चक्र अ के प्रवचन

पास्का का दूसरा इतवार

पाठ: प्रेरित-चरित 2:42-47; 1 पेत्रुस 1:3-9; योहन 20:19-31

प्रवाचक: जार्ज स्टीफन


येसु का मृतकों में से जी उठना अर्थात ‘पुनरुत्थान‘ हमारे खीस्तीय विश्वास का मूलाधार है। शिष्यों के सुसमाचार-प्रचार की प्रमुख विषय-वस्तु येसु का पुनरुत्थान ही था। अपने पहले प्रवचन में संत पेत्रुस यहूदियों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, ‘‘ईश्वर ने इन्हीं ईसा नामक मनुष्य को पुनर्जीवित किया है- हम इस बात के साक्षी हैं‘‘ (प्रेरित-चरित 2:32)। संत पौलुस अपने सम्पूर्ण ज्ञान एवं अनुभव से कहते हैं कि ‘‘यदि मसीह जी नहीं उठे, तो हमारा धर्म प्रचार व्यर्थ है और आप लोगों का विश्वास भी व्यर्थ है‘‘ (1 कुरिन्थियों 15:14)। अर्थात प्रभु येसु का पुनरुत्थान हमारे जीवन की नींव डालने में एक महत्वपूर्ण योगदान रखता है। 

येसु के शिष्य इस पुनरुत्थान के रहस्य को समझने में बड़े ही काहिल निकले। यह सोचकर बड़ा आश्चर्य होता है कि मसीह येसु का मृतकों में से जी उठकर पिता ईश्वर की महिमा में प्रवेश करने की बात पर शिष्यगण विश्वास करने में इतने अनिच्छुक क्यों थे। ऐसा लगता है कि तीन वर्षों तक तमाम् ईश्वरीय शक्ति के आश्चर्यजनक कार्य देखने के बावजूद भी शिष्यगण येसु को मात्र एक निरे मनुष्य के समान देखते रहे। येसु ने अपने आगामी दुःख भोगने, मरने एवं जी उठने के विषय में स्पष्ट रूप से जिक्र किया था। शायद दुःख भोगने तथा मरने की बात शिष्यों को पसन्द नहीं आयी थी (मत्ती 22:22-23)। या फिर ‘ईश्वर मर कैसे सकते हैं’- यह रहस्य शिष्यों के गले उतर नहीं पाया था। इसलिये पेत्रुस अन्य शिष्यों को आमंत्रण देते हुए अपने पुराने व्यवसाय में लगभग लौट ही जाता है (योहन 21:3) 

शिष्यों की यह काहिली एवं अविश्वास भावी कलीसिया और हमारे लिये योग्य सिद्ध हुए। यदि शिष्यगण येसु के पुनरुत्थान की बाट जोहते तो चतुर यहूदी विद्वान और जनता उनपर यही आरोप लगाते कि शिष्यगण येसु के मायाजाल में फंस गये हैं। सदूकियों के साथ पहले ही पुनरुत्थान के विषय में बहस हो चुकी थी। शायद इस कारण पुनरुत्थान की घटना पर शिष्य कोई परिकल्पना नहीं कर पाये। 

सुसमाचार का घटनाक्रम खीस्तीय जीवन से सम्बन्धित तीन प्रमुख बातों को स्पष्ट करता हैः- (1) येसु में विश्वास। (2) पाप क्षमा करने का सामर्थ्य। (3) शांति।

उपरोक्त तीनों तथ्य दिव्य शक्ति-सम्पन्न हैं और येसु के बिना प्राप्त नहीं किये जा सकते हैं। येसु का पुनरुत्थान ही हम मनुष्यों को अविश्वास, पाप एवं मरणशीलता से मुक्ति दिला सकता है। येसु में विश्वास करने से मुक्ति मिलती है (प्रेरित-चरित 4:12; एफेसियों 2:8)। येसु ही हमारे मन के अंधकार को दूर करते हैं। (देखिए लूकस 24:45) येसु ही हमें शांति प्रदान करते हैं (योहन 14:27)। किन्तु हमारे लिये यह ईश्वर का दिव्य वरदान है जिसे प्रभु ने कलीसिया में हमें प्रदान किया है (रोमियों 5:8)। 

एक सुदृढ़ खीस्तीय जीवन की शुरुआत के लिये उपरोक्त कृपा अति अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि एक चुनौतीपूर्ण खीस्तीय जीवन की शुरुआत तब हो सकती है जब व्यक्ति पुनरुत्थित-येसु से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात करे। संत पौलुस का उदाहरण अतिउत्तम है ( प्रेरित-चरित 9)। अब प्रश्न उठता है कि व्यक्ति येसु से कैसे मुलाकात करे? एक बार पुनः हम आज के सुसमाचार पर दृष्टि डालें। सप्ताह के प्रथम दिन. . . रविवार की शाम अर्थात प्रभु का ठहराया हुआ पवित्र दिन . . .। दरवाजे बन्द थे. . . येसु अन्दर आकर खड़े हो गये। यह दृश्य येसु के आध्यात्मिक सामर्थ्य को प्रकट करता है। येसु पुनरुत्थान के सत्य को प्रमाणित करना चाहते हैं। यह इसलिये कि जिस मनुष्य को क्रूसित कर मार डाला गया था वह अब पुनर्जीवित हैं और अब संसार की कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं सकती।

यदि हम येसु से मुलाकात करना चाहते हैं तो हमें उनके प्रदत्त वरदानों का गंभीरता से उपयोग करना होगा। किसी भी नयी वस्तु या विचारधारा के प्रति हम साधारणतः संकुचित व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। भय एवं अविश्वास के कारण हमारे हृदय का द्वार बंद रहता है। हमारी पृष्ठभूमि, हमारी परम्परा के कारण हम खुलकर किसी नयी चीज़ का स्वागत नहीं कर पाते। यह हम मनुष्यों की दशा है। अर्थात्- अज्ञान (अविश्वास), अंधकार (पाप) एवं क्षणभंगुरता (मरणशीलता) हम मनुष्यों की पतित अवस्था है (उत्पत्ति 3)। 

सर्वप्रथम हमें चाहिए कि हम अपनी अज्ञानता को दूर करें। इसके लिये हमारे हृदय में प्यास एवं जिज्ञासा होनी चाहिये। येसु के शिष्य डरे सहमें अवश्य थे किन्तु वे पुनरुत्थित येसु को देखना चाहते थे। संत थॉमस का कथन इस बात को स्पष्ट करता है, ‘‘जब तक मैं उनके हाथों में कीलों के निशान न देख लूँ, कीलों की जगह अपनी उँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा‘‘ (योहन 20:25)। अतः हमें धर्मग्रन्थ में लिखे साक्ष्यों को बड़े ध्यान से पढ़ना, उस पर मनन्-चिंतन करना चाहिये। इसके साथ ही कलीसिया की शिक्षा, पुरोहितों के प्रवचनों तथा दूसरों के साक्ष्यों को सुनना चाहिए। यह परम्परा स्वयं प्रभु येसु ने दी है (योहन 20:17-18; लूकस 24:44-49)। तत्पश्चात हमें उक्त साक्ष्यों के द्वारा प्रभु पर विश्वास को जगाना होगा। फिर ‘‘पश्चात्ताप कर पापों की क्षमा के लिये प्रभु येसु के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण करें’‘ (प्रेरित चरित 2:37-38)। यदि हम खीस्तीय परिवार में जन्मे हैं तो अपने विश्वास का नवीनीकरण करें (एफे़सियों 4:17-32)। 

मसीह की प्रतिज्ञा इसलिये की गई थी कि वे हमें अनन्त जीवन प्रदान करें। ‘‘येसु‘‘ ईश्वर होकर भी मानव-मुक्ति हेतु, मानव बनकर मरे जिससे हम मानवता की पूर्णता को प्राप्त कर सकें (फ़िलिप्पियों 2:6-8; योहन 10:10ब)। 

हम अपने आप से प्रश्न करें कि ‘क्या वास्तव में येसु से मेरी व्यक्तिगत मुलाकात हुई है?‘ वर्ष भर माता कलीसिया हमारी आध्यात्मिक उन्नति के लिये प्रयत्न करती है। क्या मैं इसकी शिक्षा को गंभीरता से लेता हूँ? या फिर मेरे लिये सबकुछ आडम्बर है? 

येसु का पुनरुत्थान इस संसार में हमारे लिये विजय का पताका है। इसे हमें अपने जीवन में फहराना है।


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Praise the Lord!