जयेसु प्रार्थना संसाधन

प्रस्तावना

असीसी के संत फ्रांसिस कहते हैं: “एक गरीब एक अमीर व्यक्ति के दरवाजे पर क्या करता है? एक बीमार व्यक्ति अपने वैद्य के सामने क्या करता है? एक प्यासा व्यक्ति जल-स्रोत के पास क्या करता है? वे जो भी करते हैं, वही मैं परमप्रसाद में उपस्थित येसु के सामने करता हूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ, आराधना करता हूँ, प्यार करता हूँ।“

असीसी के संत फ्रांसिस का कहना है: “रोज येसु अपने आप को दीन-हीन बनाते हैं जिस प्रकार उन्होंने स्वर्ग के सिंहासन से माता मरियम के गर्भ में उतरने पर किया था। रोज वे हमारे पास आते हैं अपने आप को दीन-हीनता में प्रकट करते हैं जब वे पिता की गोद में से वेदी पर पुरोहित के हाथों में उतरते हैं।“

कोलकोत्ता की धन्य तेरेसा कहती हैं: “अगर हम वेदी की रोटी में येसु को नहीं देखते और उनमें विश्वास नहीं करते हैं, तो हम गरीबों के रूप धारण करने वाले येसु को नहीं देख पायेंगे।“

कोलकोत्ता की धन्य तेरेसा का कहना है: “जब आप कूसित येसु के रूप को देखते हैं, तब आप जानते हैं कि उन्होंने उस समय आप को कितना प्यार किया था। जब आप परमप्रसाद की ओर देखते हैं, तब आप जानते हैं कि अब वे आपको कितना प्यार करते हैं।

मरुभूमि के संत अन्तोनी कहते हैं: जब हम प्रार्थना और परित्याग करते हैं, तब शैतान को डर लगता है। जब हम विनीत और अच्छे बनते हैं, तब उसे डर लगता है। जब हम येसु को प्यार करते हैं, तब उसे और ज़्यादा डर लगता है। जब हम क्रूस का चिह्न बनाते हैं, तब वह भग जाता है।“

“छोटी सफेद होस्तिया में सब से बडी प्रेम कहानी है।” - महाधर्माध्यक्ष फुल्टन जे.शीन

इसायाह 38:19-20 “जीवित मनुष्य ही तेरी स्तुति करता है, जैसा कि मैं आज कर रहा हूँ। पिता अपने पुत्रों को तेरी सत्यप्रतिज्ञता का ज्ञान करायेगा। (20) प्रभु! तूने मेरा उद्धार किया। इसलिए हम जीवन भर प्रभु के मन्दिर में वीणा बजाते हुए तेरी स्तुति करेंगे।“

निर्गमन 23:25-26 “तुम अपने प्रभु ईश्वर की सेवा करोगे और वह तुम्हारे अन्न-जल को आशीर्वाद देगा और मैं तुम से बीमारियाँ दूर रखूँगा। (26) न तो तुम्हारे देश में गर्भपात होगा और न कोई बाँझ रहेगी। मैं तुम्हारी आयु के दिन बढाऊँगा।“

प्रवक्ता ग्रन्थ 1:14-16 “ईश्वर के प्रति प्रेम सम्मान्य प्रज्ञा है। (15) जिन लोगों को यह वरदान मिलता है, वह उन्हें ईश्वर के दर्शन और उन से उसके महान् कार्यो की स्तुति कराता है। (16) प्रज्ञा का मूल स्रोत प्रभु पर श्रद्धा है। वह भक्तों को जन्म से प्राप्त होती है। उसने अपने लिए मनुष्यों के बीच सदा के लिए अपना निवास बनाया और वह उनके वंशजों के प्रति ईमानदार रहेगी।“

स्तोत्र 63:1-6 “ईश्वर! तू ही मेरा ईश्वर है! मैं तुझे ढूँढ़ता रहता हूँ। मेरी आत्मा तेरे लिए प्यासी है। जल के लिए सूखी सन्तप्त भूमि की तरह, मैं तेरे दर्शनों के लिए तरसता हूँ। (3) मैंने तेरे मंदिर में तेरे दर्शन किये, मैंने तेरा सामर्थ्य और तेरी महिमा देखी है। (4) तेरी सत्यप्रतिज्ञता प्राणों से भी अधिक प्यारी है। मेरा कण्ठ तेरी स्तुति करता था। (5) मैं जीवन भर तुझे धन्य कहूँगा और तुझ से करबद्ध प्रार्थना करता रहूँगा। (6) मेरी आत्मा मानों उत्तम व्यंजनों से तृप्त होगी; मैं उल्लसित हो कर तेरी स्तुति करूँगा।“

प्रवक्ता 40:26-28 “समृद्धि और सामर्थ्य की अपेक्षा प्रभु पर श्रद्धा हृदय को अधिक आनन्द प्रदान करती है। (27) जो प्रभु पर श्रद्धा रखता, उसे किसी बात की कमी नहीं और उसे किसी सहायक की आवश्यकता नहीं। (28) प्रभु पर श्रद्धा हरी-भरी वाटिका-जैसी और महिमामय छतरी-जैसी है।

प्रवक्ता 50:24-26 “आओ! सर्वेश्वर को धन्य कहो। वह सर्वत्र महान् कार्य करता है। वह माता के गर्भ से मनुष्य का विकास करता है और अपनी इच्छा के अनुसार उसे गढ़ता हैं (25) वह हमारे हृदय को आनन्द प्रदान करे और हमारे समय में भी पहले की तरह इस्राएल में सदा के लिए शान्ति बनाये रखे। (26) उसकी कृपादृष्टि हम पर बनी रहे और हमारे दिनों में हमारा उद्धार करे।“

योहन 4:4 “तुम ईश्वर के हो और तुमने उन लोगों पर विजय पायी है; क्योंकि जो तुम में हैं, वह उस से महान् हैं, जो संसार में है।“

1 कुरिन्थियों 12:9 प्रभु ने कहा- “मेरी कृपा तुम्हारे लिए पर्याप्त है, क्योंकि तुम्हारी दुर्बलता में मेरा सामर्थ्य पूर्ण रूप से प्रकट होता है।“

इब्रानियों 13:15 “हम ईसा के द्वारा ईश्वर को स्तुति का बलिदान अर्थात् उसके नाम की महिमा करने वाले होंठों का फल-निरन्तर चढ़ाना चाहते हैं।“

1 इतिहास 16:29 “उसके नाम की महिमा का गीत सुनाओ। चढ़ावा ले कर उसके सामने आओ। पवित्र वस्त्र पहन कर प्रभु की आराधना करो।“

स्तोत्र 103:2-6 “मेरी आत्मा! प्रभु को धन्य कहो और उसका एक भी वरदान कभी नहीं भुलाओ। (3) वह तेरे सभी अपराध क्षमा करता और तेरी सारी दुर्बलताएँ दूर करता है। (4) वह तुझे सर्वनाश से बचाता और दया और अनुकम्पा से संभालता है। (5) वह जीवन भर तुझे सुख-शान्ति प्रदान करता और तुझे गरूड़ की तरह चिरंजीवी बनाता है। (6) प्रभु न्यायपूर्वक शासन करता और सब पददलितों का पक्ष लेता है।“

स्तोत्र 50:21-22 “तुम यह सब करते हो और मैं चुप रहूँ? क्या तुम मुझे अपने जैसा समझते हो? मैं तुम्हारा एक-एक अपराध गिना कर तुम पर दोष लगाता हूँ। (22) ’’तुम, जो ईश्वर को भूल जाते हो-सावधान रहो! कहीं ऐसा न हो कि मैं तुम्हारा विनाश करूँ और तुम्हारा उद्धार करने वाला कोई न हो।“

याकूब 5:13-18 “यदि आप लोगों में कोई कष्ट में हो, तो वह प्रार्थना करे। कोई प्रसन्न हो, तो भजन गाये। (14) कोई अस्वस्थ हो, तो कलीसिया के अध्यक्षों को बुलाये और वे प्रभु के नाम पर उस पर तेल का विलेपन करने के बाद उसके लिए प्रार्थना करें। (15) वह विश्वासपूर्ण प्रार्थना रोगी को बचायेगी और प्रभु उसे स्वास्थ्य प्रदान करेगा। यदि उसने पाप किया है, तो उसे क्षमा मिलेगी। (16) इसलिए आप लोग एक दूसरे के सामने अपने-अपने पाप स्वीकार करें और एक दूसरे के लिए प्रार्थना करें, जिससे आप स्वथ हो जायें। धर्मात्मा की भक्तिमय प्रार्थना बहुत प्रभावशाली होती है। (17) एलियस हमारी ही तरह निरे मनुष्य थे। उन्होंने आग्रह के साथ इसलिए प्रार्थना की कि पानी नहीं बरसे और साढ़े तीन वर्ष तक पृथ्वी पर पानी नहीं बरसा। (18) उन्होंने दुबारा प्रार्थना की। स्वर्ग से पानी बरसा और पृथ्वी पर फसल उगने लगी।”


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