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जयेसु प्रार्थना संसाधन
ईश्वर की स्तुति
अनुवाक्य: हम तेरी स्तुति करते हैं। (या अल्लेलूया)
मैं तेरी अपार कृपा के कारण तेरे मन्दिर में प्रवेश करता हूँ। (स्तोत्र 5:8)
मैं बड़ी श्रद्धा से तेरे पवत्रि मन्दिर को दण्डवत् करता हूँ। (स्तोत्र 5:8)
जो तेरी शरण जाते हैं, वे सब आनन्द मनायेंगे। (स्तोत्र 5:12)
जो तेरे नाम के प्रेमी हैं, वे आनन्द के गीत गायेंगे। (स्तोत्र 5:12)
प्रभु! तू ही धर्मी को आशीर्वाद देता है। (स्तोत्र 5:13)
तू अपनी कृपा की ढाल से उसकी रक्षा करता है। (स्तोत्र 5:13)
मैं उसकी न्यायप्रियता के कारण प्रभु को धन्य कहूँगा। (स्तोत्र 7:18)
मैं सर्वोच्च प्रभु के नाम का स्तुतिगान करूँगा। (स्तोत्र 7:18)
प्रभु! हमारे ईश्वर! तेरा नाम समस्त पृथ्वी पर कितना महान् है! (स्तोत्र 8:1)
तेरी महिमा आकाश से भी ऊँची है। (स्तोत्र 8:2)
बालक और दुधमुँहे बच्चे तेरा गुणगान करते हैं। (स्तोत्र 8:3)
प्रभु! मैं सारे हृदय से तुझे धन्यवाद दूँगा। (स्तोत्र 9:1)
मैं तेरे सब अपूर्व कार्यों का बखान करूँगा। (स्तोत्र 9:2)
सर्वोच्च ईश्वर! मैं तेरे नाम के आदर में भजन गाता हूँ। (स्तोत्र 9:3)
प्रभु पददलितों का आश्रय है, संकट के समय शरणस्थान। (स्तोत्र 9:10)
प्रभु! मुझे तेरी सत्यप्रतिज्ञा का भरोसा है। (स्तोत्र 13:6)
मेरा हृदय तेरा उद्धार पा कर आनन्दित हो और मैं प्रभु के सब उपकारों के लिए उसके आदर में गीत गाऊँ। (स्तोत्र 1:6)
तू मेरा मार्ग प्रशस्त करता है; इसलिए मैरे पैर नहीं फिसलते। (स्तोत्र 18:37)
प्रभु! मैं राष्ट्रों के बीच तुझे धन्यवाद दूँगा और तेरे नाम का स्तुतिगान करूँगा। (स्तोत्र 18:50)
प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि तूने मेरा उद्धार किया। (स्तोत्र 30:1)
प्रभु-भक्तों! उसके आदर में गीत गाओ, उसके पवत्रि नाम का जयकार करो। (स्तोत्र 30:5)
मेरी आत्मा निरन्तर तेरा गुणगान करती है। (स्तोत्र 30:12)
प्रभु! मेरे ईश्वर! मैं अनन्त काल तक तुझे धन्यवाद देता रहूँगा। (स्तोत्र 30:12)
प्रभु! तेरी भलाई कितनी अपार है! तू अपने भक्तों के लिए कितना दयालु है! (स्तोत्र 31:20)
जो तेरी शरण आते हैं, तू उन्हें सबों के सामने आश्रय देता है। (स्तोत्र 31:20)
धर्मियों! उल्लसित हो कर प्रभु में आनन्द मनाओ। (स्तोत्र 32:11)
तुम सब, जिनका हृदय निष्कपट है, आनन्द के गीत गाओ। (स्तोत्र 32:11)
समस्त पृथ्वी प्रभु का आदर करे, उसके सभी निवासी उस पर श्रद्धा रखें। (स्तोत्र 33:8)
मैं हर समय प्रभु को धन्य कहूँगा; मेरा कण्ठ निरन्तर उसकी स्तुति करेगा। (स्तोत्र 34:1)
मेरी आत्मा गौरव के साथ प्रभु का गुणगान करती है। दीन-हीन उसे सुन कर आनन्द मनाये। (स्तोत्र 34:3)
मेरे साथ प्रभु की महिमा का गीत गाओ। हम मिल कर उसके नाम की स्तुति करें। (स्तोत्र 34:4)
मैं प्रभु के कारण आनन्द मनाऊँगा; उसकी सहायता के कारण मैं उल्लसित हो उठूँगा। (स्तोत्र 35:9)
दिन में मैं प्रभु की कृपा के लिए तरसता हूँ, रात को मैं अपने जीवन्त ईश्वर की स्तुति गाता हूँ। (स्तोत्र 42:9)
मैं ईश्वर की वेदी के पास जाऊँगा, ईश्वर के पास, जो मेरा आनन्द और उल्लास है। मैं वीणा बजाते हुए अपने प्रभु-ईश्वर की स्तुति करूँगा। (स्तोत्र 43:4)
समस्त राष्ट्रों! तालियाँ बजाओ और उल्लसित हो कर ईश्वर का जयकार करो; (स्तोत्र 47:1)