चक्र अ के प्रवचन

खीस्त जयन्ती (जागरण मिस्सा)

पाठ: इसायाह 62:1-5; प्रेरित-चरित 13:16-17,22-25; मत्ती 1:1-25 या 1:18-25

प्रवाचक: फादर जार्ज स्टीफन


रूसी साहित्यकार लियो टोलस्टाय की एक कहानी है। एक राजा पुरोहितों तथा ज्ञानियों को बुलाकर उन्हें आदेश देता हैं कि वे उसे ईश्वर का दर्शन कराए। ऐसा आदेश पाकर पुरोहित तथा ज्ञानी बड़ी मुसीबत में पड़ गये थे। उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हुए। आखिरकार एक गड़ेरिया उनकी मदद करने के लिये आगे आया। वे उस गड़ेरिये को राजा के सामने ले आये। राजा को यकीन नहीं था कि वह कुछ कर पायेगा। फिर भी राजा ने उसे एक मौका देने का सोचा। गड़ेरिये ने राजा से कहा कि ईश्वर के दर्शन करने तथा समझने के लिये हमें अपने कपड़े आपस में बदलने होंगे। पहले तो राजा हिचकिचाया, फिर बाद में वह मान गया। उसने अपने कपड़े उतार कर गड़ेरिये को दे दिये और गड़ेरिये ने अपने कपड़े राजा को। फिर गड़ेरिये ने राजा से कहा, ‘‘वास्तव में ईश्वर ने यही किया है। ईश्वर ने प्रभु येसु खीस्त में हमारे नाशवान शरीर को धारण कर लिया तथा अपनी ईश्वरीयता को हमें प्रदान किया है। आज हमारी इसी सत्य से मुलाकात होती है। खीस्त जयंती ईश्वर और मानव के बीच के इस आदान-प्रदान को दर्शाती है। प्रत्येक वर्ष खीस्त जयंती हमें एक सुनहरा अवसर प्रदान करती है जिससे हम अपने जीवन की एक नयी शुरुआत करें तथा बालक येसु के साथ-साथ आध्यात्मिक परिपक्वता पर पहुँच जाए।

हमें विदित है कि इसकी पूर्णता येसु द्वारा क्रूस पर खून बहाने से सम्बंधित है और हमें क्रूस की पूर्णता उसके अनुप्रस्थ एवं अनुलम्ब आरेखों के सदृश ईश्वर से एवं मनुष्यों से सम्बंध स्थापित करने के फलस्वरूप प्राप्त होती है। ईश्वर तथा मनुष्य से एक अच्छे संबंध स्थापित करने के लिये तीन बातें आवश्यक हैं - समय, त्याग एवं विचार-धारा।

समय: ईश्वर ने बालक येसु के जन्म को उद्देश्यपूर्ण बनाते हुए एक समय विशेष एवं स्थान को निर्धारित किया और उसे जन्माया। ‘‘किन्तु समय पूरा हो जाने पर ईश्वर ने अपने पुत्र को भेजा। वह एक नारी से उत्पन्न हुए और संहिता के अधीन रहे, जिससे वह संहिता के अधीन रहने वालों को छुड़ा सके और हम ईश्वर के दत्तक पुत्र बन जायें‘‘ (गलातियों 4:4-5)।

संत मत्ती इस तथ्य को प्रमाणित करना चाहते हैं कि जो प्रतिज्ञा परमेश्वर ने मानव पतन के समय की थी और जिस प्रतिज्ञा की आशा को नबियों ने अपनी भविष्यवाणियों में बनाये रखा वह सब बालक येसु में समयानुसार पूर्ण हो गई। नबी इसायाह ने येसु-जन्म के 740 वर्ष पहले उक्त भविष्यवाणी की थी। नबी इसायाह पवित्र बाइबिल के चार प्रमुख नबियों में से एक है जिनकी भविष्यवाणी समस्त मानवजाति के लिए खरी उतरती है। येसु ने एक निश्चित समय में मानव-मुक्ति कार्य पूरा किया। तत्पश्चात उन्होंने प्रेरितों एवं शिष्यों को पवित्र आत्मा से अभिषिक्त कर भेजा कि वे समय पर मानव-मुक्ति का यह कार्य समस्त मानवजाति में पूर्ण करें। आज के पहले पाठ में नबी इसायाह द्वारा कथित वचन यह उद्घोषित करता है, ‘‘मैं सियोन के विषय में तब तक चुप नहीं रहूँगा. . . जब तक उसकी धार्मिकता उशा की तरह नहीं चमकेगी, जब तक उसका उद्धार धधकती मशाल की तरह प्रकट नहीं होगा। तब राष्ट्र तेरी धार्मिकता देखेंगे और समस्त राजा तेरी महिमा‘‘ (इसायाह 62:1-2)।

इस प्रकार हम देखते हैं कि येसु मसीह संसार के मुक्तिदाता का सुसमाचार ऐतिहासिक होने के साथ-साथ समयानुसार भी है। यह तथ्य यह भी सिद्ध करता है कि विश्वासी बाइबिल के पवित्र वचनों के द्वारा ईश्वर प्रदत्त मुक्ति को अपने काल में प्राप्त कर सकता है बशर्ते कि वह अपने समय का पूर्ण उपयोग करे। हमें स्वर्गीय वरदानों को प्राप्त करने के लिये कलीसिया द्वारा वर्ष भर आह्वान दिया जाता है यदि हम इन आह्वानों का यथावत् पालन करेंगे तो ईश्वर की प्रतिज्ञाओं को अपने में पूर्ण होते पायेंगे। 

त्याग: अक्सर हम क्रिसमस की तैयारी की सरगर्मी में रात्रि मिस्सा शुरू होने तक दौड़-धूप करते रहते हैं। तमाम चीज़ों में हमारा ध्यान बटा रहता है। ऐसी अवस्था में कुछ महत्वपूर्ण बातों को हम बिलकुल भूल जाते हैं। उदाहरण के लिये इस अवसर पर कुछ त्याग करना- क्योंकि गौशाले की चरनी में लेटे बालक येसु को देखकर कोई यह सोच भी नहीं सकता कि ईश्वर इतना बड़ा त्याग कर सकते हैं! यदि हम इस रहस्य का अनुभव करना चाहते हैं तो हमें स्वयं त्याग करना होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि हम येसु के अनुयायी या शिष्य होने का दावा बार-बार उनका रक्त-शरीर लेकर करते हैं। अर्थात हमें कुछ तो त्याग करना चाहिए। शायद हम करते भी होंगे। लेकिन क्या हमारे परित्याग का वास्तविक अंश उद्धार के खाते में जाता है? येसु का त्याग हमारे उद्धार का कारण बना। हमने कभी सोचा भी नहीं था कि येसु हमारे लिये इतना बड़ा त्याग करेंगे। ‘‘हम निस्सहाय ही थे जब मसीह निर्धारित समय पर विधर्मियों के लिये मर गये। . . . हम पापी ही थे, जब मसीह हमारे लिये मर गये थे‘‘ (रोमियों 5:6-8)।

हमारी काथलिक कलीसिया में यूखारिस्तीय समारोह सहभागिता का सबसे उत्तम उदाहरण है। यही प्रभु येसु की सीख है। इसका अभ्यास पल्ली से प्रारम्भ होकर हमारे घर-आँगन तक होना चाहिये। हमारे पास ऐसे अनेक अवसर हैं जिन्हें हम दूसरों के साथ बाँट सकते हैं। जैसे- हमारा कीमती समय, हमारी मधुर मुस्कान या फिर धन-दौलत इत्यादि। यदि हम धैर्यपूर्वक किसी की सुन लें तो वह भी एक बहुत बड़ा त्याग है। यह सामने वाले के हृदय को शक्ति प्रदान कर उसमें जीवन का संचार करता है। 

विचार धारा - हमारी सोच से यह प्रकट हो जाता है कि हम दूसरों की परवाह करते हैं या नहीं। यदि हम विचार विवेचना करें तो हम पायेंगे कि हम सभी ऐसी बातों का निर्धारण करने में सक्षम हैं जो महान महत्व रखती है। परिवार के सदस्य अपने विचारों को प्रकट तो करते हैं किन्तु उनसे जल्द ही छुटकारा पा लेते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे एक-दूसरे की परवाह नहीं करते। वे घर में ऐसे आते हैं जैसे कोई वाहन इन्धन-पूर्ति के लिये पेट्रोल पंप पर आया हो। एक ऐसी जगह जहाँ नहा-धोकर तथा खा-पीकर तरो ताज़ा होने का एक स्थान मात्र हो। प्रत्येक घर बैठक या बेडरूम में टी.वी. का होना इस बात का द्योतक है कि घर के सदस्य कैसे एक दूसरे की परवाह करते हैं। आजकल टी.वी. चैनलों द्वारा ऐसे धारावाहिकों को परोसा जा रहा है जिसके चलते वर्तमान पीढ़ी विधिहीन होती जा रही है। 

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम बच्चों एवं युवाओं से मिलते समय उन्हें यही शिक्षा देते थे कि उनकी सोच बहुत ऊँचीं हो जिससे वे भावी पीढ़ी का निर्माण कर पायें। संत पौलुस फिलिप्पियों को लिखते हुए कहते हैं ‘‘आप लोग अपने मनोभावों को ईसा मसीह के मनोभावों के अनुसार बना लें‘‘ (फिलिप्पियों 2:1)। 

आज रात्रि में हम बालक येसु की प्रतिमा को चरनी में लेटे हुए देख रहे हैं। यह प्रतिमा उनके सांसारिक जीवन का स्मरण दिलाती है। वे तो आज, कल और अनंतकाल तक एक रूप बने रहने वाले हमारे सृष्टिकर्ता हैं। उनका आमंत्रण हमें स्वीकार करना चाहिये। हममें से अनेक उन्हें छूना चाहते होंगे या फिर उन्हें चूमकर मोमबत्ती लोभान चढ़ाना चाहते होंगे। क्या हमारा विश्वास यहीं तक सीमित रहकर ठहर जायेगा? या फिर हम इस मूर्तरूप को येसु के वास्तविक स्वरूप में बदलने की क्षमता रखते हैं? हमारे पास उचित समय, उच्च विचार धारा तथा त्याग करने की क्षमता हैं। फिर क्यों न हम जीवन की इस चुनौती को स्वीकार करें। आइए, हम सब क्रिसमस के त्योहार को सार्थक बनायें। गौशाले में जीवनदाता को देख जीने की आस जगायें।


Copyright © www.jayesu.com
Praise the Lord!