जयेसु प्रार्थना संसाधन

समर्पण

योशुआ 24:15 “यदि तुम ईश्वर की उपासना नहीं करना चाहते, तो आज ही यह कर लो कि तुम किसकी उपासना करना चाहते हो- उन देवताओं की, जिनकी उपासना तुम्हारे पूर्वज नदी के उस पार करते थे अथवा अमोरियों के देवताओं की, जिनके देश में तुम रहते हो। मैं और मेरा परिवार, हम सब प्रभु की उपासना करना चाहते हैं।“

1 मक्काबियों 2:17-22 “राजा के पदाधिकारो ने मत्तथ्या को सम्बोधित करते हुए कहा, ’’आप इस नगर के प्रतिष्ठित और शक्तिशाली नेता हैं। आप को अपने पुत्रों और भाइयों का समर्थन प्राप्त हैं। (18) आप सर्वप्रथम आगे बढ़ कर राजाज्ञा का पालन कीजिए, जैसा कि सभी राष्ट्र, यूदा के लोग और येरुसालेम के निवासी कर चुके हैं। ऐसा करने पर आपके पुत्र राजा के मित्र बनेंगे और सोना चाँदी और बहुत-से उपहारों द्वारा आपका और आपके पुत्रों का सम्मान किया जायेगा।’’ (19) मत्तथ्या ने पुकार कर यह उत्तर दिया, ’’साम्राज्य के सभी राष्ट्र भले ही राजा की बात मान जायें, सभी आपने पुरखों का धर्म छोड़ दें और राजा के आदेशों का पालन करें, (20) किंतु मैं, मेरे पुत्र और मेरे भाई-हम अपने पुरखों के विधान के अनुसार ही चलेंगे। (21) ईश्वर हमारी रक्षा करे, जिससे हम उसकी संहिता और उसके नियमों का परित्याग न करें। (22) हम राजा की आज्ञाओं का पालन नहीं करेंगे और अपने धर्म का किसी भी प्रकार से उल्लंघन नहीं करेंगे।“

रोमियों 6:12-14 “अब आप लोग अपने मरणशील शरीर में पाप का राज्य स्वीकार नहीं करें और उनकी वासनाओं के अधीन नहीं रहें। (13) आप अपने अंगों को अधर्म के साधन बनने के लिए पाप को अर्पित नहीं करें। आप अपने को मृतकों में से पुनर्जीवित समझकर ईश्वर के प्रति अर्पित करें और अपने अंगों को धार्मिकता के साधन बनने के लिए ईश्वर को सौंपदें। (14) आप लोगों पर पाप का कोई अधिकार नहीं रहेगा। अब आप संहिता के नहीं, बल्कि अनुग्रह के अधीन हैं।

सूक्ति 16:3 “अपने सभी कार्य प्रभु को अर्पित करो और तुम्हारी योजनाएँ सफल होगी।“

सूक्ति 3:9-10 “अपनी सम्पत्ति से प्रभु का सम्मान करो; उसे अपनी उपज का दशमांश चढ़ाओ। इस से तुम्हारे बखार अनाज से भरे रहेंगे और तुम्हारे कोल्हुओं से अंगूरी छलकेगी।“

1 इतिहास 29:14 “मैं कौन हूँ, मेरी प्रजा क्या है, जो हम में इतनी भेंटों चढ़ाने का सामर्थ्य रहा हो? सब तुझ से ही मिला है और जो तुझ से पाया है, हमने तुझे चढ़ा दिया है।“

1 कुरुन्थियों 4:7 “कौन आप को दूसरों की अपेक्षा अधिक महत्व देता है? आपके पास क्या है, जो आपको न दिया गया है? और यदि आप को सब कुछ दान में मिला है, तो इस पर गर्व क्यों करते हैं, मानो यह आप को न दिया गया हो?”

रोमियों 11:35-36 “किसने ईश्वर को कभी कुछ दिया है जो वह बदले में कुछ पाने का दावा कर सके? (36) ईश्वर सब कुछ का मूल कारण, प्रेरणा-स्रोत तथा लक्ष्य है - उसी को अनन्त काल तक महिमा! आमेन!”

रोमियों 12:1 “अत: भाइयो! मैं ईश्वर की दया के नाम पर अनुरोध करता हूँ कि आप मन तथा हृदय से उसकी उपासना करें और एक जीवन्त, पवित्र तथा सुग्राह्य बलि के रूप में अपने को ईश्वर के प्रति अर्पित करें।“

मारकुस 12:41-44 “ईसा ख़जाने के सामने बैठ कर लोगों को उस में सिक्के डालते हुए देख रहे थे। बहुत-से धनी बहुत दे रहे थे। (42) एक कंगाल विधवा आयी और उसने दो अधेले अर्थात् एक पैसा डाल दिया। (43) इस पर ईसा ने अपने शिष्यों को बुला कर कहा, ''मैं तुम से यह कहता हूँ- ख़जाने में पैसे डालने वालों में से इस विधवा ने सब से अधिक डाला है; (44) क्योंकि सब ने अपनी समृद्धि से कुछ डाला, परन्तु इसने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला।''

स्तोत्र 37:5 “प्रभु को अपना जीवन अर्पित करो, उस पर भरोसा रखो और वह तुम्हारी रक्षा करेगा।“

स्तोत्र 55:23 “तुम प्रभु पर अपना भार छोड़ दो, वह तुम को संभालेगा। वह धर्मी को विचलित नहीं होने देगा।“


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Praise the Lord!