चक्र अ के प्रवचन

वर्ष का तीसरा इतवार

पाठ: इसायाह 8:23ब-9:3; 1 कुरिन्थियों 1:10-13,17; मत्ती 4:12-23

प्रवाचक: फादर डेविडसन वी. एम


‘ईश्वर प्रेमी पिता हैं। उन्होंने मानवों से असीम प्रेम किया, पर मानवों ने उनके इस प्रेम की कद्र न की और उनका विरोधकर अंधकार का मार्ग अपनाया। पर ईश्वर अपनी प्रिय प्रजा को पाप के अंधकार में भटकते हुये नहीं देख सकते थे। इसलिये वे उनसे एक मुक्तिदाता की प्रतिज्ञा करते हैं जो उन्हें पाप के अंधकार से निकालकर ईश्वर के राज्य में ले जायेगा, जहाँ प्रेम, क्षमा, दया, एकता, शांति, भाईचारा का साम्राज्य होगा। आज के तीनों पाठ इसी तथ्य पर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। नबी इसायाह भविष्य में प्रकट होने वाली एक महती ज्योति को देखते हैं। संत मत्ती प्रभु येसु खीस्त में उस महती ज्योति को अनुभव करते हैं और संत पौलुस उस महती ज्योति को धुँधला करने वालों से तर्क-वितर्क करते हैं।

नबी इसायाह के समय इस्राएल का ऊपरी प्रांत ज़बुलोन और नेफताली आक्रमणकारियों द्वारा उजाड़ दिया गया था। पहले ये प्रांत थे जिन्हें तिगलत पिलेसार तृतीय ने 733 ई.पू. में रौंद डाला था और इसके कुछ निवासियों को निर्वासित कर दिया था। मूर्तिपूजक असीरियों के बीच बिखरी हुई ईश्वर की चुनी प्रजा ईश्वर पर अपना विश्वास बनाये रखने में कठिनाई महसूस कर रही थी और उससे भी मुश्किल था अपने विश्वास को जीना। पर नबी इसायाह का दृढ़ विश्वास था कि आखिरकार ईश्वर इन प्रदेशों को उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्रदान करेंगे। वे अपनी प्रजा को हमेशा के लिये नहीं भूलेंगे और इसलिये विश्वासपूर्वक घोषणा करते हैं कि ईश्वर उन्हें पुनः बसायेगा। अंधकार उजाले से नष्ट हो जायेगा और दुःख खुशी से।

आने वाली खुशी की तुलना वे खुशी की उन दो बड़ी घड़ियों से करते हैं जो पूर्वी देशों में प्रचलित थीं। वे थीं फसल लुनने और लूट बाँटने की घड़ी। नबी इसायाह ने आनन्द की इस घड़ी को आने वाले राजकीय बालक में देखा जो विजय एवं शांति स्थापित करेगा। नबी इसायाह ने जिसे धुँधले में देखा होगा उसे संत मत्ती साफ देखते हैं। येसु ने अपना प्रचार कार्य उस नगर से शुरू किया जो नबी द्वारा पहले ही उल्लेख किये प्रातों के अन्दर आता था। इसलिये संत मत्ती उनमें आनी वाली महती ज्योति देखते हैं। वे ही पूर्व में कहे हुये आनन्द के स्रोत हैं। संत मत्ती यह सब अपने पास्का अनुभव के बाद ही दृढ़ विश्वास के साथ कह सके।

प्रभु येसु ने अपना प्रचार कार्य पश्चात्ताप के आग्रह से शुरू किया। ‘‘समय पूरा हो चुका है। ईश्वर का राज्य निकट आ गया है। पश्चात्ताप करो और सुसमाचार में विश्वास करो‘‘ (मारकुस 1:15)। प्रभु के अनुसार स्वर्गराज्य में प्रवेश पाने की पहली अहम शर्त है पश्चात्ताप। और जिस पश्चात्ताप की मांग वे करते हैं वह है सम्पूर्ण परिवर्तन - अपने पुराने मार्गों को छोड़ कर नये मार्ग को अपनाना, गलत रास्तों को छोड़ प्रभु के मार्गों को स्वीकारना। अगर कोई अपनी त्रुटियों पर पश्चात्ताप करके अपने को नहीं सुधारता तो वह स्वर्ग राज्य के लिये अयोग्य है।

खीस्त ने अपने वचन, कर्म तथा जीवन से हमें नई रोशनी दी है। उन्होंने हमें ईश्वर के प्रेम के बारे में बताया। ईश्वर हमें हर स्थिति में प्यार करते हैं। वे हमें हम जैसे हैं वैसे ही स्वीकारते हैं। वे हमेशा हमारे मन परिवर्तन की बाट जोहते हैं।

अपने पुनरुत्थान से उन्होंने हममें आशा की किरण जगा दी। हम इस संसार में दिशाहीन नहीं हैं। हमारा लक्ष्य अनन्त जीवन है। हमारा जीवन इस लोक तक ही सीमित नहीं है। हम स्वर्गराज्य के भागीदार हैं। अपने बलिदान से उन्होंने हमें पाप के अंधकार से मुक्त कर दिया और हमें ईश्वर के दत्तक पुत्र-पुत्रियाँ बना दिया। ईश्वरीय खुशी में सहभागी होने के लिये उन्होंने हमें योग्य बनाया। कलीसिया के माध्यम से वे हमेशा हमारे बीच वास करते हैं, जिससे हम उनकी छत्र-छाया में रह सकें। पर हमारे कमज़ोर स्वभाव के कारण हम पाप में पड़ कर खीस्त द्वारा अर्जित कृपाओं को बहिष्कार करते हैं। अपने अहंकार, आपसी मन मुटाव के कारण हम खीस्तरूपी महती ज्योति को धुँधला कर देते हैं। 

कुरिन्थवासियों को विश्वास ग्रहण किये तीन वर्ष भी नहीं हुये थे कि उनमें फूट के आसार दिखाई देने लगे थे। कुरिन्थवासी बपतिस्मा द्वारा खीस्तीय बन जाने पर यहूदी एवं यूनानी के रूप में अपनी पुरानी पहचान खो चुके थे। चूँकि खीस्तीय धर्म उस समय व्यवस्थित नहीं था वे उनकी अगुआई करने वाले पौलुस, अपोलो या पेत्रुस से जुड़े थे। शुरू-शुरू में यह लगाव स्वाभाविक था पर बाद में वह उनके बीच पहचान, पृथक्करण एवं भेदभाव का सबब बनने लगा। व्यक्तिगत घमण्ड उनमें घर करने लगा था। पौलुस के द्वारा शिक्षा प्राप्त कर विश्वास में आने के कारण वे स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानते थे और उन्हें नीचा दिखाते थे। दूसरे इसका विरोध करते थे और स्वयं को उनसे श्रेष्ठ मानते थे क्योंकि वे बहुत ही अच्छे वक्ता अपोलो द्वारा विश्वास में आये। दूसरे इन दोनों दलों की उपेक्षा करते थे क्योंकि वे प्रेरितों के शीर्ष पेत्रुस के द्वारा शिक्षित किये गये थे। 

संत पौलुस कुरिन्थवासियों के बीच पनप रहे इस दलबंदी का तीव्र विरोध करते हैं। यह भूलकर कि वे एक ही मसीह के अनुयायी हैं, उनके प्रचारकों के नाम पर कुरिन्थवासियों की यह गुटबंदी उन्हें रास नहीं आयी। वे उन्हें समझाते हैं कि खीस्त पर विश्वास ही महत्वपूर्ण है। प्रचारक तो साधन मात्र है। प्रचारकों के नाम पर लड़ना सच्चा विश्वास नहीं है। यह विश्वास की विकृति है। जिस प्रकार सूर्य की किरण प्रिज़्म से निकलकर सात रंगों में विभाजित हो जाती है, उसी प्रकार विश्वास की किरण जब संकीर्ण-मनोवृति में से गुजरती है तो वह विकृत हो जाती है एवं विभाजन को जन्म देती है। इस प्रकार का विभाजन सच्चे विश्वास की पहचान नहीं है, खीस्त रूपी महती ज्योति की विकृति है।

इसके बावज़ूद हम जानते हैं कि कलीसिया को विभाजन, दलबंदी का सामना करना पड़ा। खीस्तीय जिनकी पहचान आपसी प्रेम से होती थी अब परस्पर विरोधी हो गये थे। लड़ाई-झगड़े, प्रतिस्पर्धा आदि आम बात हो गई थी। यह कलीसिया के लिये एक अभिशाप था। यह खीस्तीयों के लिये एक कलंक था एवं गैर-खीस्तीय, जो खीस्त को स्वीकार कर सकते थे, उनके लिये रुकावट। यह कोई गर्व की बात नहीं थी पर शर्म की। रोमी सैनिकों ने येसु को सिर्फ एक क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया था, पर हम जो उनका अनुकरण करने का दम्भ भरते हैं, जो उन्हें प्रेम करने की कसमें खाते हैं, उनके आध्यात्मिक शरीर को चीर कर टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। अज्ञानी रोमी सैनिकों की तुलना में हम उनसे अधिक निर्ममता से पेश आते हैं। ईश्वर का राज्य एक उपहार एवं जिम्मेदारी है। प्रभु की इच्छा है कि उनके अनुयायी आपसी मतभेदों को दर किनार कर स्वर्गराज्य के कार्यो को आगे बढ़ायें। इसलिये बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति का फर्ज़ है कि वह प्रभु के कार्य को आगे बढ़ाने में आगे आये और अपना सहयोग दे। पर अक्सर हम प्रभु के राज्य के कार्यो में मदद करने के बदले अपना साम्राज्य स्थापित करने में लग जाते हैं। लोगों को हम अपनी कुशलता, काबलियत, उपलब्धियां आदि के द्वारा अपने में उलझा लेते हैं और प्रभु की जगह स्वयं आकर्षण का केन्द्र बन जाते हैं। हम उस महती ज्योति प्रभु और लोगों के बीच रुकावट बन जाते हैं। 

ईश्वर को धन्यवाद कि अब खीस्तीयों को अपनी भूल का अहसास हो रहा है। वे समझ गये हैं कि आपसी मन-मुटाव, फूट आदि बे-मायने हैं और इससे कुछ हासिल नहीं होता। जो बात महत्वपूर्ण है वह स्वयं प्रभु हैं और उनमें विश्वास। इसी सोच का प्रभाव है कि विभिन्न गुटों में सद्भावना जाग्रत हो रही है। वे अपने मतभेदों को भुलाकर एक मंच पर आने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे उस महती ज्योति पर फिर से कोई ग्रहण न लग सके, जिसे नबी इसायाह ने पूर्व में देखा था, संत मत्ती ने अनुभव किया था और संत पौलुस ने जिसकी रक्षा की थी।

आइए हम भी नबी इसायाह के साथ मिलकर प्रभु की महती ज्योति को देखें, संत मत्ती के समान उसे अपने जीवन में अनुभव करें एवं संत पौलुस के समान उसकी रक्षा करें और इस प्रकार एक खीस्तीय होने का फर्ज़ अदा करें।


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