निर्गमन 3:4-5 “निरीक्षण करने के लिए उसे निकट आते देख कर ईश्वर ने झाड़ी के बीच में से पुकार कर उससे कहा, ''मूसा! मूसा!'' उसने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।'' (5) ईश्वर ने कहा, ''पास मत आओ। पैरों से जूते उतार दो, क्योंकि तुम जहाँ खड़े हो, वह पवित्र भूमि है।''
योशुआ 3:5 “योशुआ ने लोगो से कहा, ’’अपने को पवित्र बनाये रखो क्योंकि कल प्रभु तुम्हारी आँखों के सामने चमत्कार करेगा’’।
प्रज्ञा 1:4-5 “प्रज्ञा उस आत्मा में प्रवेश नहीं करती, जो बुराई की बातें सोचती है और उस शरीर में निवास नहीं करती, जो पाप के अधीन है; (5) क्योंकि शिक्षा प्रदान करने वाला पवत्रि आत्मा छल-कपट से घृणा करता है। वह मूर्खतापूर्ण विचारों को तुच्छ समझता और अन्याय से अलग रहता है।”
प्रज्ञा 1:7-9 “प्रभु का आत्मा संसार में व्याप्त है। वह सब कुछ को एकता में बाँधे रखता है और मनुष्य जो कुछ कहते हैं, वह सब जानता है। (8) इसलिए जो दुष्टतापूर्ण बातें करते हैं, वे छिप नहीं सकते और न्यायकर्ता उन्हें अवश्य दण्ड देगा। (9) दुष्ट की योजनाओें की जाँच की जायेगी और उसके शब्दों की आवाज़ प्रभु तक पहुँचेगी, जिससे उसे उसके अपराधों का दण्ड दिया जाये।“
प्रज्ञा 11:23 “तू सब पर दया करता है, क्योंकि तू सर्वशक्तिमान् है। तू मनुष्य के पापों को इसलिए अनदेखा करता है, कि वह पश्चात्ताप करें।”
एज़्रा 9:5-6 “सन्ध्याकालीन यज्ञ के समय मैं अपने विषाद की अवस्था से जागा। मेरा कुरता और मेरी चादर फटी हुई थी। मैं घुटनों के बल गिर कर और अपने प्रभु-ईश्वर की ओर हाथ फैला कर (6) इस प्रकार प्रार्थना करने लगाः ’’मेरे ईश्वर! मैं इतना लज्जित हूँ कि तेरी ओर दृष्टि लगाने का साहस नहीं हो रहा है, क्योंकि हम अपने पापों में डूब गये हैं और हमारा दोष आकाश छूने लगा है।”
एज़्रा 9:15 “प्रभु! इस्राएल के ईश्वर! तू दयामय है, इसीलिए आज भी हम में कुछ लोग जीवित रह गये हैं। हम अपराधी हो कर तेरे सामने उपस्थित हैं, हालांँकि हम में कोई अपने अपराध के कारण तेरे समाने खड़ा होने योग्य नहीं है।”
यिरमियाह 8:4-7 “प्रभु यह कहता है- यदि कोई गिरता है, तो क्या वह फिर नहीं उठता? यदि कोई भटक जाता है, तो क्या वह फिर नहीं लौटता? (5) तो क्या यह प्रजा, येरुसालेम के ये निवासी सदा के लिए भटकते रहेंगे? वे कपटपूर्ण आचरण करते रहते हैं और लौटने से इनकार करते हैं। (6) मैंने उन्हें ध्यान से सुना है, किन्तु वे कभी ठीक बात नहीं बोलते। कोई अपनी दुष्टता पर पश्चाताप कर यह नहीं कहता, ’मैंने क्या कर डाला?’ प्रत्येक अपने-अपने मार्ग पर वैसे ही चला जा रहा है, जैसे घोड़ा बिना सोचे-समझे युद्धभूमि में शत्रु पर टूट पड़ता है। (7) आकाश का लगलग पक्षी अपने प्रव्रजन का समय जानता है। पंडूक, अबाबील और सारस अपने लौटने का समय नहीं भूलते। किन्तु मेरी प्रजा प्रभु द्वारा निर्धारित व्यवस्था की अवज्ञा करती है।“
इसायाह 29:13 “प्रभु कहता है, “ये लोग केवल शब्दों द्वारा मेरे पास आते हैं। इनके होंठ मेरी महिमा करते हैं, किन्तु इनका हृदय मुझ से दूर है। ये दूसरों के ओदेश से मुझ पर श्रद्धा रखते हैं, इनकी भक्ति रटायी हुई शिक्षा है।“ यिरमियाह 4:14 “येरुसालेम! अपने हृदय से बुराई निकाल दे, जिससे तू बच सके! तेरे बुरे विचार तुझ से कब निकलेंगे?”
यिरमियाह 5:1 “येरुसालेम की हर गली में जाओ; देखो और पता लगाओ; उसके चैकों में खोजोः यदि तुम को एक भी ऐसा व्यक्ति मिले, जो न्यायी और और सत्यनिष्ठ हो, तो मैं इस नगर को क्षमा प्रदान करूँगा।“
स्तोत्र 79:8-9 “हमारे पूर्वजों के पापों के कारण हम पर अप्रसन्न न हों। तेरी करूणा हमें शीघ्र प्राप्त हों; क्योंकि हम घोर संकट में हैं। (9) ईश्वर! हमारे मुक्तिदाता! अपने नाम की महिमा के लिए हमारी सहायता कर। अपने नाम की मर्यादा के लिए हमारा उद्धार कर, हमारे पाप क्षमा कर।“
इसायाह 6:5-7 “मैंने कहा, “हाय! हाय! मैं नष्ट हुआ; क्योंकि मैं तो अशुद्ध होंठों वाला मनुष्य हूँ और अशुद्ध होंठों वाले मनुष्यों को बीच रहता हूँ और मैंने विश्वमण्डल के प्रभु, राजाधिराज को अपनी आँखों से देखा“। (6) एक सेराफ़ीम उड़ कर मेरे पास आया। उसके हाथ में एक अंगार था, जिसे उसने चिमटे से वेदी पर से ले लिया था। (7) उस से मेरा मुँह छू कर उसने कहा, “देखिए, अंगार ने आपके होंठों का स्पर्श किया है। आपका पाप दूर हो गया और आपका अधर्म मिट गया है।“
मारकुस 7:20-23 “ईसा ने फिर कहा, ’’जो मनुष्य में से निकलता है, वही उसे अशुद्ध करता है। (21) क्योंकि बुरे विचार भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से निकलते हैं। व्यभिचार, चोरी, हत्या, (22) परगमन, लोभ, विद्वेष, छल-कपट, लम्पटता, ईर्ष्या, झूठी निन्दा, अहंकार और मूर्खता- (23) ये सब बुराइयाँ भीतर से निकलती है और मनुष्य को अशुद्ध करती हैं।“
सफ़न्याह 3:9 “मैं लोगों के होंठ फिर शुद्ध करूँगा, जिससे वे सब-के-सब प्रभु का नाम लें और एक हृदय हो कर उसकी सेवा करें।“
स्तोत्र 50:23 जो मुझे धन्यवाद का बलिदान चढ़ाता है, वही मेरा सम्मान करता है। जो सदाचारी है, मैं उसे ईश्वर के मुक्ति-विधान के दर्शन कराऊँगा।’’
स्तोत्र 51:19 “मेरा पश्चाताप ही मेरा बलिदान होगा। तू पश्चातापी दीन-हीन हृदय का तिरस्कार नहीं करेगा।“
स्तोत्र 85:3 “तूने अपनी प्रजा के अपराध क्षमा किये, तूने उसके सभी पापों को ढक दिया।”
मारकुस 2:15-17 “ एक दिन ईसा अपने शिष्यों के साथ लेवी के घर भोजन पर बैठे। बहुत-से नाकेदार और पापी उनके साथ भोजन कर रहे थे, क्योंकि वे बड़ी संख्या में ईसा के अनुयायी बन गये थे। (16) जब फ़रीसी दल के शास्त्रियों ने देखा कि ईसा पापियों और नाकेदारों के साथ भोजन कर रहे हैं, तो उन्होंने उनके शिष्यों से कहा, ’’ वे नाकेदारों और पापियों के साथ क्यों भोजन करते हैं?’’ (17) ईसा ने यह सुन कर उन से कहा, ’’निरोगियों को नहीं, रोगियों को वैद्य की ज़रूरत होती है। मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को बुलाने आया हूँ।’’
1 योहन 1:9 “यदि हम अपने पाप स्वीकार करते हैं, तो वह हमारे पाप क्षमा करेगा और हमें हर अधर्म से शुद्ध करेगा; क्योंकि वह विश्वसनीय तथा सत्यप्रतिज्ञ है।“
स्तोत्र 49:8-9 “मनुष्य न तो अपने भाई का उद्धार कर सकता और न उसके जीवन का मूल्य ईश्वर को दे सकता है। (9) प्राणों का मूल्य इतना ऊँचा है कि किसी के पास पर्याप्त धन नहीं।
1 तिमथी 1:15 “यह कथन सुनिश्चित और नितान्त विश्वसनीय है कि ईसा मसीह पापियों को बचाने के लिए संसार में आये, और उन में सर्वप्रथम मैं हूँ।“
मत्ती 6:14-15 “यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा। परन्तु यदि तुम दूसरों को क्षमा नहीं करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा नहीं करेगा।“
इसायाह 1:18 “ प्रभु कहता है : ''आओ, हम एक साथ विचार करें। तुम्हारे पाप सिंदूर की तरह लाल क्यों न हों, वे हिम की तरह उज्जवल हो जायेंगे; वे किरमिज की तरह मटमैले क्यों न हों, वे ऊन की तरह श्वेत हो जायेंगे।“
दानिएल 3:40-43 “हमारा पश्चात्तापी हृदय और हमारा विनम्र मन मेढ़ों, साँडो और हजारों पुष्ट भेड़ो की बलि-जैसे तुझे ग्राह्य हों। आज तेरे लिए यही हमारा बलिदान हो। ऐसा कर कि हम पूर्ण रूप से तेरे मार्ग पर चलें, क्योंकि तुझ पर भरोसा रखने वाले कभी निराश नहीं होते। (41) अब हम यह दृढ संकल्प करते हैं कि हम तेरे मार्ग पर चलेंगे, तुझ पर श्रद्धा रखेंगे, और तेरे दर्शनों की कामना करते रहेंगे। (42) हमें निराश न होने दे, बल्कि हम पर अपनी सहनशीलता तथा महती दया प्रदर्शित कर। (43) प्रभु! अपने अपूर्व कार्यों द्वारा हमारी रक्षा कर और अपने नाम को महिमान्वित कर।
दानिएल 9:8-10 “प्रभु! हम सब कलंकित हैं- हमारे राजा, हमारे शासक और हमारे पुरखे, क्योंकि हमने तेरे विरुद्ध पाप किया है। ''हमारा प्रभु-ईश्वर हम पर दयादृष्टि करे और हमें क्षमा प्रदान करे, क्योंकि हमने उसके विरुद्ध विद्रोह किया और अपने प्रभु-ईश्वर की वाणी अनसुनी कर दी है। उसने अपने सेवकों, अपने नबियों द्वारा जो नियम हमारे सामने रखे थे हमने उनका पालन नहीं किया।“
शोकगीत 3:40-44 “हम अपने आचरण की जाँच और परीक्षा करें और प्रभु की ओर अभिमुख हो जायें। (41) हम अपने हृदय और हाथ स्वर्ग के ईश्वर की ओर कर लें। (42) “हमने पाप और विद्रोह किया है और तूने हमें क्षमा नहीं किया। (43) “तूने क्रोध धारण कर हमारा पीछा किया और निर्दयता से हमारा वध किया। (44) तूने अपने को बादल में छिपा लिया, जिससे तेरे पास कोई दुहाई न पहुँचे।“
सूक्ति ग्रन्थ 20:9 “कौन मनुष्य यह कह सकता है: ‘‘मैंने अपना हृदय शुद्ध किया, मैं अपने पाप से मुक्त हो गया हूँ?‘‘
स्तोत्र 103:12 “पूर्व पश्चिम से जितना दूर है, प्रभु हमारे पापों को हम से उतना ही दूर कर देता है।“
मीकाह 7:18-19 “तेरे सदृश कौन ऐसा ईश्वर है, जो अपराध हरता और अपनी प्रजा का पाप अनदेखा करता हैं; जो अपना क्रोध बनाये नहीं रखता, बल्कि दया करना चाहता हैं? वह फिर हम पर दया करेगा, हमारे अपराध पैरों तले रौंद देगा और हमारे सभी पाप गहरे समुद्र में फेंकेगा।“
मारकुस 11:25-26 “'जब तुम प्रार्थना के लिए खड़े हो और तुम्हें किसी से कोई शिकायत हो, तो क्षमा कर दो, जिससे तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा कर दे।''
सोरेन कीर्कगार्ड का कहना है : “शून्यता से ईश्वर सृष्टि करते हैं। यह एक आश्चर्यजनक बात है। परन्तु वे इस से भी आश्चर्यजनक एक कार्य करते हैं – वे पापियों से संत बनाते हैं।“