जयेसु प्रार्थना संसाधन

पवित्र वचन (सुनने की तैयारी में)

योशुआ 1:7-8 “दृढ़ बने रहो और ढारस रखो। जो संहिता मेरे सेवक मूसा ने तुम को दी है उसका सावधानी से पूरा-पूरा पालन करो। उस से तुम न बायें भटको और न दाहिने। इस से तुम्हारा सर्वत्र कल्याण होगा। (8) संहिता के इस ग्रन्थ की चरचा करते रहो। दिन-रात उसका मनन करो, जिससे उस में जो कुछ लिखा है तुम उसका सावधानी से पालन करो। इस तरह तुम उन्नति करते रहोगे और अपने सब कार्यों में सफलता प्राप्त करोगे।“

इसायाह 40:8 “घास सूख जाती और फूल मुरझाता हैं, किन्तु हमारे ईश्वर का वचन सदा-सर्वदा बना रहता है।“

मीकाह 4:2 “बहुत-से राष्ट्र यह कह कर यहाँ के लिए प्रस्थान करेंगे, ’’आओ हम प्रभु के पर्वत, याकूब के ईश्वर के मन्दिर चल दें, जिससे वह हमें अपने मार्ग सिखाये और हम उसके पथ पर चलते रहें; क्योंकि सियोन से संहिता प्रकट होगी और येरुसालेम से प्रभु की वाणी।“

योहन 6:66-68 “इसके बाद बहुत-से शिष्य अलग हो गये और उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया। (67) इसलिए ईसा ने बारहों से कहा, ‘‘कया तुम लोग भी चले जाना चाहते हो?'' (68) सिमोन पेत्रुस ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘प्रभु! हम किसके पास जायें! आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का सन्देश है।

मत्ती 4:4 “ईसा ने उत्तर दिया, ''लिखा है- मनुष्य रोटी से ही नहीं जीता है। वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है।''

इसायाह 55:3 “कान लगा कर सुनो और मेरे पास आओ। मेरी बात पर ध्यान दो और तुम्हारी आत्मा को जीवन प्राप्त होगा।“

इब्रानियों 4:12 “ईश्वर का वचन जीवन्त, सशक्त और किसी भी दुधारी तलवार से तेज है। वह हमारी आत्मा के अन्तरतम तक पहुँचता और हमारे मन के भावों तथा विचारों को प्रकट कर देता है। ईश्वर से कुछ भी छिपा नहीं है।“

2 तिमथी 3:16-17 “पूरा धर्मग्रन्थ ईश्वर की प्रेरणा से लिखा गया है। वह शिक्षा देने के लिए, भ्रान्त धारणाओं का खण्डन करने के लिए, जीवन के सुधार के लिए और सदाचरण का प्रशिक्षण देने के लिए उपयोगी है। (17) जिससे ईश्वर-भक्त सुयोग्य और हर प्रकार के सत्कार्य के लिए उपयुक्त बन जाये।“

यिरमियाह 23:29 “''मेरी वाणी अग्नि-जैसी है, वह उस हथौड़े की तरह है, जो चट्टान को टुकड़े-टुकड़े कर देता है।''

स्तोत्र 119:105 “तेरी शिक्षा मुझे ज्योति प्रदान करती और मेरा पथ आलोकित करती है।

इसायाह 55:10-11 “जिस तरह पानी और बर्फ़ आकाश से उतर कर भूमि सींचे बिना, उसे उपजाऊ बनाये और हरियाली से ढके बिना वहाँ नहीं लौटते, जिससे भूमि बीज बोने वाले को बीज और खाने वाले को अनाज दे सके, (11) उसी तरह मेरी वाणी मेरे मुख से निकल कर व्यर्थ ही मेरे पास नहीं लौटती। मैं जो चाहता था, वह उसे कर देती है और मेरा उद्देश्य पूरा करने के बाद ही वह मेरे पास लौट आती है।“

प्रज्ञा 16:26 “प्रभु! इस प्रकार तेरे प्रिय पुत्रों को अनुभव हुआ कि मनुष्यों का पोषण विभिन्न फलों द्वारा नहीं होता, बल्कि तेरा वचन उन सब को सँभालता है, जो तुझ पर विश्वास करते हैं।“

लूकस 10:38-42 “ईसा यात्रा करते-करते एक गाँव आये और मरथा नामक महिला ने अपने यहाँ उनका स्वागत किया। (39) उसके मरियम नामक एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही। (40) परन्तु मरथा सेवा-सत्कार के अनेक कार्यों में व्यस्त थी। उसने पास आ कर कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह ठीक समझते हैं कि मेरी बहन ने सेवा-सत्कार का पूरा भार मुझ पर ही छोड़ दिया है? उस से कहिए कि वह मेरी सहायता करे।’’ (41) प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ’’मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो; (42) फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।’’

संत पिता संत ग्रिगोरी कहते हैं, “ईश्वर के वचन से ईश्वर का हृदय जानिए”।


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