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जयेसु प्रार्थना संसाधन
स्तोत्र 89
अनुवाक्य : प्रभु तू सदा-सर्वदा धन्य है!
मैं प्रभु के उपकारों का गीत गाता रहूँगा। मैं पीढ़ी-दर-पीढ़ी तेरी सत्यप्रतिज्ञता घोशित करता रहूँगा।
तेरी कृपा सदा बनी रहेगी। तेरी प्रतिज्ञा आकाश की तरह चिरस्थायी है।
प्रभु! आकाश तेरे अपूर्व कार्य घोशित करता है। स्वर्गिकों की सभा तेरी सत्यप्रतिज्ञता का बखान करती है।
ईश्वर स्वर्गिकों की सभा में महाप्रतापी है, अपने साथ रहने वालों में सर्वाधिक श्रद्धेय है!
विश्मण्डल के प्रभु-ईश्वर! तेरे समान कौन? प्रभु! तू शक्तिशाली और सत्यप्रतिज्ञ है।
तू महासागर का घमण्ड चूर करता और उसकी उद्यण्ड लहरों को शान्त करता है।
आकाश तेरा है, पृथ्वी भी तेरी है; तूने संसार और उसके वैभव की स्थापना की।
तेरी भुजा शक्तिशाली है, तेरा हाथ सुदृढ़, तेरा दाहिना हाथ प्रतापी है।
तेरा सिंहासन सत्य और न्याय पर आधारित है। प्रेम और सत्यप्रतिज्ञता तेरे आगे-आगे चलती है!
प्रभु! धन्य है वह प्रजा, जो तेरा जयकार करती है और तेरे मुखमण्डल की ज्योति में चलती हैं!
वह दिन भर तेरे नाम पर आनन्द मनाती और तेरे न्याय पर गौरव करती है;
क्योंकि तू ही उसके बल की शोभा है। तेरी कृपा से हमारा सामर्थ्य बढ़ता है।
प्रभु ही हमारी रक्षा करता है। इस्राएल का परमपावन ईश्वर हमारे राजा को संभालता है।
तूने प्राचीनकाल में दर्शन दे कर अपने भक्तों से यह कहाः ’’मैंने एक शूरवीर की सहायता की है, जनता में एक नवयुवक को ऊपर उठाया है।