सब-के-सब उनकी संतान। इस प्रकार हम एक दूसरे के भाई-बहन बनते हैं। ईश्वर हमारा मुक्ति-कार्य समुदाय में ही पूरा करता है। यह आध्यात्मिक सच्चाई हमें एक दूसरे को प्यार करने तथा एक दूसरे की मदद करने के लिए प्रेरित करती है। उत्पत्ति ग्रन्थ 4:8-9 में हम पढ़ते हैं कि काइन ने अपने भाई हाबिल पर आक्रमण किया और उसे मार डाला। तब ईश्वर ने काइन से पूछा, “तुम्हारा भाई हाबिल कहाँ है?” ईश्वर हममें से हरेक व्यक्ति से अपने भाइयों तथा बहनों के प्रति जिम्मेदार रहने की आशा रखते हैं। सन्त योहन हम से कहते हैं, “हम काइन की तरह नहीं बनें (1 योहन 3:12)। काइन का जवाब था, “मैं नहीं जानता। क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?” प्रभु येसु हमें परमेश्वर को ’हमारे पिता, न कि ’मेरे पिता’ कह कर पुकारना सिखाते हैं। जब प्रभु येसु हमें पिता को ’हमारे पिता’ कहकर पुकारना सिखाते हैं तो हमें एक दूसरे भाई-बहन मानना ज़रूरी बन जाता है।

इस प्रकार का सामुदायिक जीवन बिताते वक्त प्रभु कुछ मूल्यों पर ज़ोर देते हैं। वे षिष्यों को एक दूसरे की सेवा करना सिखाते हैं। अमीर और लाज़रुस के दृष्टान्त द्वारा येसु हमें सिखाते हैं कि हमें समाज के गरीब और लाचार लोगों के प्रति न केवल संवेदनषील बनना चाहिये, बल्कि अपनी क्षमता के अनुसार उनकी सहायता भी करना चाहिये। इसी कारण सन्त योहन कहते हैं, “किसी के पास दुनिया की धन-दौलत हो और वह अपने भाई की तंगहाली देखकर उस पर दया न करे, तो उसमें ईश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है? (1 योहन 3:17)” ईश्वरीय प्रेम तथा पडोसी-प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। “यदि कोई कहता कि मैं ईश्वर को प्यार करता हूँ और वह अपने भाई से बैर करता, तो वह झूठा है। यदि वह अपने भाई को जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता, तो वह ईश्वर को, जिसे उसने कभी देखा नहीं, प्यार नहीं कर सकता।” (1 योहन 4:20) सन्त पौलुस विश्वासियों से यह उम्मीद रखते हैं कि वे “हर प्रकार के सत्कार्य के लिए तत्पर रहें, किसी की निन्दा न करें, झगडालू नहीं, बल्कि सहनषील हों और सब लोगों के साथ नम्र व्यवहार करें” (तीतुस 3:1.2)।

प्रभु येसु ख्रीस्तीय व्यवहार के लिये एक स्वर्णिम नियम हमें प्रदान करते हैं- “दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो।” (मत्ती 7:12) ख्रीस्तीय विश्वासियों को अपने जीवन में संसार की दृष्टि में न्यायसंगत व्यवहार करना काफी नहीं है। ख्रीस्तीय धार्मिकता साधारण नीति-न्याय से बढ़कर है। इसलिये प्रभु कहते हैं, “यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी उसके सामने कर दो। जो मुकदमा लड़कर तुम्हारा कुरता लेना चाहता है उसे अपनी चादर भी ले लेने दो। यदि कोई तुम्हें आधा कोस बेगार में ले जाये तो उसके साथ कोस भर चले जाओ। जो तुम से मांगता है उसे दे दो और जो तुम से उधार लेना चाहता है उससे मुँह न मोड़ो।” (मत्ती 5:39-42)। दान देते समय ढ़िंढ़ोरा नहीं पिटवाने का आदेश भी प्रभु देते हैं (देखिए मत्ती 6:2) क्योंकि यह काम हम दूसरों को दिखाने के लिए नहीं करते हैं, बल्कि ईश्वर पर भरोसा रखते हुए अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए।

सन्त याकूब हमें यह सिखाते हैं कि हमें भेदभाव, चापलूसी तथा पक्षपात से दूर रहना तथा दरिद्रों का सम्मान करना चाहिए। (पढ़िए याकूब 2:1-9) इब्रानियों के पत्र का लेखक हमें आतिथ्य-सत्कार नहीं भूलने का और बन्दियों तथा अत्याचार सहने वालों के प्रति संवेदनषील व्यवहार करने का सन्देष देता है (पढ़िए इब्रानियों 13:1-3) कलीसिया की शुरुआत से ही विभिन्न प्रकार के सेवाकार्यों को महत्व दिया जाता था। ये सब समुदाय के विभिन्न व्यक्तियों की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। हमें सेवाकार्य केवल कलीसिया की कुछ समितियों का काम नहीं समझना चाहिए। सेवा करना हरेक मनुष्य की ज़िम्मेदारी है।

दलबंदी ख्रीस्तीय समुदाय के विरूद्ध पाप है क्योंकि जो दलबंदी के षिकार होते हैं वे सिर्फ अपने दल के लोगों पर ध्यान देते हैं और उन्हीं की भलाई के लिये कार्य करते हैं। उनमें एक प्रवृत्ति पैदा होती है जिसके द्वारा दूसरों को वे नीचा दिखाते हैं या तुच्छ समझते हैं। ऐसे में लोग एक-दूसरे के प्रति शत्रुता रखने लगते हैं। इसलिये संत पौलुस कुरिन्थियों को लिखते हुये कहते कि वे एक मत होकर दलबंदी से दूर रहें। (1 कुरिन्थियों 1:10) ख्रीस्त हमें सच्चा सामुदायिक जीवन जीने को सिखाते हैं। ख्रीस्तीय विश्वास हमें यह सिखाता है कि हम किसी को मसीह के प्यार से वंचित न रखे। प्रभु येसु ने अपने षिष्यों को दो-दो करके भेजा था। संत पौलुस भी अपनी प्रेरितिक यात्राओं में कुछ सहायकों को साथ ले जाते हैं। हम समुदायों में जीने तथा कार्य करने के लिये बुलाये गये हैं। दल के सदस्य एक-दूसरे को अन्य लोगों की सेवा करने तथा उनके बीच प्रभु-ईश्वर के प्रेम को बंाटने के लिये प्रेरित तथा मदद करते हैं। वे एक-दूसरे के लिये सहारा बनते हैं। ख्रीस्तीय दल के सदस्य दूसरों की उन्नति में खुशी मनाते हैं तथा सभी लोगों को ईश्वर की ओर अभिमुख कराते हैं।

एक-दूसरे के समर्थन की ज़रूरत सबसे ज्यादा हमें परेषानियों तथा संकटों के समय महसूस होती है। इसलिये अत्याचार सहते समय तथा कठिन परिस्थितियों का सामना करते समय हमें एक-दूसरे की मदद करना ज़रूरी है। प्रियजनों की मृत्यु के अवसर पर हम दुखी होते हैं तथा सांत्वना की आशा रखते हैं। ऐसे अवसरों पर लोगों के साथ रहना तथा उनकी मदद करना ख्रीस्तीय विश्वासियों के लिए अनिवार्य हैं।

ख्रीस्तीय विश्वासियों को चाहिये कि वे एक-दूसरे को अच्छे कार्यों में प्रोत्साहन देते रहें। कभी-कभी यह देखा जाता है कि लोग दूसरों को जो अच्छे कार्य कर रहे हैं निरुत्साहित करते हैं। ऐसा व्यवहार ख्रीस्तीयों को शोभा नहीं देता। निरुत्साहित किये जाने पर लोग अच्छे कार्यों से पीछे हटते हैं। आदम एवं हेवा अदन की वाटिका में खुष थे। लेकिन जब षैतान ने उनके हृदय में वर्तमान परिस्थिति के बारे में असंतोष पैदा किया तो उनको लगा कि उनकी हालत बुरी है और उन्हें खुद शैतान की मदद से इस बुरे हालात को बदलना होगा। इस प्रकार वे पाप में गिरते हैं। इसी प्रकार बुरी आलोचना तथा बुरा परामर्श मनुष्य को पाप की ओर ले जाते हैं। ख्रीस्तीय विश्वासियों को एकता में बाँधकर ईश्वर अपने पवित्र आत्मा द्वारा कलीसिया में प्रभु येसु ख्रीस्त के शरीर को रूप देते हैं। इस एकता को बनाये रखना ख्रीस्तीयों का कर्त्तव्य है। ऐसा करने पर वे कलीसिया के सच्चे अंग होने का प्रमाण देते हैं।

प्रश्न:- 1. ईश्वर की संतान होने के नाते एक दूसरे के प्रति हमारे क्या कर्त्तव्य बनते हैं?
2. परिवार तथा समुदाय में हम किस प्रकार एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं? हमारे विश्वास के दृष्टिकोण से हमें इस बात को किस प्रकार समझना चाहिए?
3. प्रभु येसु ने हमें ख्रीस्तीय व्यवहार के लिये कौन-सा स्वर्णिम नियम दिया है? इसको हम किस प्रकार कार्यान्वित कर सकते हैं?
4. पिछले हफ्ते आपने किस-किस की मदद की? सूची बनाइए।
5. पिछले हफ्ते आपने किस-किस की मदद ली? सूची बनाइए।


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