जलवायु परिवर्तन

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Christson_Gillउत्पत्ति ग्रंथ 1:1-2 में हम पढ़ते हैं कि ईश्वर ने प्रारंभ में स्वर्ग और पृथ्वी की सृष्टि की। संपूर्ण प्रकृति के सृजन के पश्चात् ईश्वर ने मानव जाति को रचा, जिससे कि संपूर्ण मानव जाति ईश्वर द्वारा रचित प्रकृति की देखभाल करे और उसकी रक्षा व संरक्षण के लिए उत्तरदायी हो।

उत्पत्ति ग्रंथ 6:5-8 में हम पाते हैं कि ईश्वर को इस बात का अफसोस हुआ कि उसने मनुष्य को गढ़ा था; क्योंकि उसकी आसक्ति और लालसा के कारण वह प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने से भी नहीं चूकता था और ईश्वर की दृष्टि में बुरा बन चुका था। फलस्वरूप, समस्त पृथ्वी पर जल-प्रलय के कारण घोर विनाश होता है और सब प्राणी मर जाते हैं। पर नूह, उसका परिवार और वे सब प्राणी—जिन्हें उसने ईश्वर की आज्ञानुसार एकत्रित किया था—सुरक्षित थे। नूह, जो ईश्वर की दृष्टि में भला और ईमानदार था, स्वयं के परिवार और पृथ्वी के प्राणियों के लिए नायक सिद्ध होता है।

उत्पत्ति ग्रंथ 18:21 में हम देखते हैं कि सोदोम और गोमोरा के लोगों के पापों के कारण उन शहरों का विनाश हो जाता है। हमें यह बिल्कुल ज्ञात होना चाहिए कि शहरों का विनाश अर्थात उस क्षेत्र के सभी वृक्ष, जंगली पशु-पक्षी, जल-जंतु आदि प्राकृतिक संसाधनों का भी विनाश।

निर्गमन ग्रंथ 7-12 तक हम 10 विपत्तियों का उल्लेख पाते हैं, जिसमें एक शक्तिशाली शासक की हठधर्मिता और अहंकार के कारण मनुष्यों, जीव-जंतुओं और अन्य प्राणियों को भी इन घातक विपत्तियों का सामना करना पड़ा था।

पहला राजा 17:1-2 में हम पाते हैं कि किस प्रकार राजा अहाब और उनकी पत्नी ईज़ेबेल के पापों के कारण, नबी एलीयाह द्वारा उद्घोषित प्रभु की वाणी के अनुसार, उनके राज्य को 3 साल और 6 महीनों की अवधि के लिए सूखे का सामना करना पड़ा था और यह वास्तविक है कि उस सूखे में प्रकृति, जलवायु, पशु-पक्षी व अन्य जीव-जंतुओं को भी काफी नुकसान हुआ होगा।

आज संपूर्ण मानव जाति अपने सबसे भयावह विनाश की ओर प्रतिक्षण बेहोशी की अवस्था में बढ़ती जा रही है। पर्यावरण पर मानव जाति ने नित्य आघात किया है और करती जा रही है। यह बिल्कुल उसी प्रकार है जैसे कोई व्यक्ति उस डाल को काट रहा है जिस पर वह स्वयं बैठा हुआ है। पृथ्वी को अस्तित्व में आए कितने ही वर्ष बीत चुके हैं। विज्ञान के अनुसार विकास की एक निरंतर प्रक्रिया चलती आ रही है और इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी मौजूद है या जो कुछ भी घटित होता है—चाहे वह प्रत्यक्ष रूप से हो या अप्रत्यक्ष रूप से—पर्यावरण और संपूर्ण पृथ्वी को प्रभावित करता है। सदियों से मानव प्रकृति की व्यवस्था में विभिन्न तरीकों से योगदान देकर पृथ्वी के संसाधनों का आनंद लेता आया है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में मनुष्यों के बीच एक ऐसा स्वार्थ दिखता है, जिसने इस ग्रह को भीतर से निचोड़ दिया है और प्रकृति के संतुलन को बुरी तरह से बिगाड़ दिया है; जिसके कारण हम सबको—विशेषतः भारत को—जलवायु परिवर्तन जैसे क्षय का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है और आगे भी भुगतना पड़ेगा।

मनुष्य और पर्यावरण अलग-अलग नहीं हैं; मनुष्य पर्यावरण का ही एक स्वभाव है। पृथ्वी का अनुकूल वातावरण मनुष्य के जीवन को संचालित रखता है। हमारे पूर्वज प्रकृति के इतने करीब थे कि वे खुद को इसका हिस्सा मानते थे, न कि इससे अलग कोई बाहरी इकाई। हालांकि, औद्योगिकीकरण और आधुनिकता के कारण इस दृष्टिकोण के साथ बहुत ही बुरा समझौता किया गया है। हमने वातावरण को 'Use and Throw' की वस्तु जैसा समझ रखा है और केवल उसका दोहन ही करते जा रहे हैं।

मानव और पर्यावरण के बीच का संबंध अब रहा नहीं; हम प्रकृति के संरक्षक नहीं, भक्षक बन चुके हैं और उसके प्रति अपने कर्तव्य को पूरी तरह भूल चुके हैं। प्रकृति के साथ सामंजस्य पुनः स्थापित करने का औचित्य भी हम नहीं समझते। हमारे अवचेतन मन तक में भी इस विचार का दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में हम सबके समक्ष कुछ प्रश्न खड़े हैं, जैसे—हम अपनी अनावश्यक, स्वार्थी और विनाशकारी प्रवृत्तियों को खुशी-खुशी कैसे गले लगा सकते हैं? जब हम अपने आसपास किसी को कचरा फेंकते या पर्यावरण को दूषित करते पाते हैं, तो हमें झिझक या ग्लानि क्यों नहीं होती? अगर होती भी है, तो हम चुप क्यों रह जाते हैं? हम अपने पर्यावरण और इसकी गुणवत्ता व स्वभाव में हो रही गिरावट के प्रति संवेदना क्यों नहीं रखते?

हम सब यह भली-भांति समझते और जानते हैं कि जब-जब मनुष्य स्वार्थ और लोभ के कारण अंधा हुआ है, तब-तब विनाश हुआ है। मेरा मानना है कि जब हम अपने फायदे और मतलब के लिए पर्यावरण की व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करते हैं, तब-तब हम वास्तव में अपनी ही मृत्यु के बीज बोते हैं। यह प्रकृति सब अस्त-व्यस्त घटकों को सुधारने और अपनी व्यवस्था को सुचारू रखने में पूर्णतः सक्षम है; परंतु हमारा प्रभु-ईश्वर निरंतर हमें सुधरने का मौका देता है, जिससे कि हम अपनी पृथ्वी और उसकी सृष्टि की व्यथा को दिल से समझ लें, जिसे हमने अपने स्वार्थ के लिए जीर्ण कर दिया है। परंतु हम ठहरे अज्ञानी और अबोध लोग; हम अपनी शक्ति और अपना बाहुबल केवल अपने से कमज़ोर और बेजुबान को दिखाते हैं और उसे प्रताड़ना देकर अपने 'अहम्' को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं। जैसे-जैसे आधुनिकीकरण तीव्र होता जा रहा है, वैसे-वैसे हम सब लोग अपना धैर्य भी खोते जा रहे हैं। हमें अपने अलावा कोई दूसरा दिखाई देता ही नहीं। अमीरों को गरीबों की झोपड़ियां नहीं दिखतीं; उद्योगपतियों को किसानों और मजदूरों के श्रम और पसीने का मोल नहीं; आम आदमी सस्ते नशों में डूबा है; युवा गलत आदतों का शिकार है; शिक्षा का मूल्य अब रहा नहीं; क्रूरता और अपमान का रास्ता अब सुखदायी लगता है; बेईमानी का पैसा भारी लगना बंद हो गया है; बेजुबान जानवरों को प्रताड़ित कर हमारी जिह्वा की अबाधित व अमिट लालसा को संतुष्टि देने का काम धड़ल्ले से चल रहा है—लेकिन हमें क्या फर्क पड़ता है? हमारा घर तो साफ है न, चाहे कूड़ा पड़ोसी के घर के बाहर ही क्यों न फेंकना पड़े!

मैं अपने आत्म-अवलोकन के आधार पर आपसे यह कहना उचित समझता हूं कि हमारी आत्मा आज बिल्कुल बेहोश है। हमने ईश्वर की करुणा और गुणों को आत्मसात करने की ज़रूरत कभी महसूस ही नहीं की। हमारा हृदय इतना कठोर हो गया है कि हम अपने सुख के लिए किसी को भी दुख देने को तैयार हैं, तो यह प्रकृति क्या चीज़ है? ये तो ठहरे आंतरिक मनोभाव, पर ऐसे अनगिनत बाह्य कारक हैं जो केवल मनुष्यों से उत्पन्न होकर प्रकृति पर बोझ बन रहे हैं। हमें यह बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि जितनी हमारी लालसा, उतनी हमारी ज़रूरतें; जितनी हमारी ज़रूरतें, उतना हमारा उपभोग; और जितना हमारा उपभोग, उतना ही प्रकृति का दोहन; और प्रकृति का जितना दोहन, उतना ही तीव्र और समीप सृष्टि के विनाश का समय।

आज जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण , ग्लोबल वार्मिंग, युद्ध, प्रति व्यक्ति बढ़ता उपभोग इत्यादि हमारे लिए बड़ी चुनौतियां हैं। कुछ प्रमुख कारण—जो इस पृथ्वी के विनाश के द्वारों पर दस्तक देने का कार्य कर रहे हैं—वह मैं आपके सामने रखना चाहता हूं:

* जनसंख्या में नित्य बढ़ोतरी,

* वनों की अत्यधिक कटाई,

* प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग और हमारी कूड़ा फैलाने की मानसिकता,

* बढ़ता औद्योगिकीकरण,

* बहुत सारा खनन और खुदाई,

* विकास के नाम पर पर्यावरण के संसाधनों का दोहन,

* हर ज़िम्मेदार नागरिक की पारदर्शिता में कमी,

* उद्योगपतियों का वर्चस्व,

* आने वाली पीढ़ी के प्रति ज़िम्मेदारी का अभाव,

* युद्धों के लिए हथियारों के निर्माण हेतु अत्यधिक निवेश,

* बढ़ता मांसाहार,

* विलासिता की आसक्ति,

* हर समय कुछ नये की मांग,

और आत्म-अवलोकन में कमी।

मेरे प्यारे दोस्तों, मैं यह समझता हूं कि आज हम सबको इन विषयों के बारे में गहराई से सोचना चाहिए और इन पर चिंतन कर स्वयं की मन:स्थिति को समझने की कोशिश करनी चाहिए। हमें अपने पर्यावरण के साथ अपने एकीकरण को समझना व महसूस करना चाहिए। मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और प्रकृति के भीतर मौजूद हर सूक्ष्म तत्व इसके पूर्ण अस्तित्व में भागीदार हैं। मौसम के चक्रों में अचानक होते बदलाव, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरण के प्रति हो रहे दोहन के खतरनाक प्रभावों का सामना आज हम सबको करना पड़ रहा है।

मेरा यह मानना है कि इस ग्रह पर प्रत्येक व्यक्ति को जलवायु के नियमित चक्र में हो रहे बदलावों के प्रति जागना चाहिए। हमें अपने लालच, बुरी आदतों और घमंड को खत्म करने व हमारे प्रभु येसु मसीह के करुणा और प्रेम के भावों को आत्मसात करने की बहुत ज्यादा ज़रूरत है। प्रिय मित्रों, जब तक यह जागरूकता प्रत्येक व्यक्ति के मन में नहीं आती, तब तक इस संदेश को बार-बार सुनने व इस पर मनन कर स्वयं को चुनौती देते रहना हमारे लिए आवश्यक हो जाता है।

समाज में शिक्षा का स्थान सर्वप्रथम रहा है और हम सबके जीवन में उचित, गंभीर एवं व्यावहारिक शिक्षा की बहुत अहम भूमिका भी है। मानव समाज को निसंदेह 'पर्यावरण संरक्षण' की तत्काल आवश्यकता है; और इस कार्य में उचित शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। साथ ही साथ, कई देशों में—मुख्य रूप से भारत में—स्वच्छता के कार्य में व्यापक जागरूकता की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है। भारत के प्रत्येक नागरिक को इस बात के प्रति सतर्क होना चाहिए कि हमारा क्या हाल हो रहा है और हमें वास्तव में किन तरीकों से अपने में सुधार करना चाहिए। और जब हम इस विषय के प्रति जागरूक होंगे, तो हम इसे अपनी ज़िम्मेदारी और अपना अधिकार समझेंगे व इसके लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत रहेंगे।

बहरहाल, अपने इस प्रयास और चिंतन में मैंने यह जाना और समझा है कि पूरी प्रकृति मनुष्य के स्वार्थ को परमार्थ में बदलते हुए देखने का बेसब़री से इंतज़ार कर रही है। जंगलों की अलग-अलग प्रजातियों का जो विनाश हुआ है—पेड़ों की कटाई, ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लोबल वार्मिंग, ओज़ोन परत का क्षरण, औद्योगिकरण, बढ़ता प्रदूषण इत्यादि—इन सबने हमारे जीवन को इतना क्षीण और कमज़ोर कर दिया है कि कल्पना करना मुश्किल है कि आने वाले 20 से 30 सालों में इस पृथ्वी का क्या होने वाला है। हमारे ईश्वर ने हमें अपनी सृष्टि सौंपी ताकि हम उसका ध्यान रखें व उसकी व्यवस्था में मददगार साबित हों। लेकिन आज क्या हो रहा है? क्या आज हम वही कर रहे हैं जो ईश्वर हमसे चाहते हैं? और अगर हमारा उत्तर 'नहीं' है, तो इसका मतलब आज सब उल्टा हो रहा है।

इन सभी बिंदुओं को आपके समक्ष प्रस्तुत कर मैं आप सबसे एक विनती करता हूं कि आज हम सबको प्रकृति में हो रहे जलवायु परिवर्तन के लिए एक साथ कार्य करना होगा व इसके प्रति जागरूक होना होगा। हम सबको अपने स्वार्थ को कुछ हद तक कम करना होगा और चीज़ें—जैसे packaged items, packaged foods, packaged groceries, factory manufactured material—पर कम खर्च करना होगा। हम सबको अपनी ज़रूरत को पहचानना होगा। हम सबको अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना होगा और प्रकृति के संसाधनों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी हमें सप्रेम याद करे, न कि हम सबको शाप दे।

मेरे प्यारे दोस्तों, मैंने अपने इस चिंतन में प्रभु येसु को अपना आदर्श माना है। अगर हम उनकी ज़िंदगी में देखें, तो वे प्रकृति प्रेमी थे। पशु-पक्षियों व सब जीव-जंतुओं से उनका बहुत लगाव था। उनका जन्म पशुओं के बीच एक गौशाला में हुआ था। उनका बपतिस्मा प्रकृति के एक बेहते जल स्रोत में हुआ था। उन्होंने एक फूल को राजा सुलेमान के ऐश्वर्य से श्रेष्ठ समझा था। वे कभी-कभार अपनी लंबी यात्राओं में बहुत सारे वृक्षों के नीचे और जल स्रोतों के किनारे विश्राम करते रहे होंगे। वे पर्यावरण के एकांत का भरपूर आनंद लेते थे। बागानों के बीच में, पर्यावरण के एकांत में अपने पिता ईश्वर से उनकी बातचीत संभव होती थी। शैतान ने भी मरुभूमि में उनकी परीक्षा ली थी और उस मरुभूमि में प्रभु येसु का जंगली जानवरों से भी सामना हुआ था, लेकिन सुसमाचार में हम कहीं इसका वर्णन नहीं पाते हैं कि जंगली जानवरों ने उन्हें चोट पहुंचाई या उन्हें आघात किया। वे पानी की सतह पर चले। उन्होंने समुद्र के तूफ़ान को अपने शब्द मात्र से शांत कर दिया। उनकी मृत्यु पर (अलंकारों का उपयोग करते हुए) आकाश रो पड़ा, धरती फट गई और आकाश में गहरा-घना अंधेरा छा गया। ये सब घटनाएं मुझे और आप सबको आज यह समझाती हैं कि येसु मसीह प्रकृति से बहुत-बहुत गहरे रूप से जुड़े हुए थे। आज अगर वे हम सबके बीच आकर खड़े हो जाएं, तो वे हमारी स्थिति को देखकर रोएंगे और हम सबको सुधारने की कोशिश करेंगे कि हम उनकी सृष्टि का दोहन न करें और उसे नुकसान न पहुंचाएं।

अगर हम असीसी के संत फ्रांसिस को देखें, तो वे भी प्रकृति से बहुत हद तक जुड़े हुए थे। वे सूरज, चांद, मछलियों, पक्षियों, पशुओं और जंतुओं के साथ बातें करते थे और उन सबको सुसमाचार का शुभ संदेश सुनाते थे। संत पिता फ्रांसिस ने भी अपने एक परिपत्र 'लौदा तो सी' (Laudato si') में हमारी पृथ्वी की अनुकूलता पर बल दिया और हम सबको पर्यावरण में हो रहे जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूक होने को प्रेरित किया। पोप फ्रांसिस जलवायु परिवर्तन को एक नैतिक संकट मानते हैं। इस परिपत्र के द्वारा वे मुख्यतः 5 बिंदुओं पर बल देते हैं:

* साझा संसाधन: जलवायु सभी की साझी विरासत है। (पैरा 23)

* फेंकने की संस्कृति (Throwaway Culture): अत्यधिक उपभोक्तावाद और कचरा पर्यावरण को नष्ट कर रहा है। (पैरा 22)

* अखंड पारिस्थितिकी: प्रकृति और समाज का स्वास्थ्य आपस में जुड़ा है; यह एक संयुक्त सामाजिक-पर्यावरणीय संकट है। (पैरा 139)

* गरीबों पर प्रभाव: जलवायु परिवर्तन की मार सबसे अधिक निर्दोष गरीबों पर पड़ती है। (पैरा 48-52)

* वैश्विक संवाद: जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए ईमानदार अंतरराष्ट्रीय समझौतों की आवश्यकता है। (पैरा 161, 165)

मेरे प्यारे दोस्तों, बीते कई दशकों से हम सब अपने लालच और घमंड के कारण पर्यावरण के विनाशक बन गए हैं; इसका परिणाम है—यह बदलती जलवायु। आज प्रकृति हम सबसे बहुत ही कड़े सवाल पूछती है: हम अपना स्वभाव बदलना क्यों नहीं चाहते? क्या हम अभी भी सब कुछ जानकर बेहोश हैं? क्या हम आज से अपने जीवन में बदलाव लाने को तैयार हैं? क्या मैं व्यक्तिगत स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे विनाश से प्रभावित नहीं हूं? अगर हां, तो क्या मैं आत्म-अवलोकन के लिए तैयार हूं? आइए, इस विषय पर चिंतन करें।

✍ - ब्रदर क्रैस्टसन गिल (आइ.एम.एस, दिल्ली प्रोविन्स)