आनुवाक्य: हे प्रभु मैं तेरे चरणों में समर्पित करता हूँ।
मीकाह 6:8 “मनुष्य! तुम को बताया गया है कि उचित क्या है और प्रभु तुम से क्या चाहता है। यह इतना ही है- न्यायपूर्ण व्यवहार, कोमल भक्ति और ईश्वर के सामने विनयपूर्ण आचरण।''
सूक्ति 16:1-9 “मनुष्य योजनाएँ बनाता है; उनकी सफलता प्रभु पर निर्भर है। (2) मनुष्य अपना आचरण निर्दोष समझता है, किन्तु प्रभु हृदय की चाह लेता है। (3) अपने सभी कार्य प्रभु को अर्पित करो और तुम्हारी योजनाएँ सफल होगी। (4) प्रभु ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए सब कुछ बनाया- दुष्ट को भी, क्रोध के दिन के लिए। (5) प्रभु को घमण्डी से घृणा है। उसे अन्त में निश्चय ही दण्ड मिलेगा। (6) भक्ति और निष्ठा से पाप का प्रायश्चित होता है। प्रभु पर श्रद्धा द्वारा मनुष्य बुराई से दूर रहता है। (7 यदि प्रभु किसी के आचरण से प्रसन्न है तो वह उसके शत्रुओं से भी उसका मेल कराता है। (8) अन्याय से कमायी हुई अपार सम्पत्ति की अपेक्षा धर्मी का थोड़ा-सा सामान अच्छा है। (9) मनुष्य मन में अपना मार्ग निश्चित करता, लेकिन प्रभु उसके कदमों को सुदृढ़ बनाता है।“