जयेसु प्रार्थना संसाधन

आन्तरिक चंगाई

इसायाह 43:1-5 “ याकूब! जिसने तुम्हारी सृष्टि की है, इस्राएल! जिसने तुम को गढ़ा है, वही प्रभु अब कहता है: “नहीं ड़रो! मैंने तुम्हारा उद्धार किया है। मैंने तुम को अपनी प्रजा के रूप में अपनाया है। (2) यदि तुम समदु्र पार करोगे, तो मैं तुम्हारे साथ होऊँगा। जलधाराएँ तुम्हें बहा कर ले जायेंगी। यदि तुम आग पार करोगे, तो तुम नहीं जलोगे। ज्वालाएँ तुम को भ्स्म नहीं करेंगी; (3) क्योंकि मैं, प्रभु, तुम्हारा ईश्वर हूँ; मैं इस्राएल का परमपावन उद्धारक हूँ। मैंने तुम को छुड़ाने के लिए मिस्र दे दिया, तुम्हारे बदले में इथोपिया और सबा दे दिये। (4) तुम मेरी दृष्टि में मूल्यवान् हो और महत्व रखते हो। मैं तुम्हें प्यार करता हूँ। इसलिए मैं तुम्हारे बदले मनुयों को देता हूँ? तुम्हारे प्राणों के लिए राष्ट्रों को देता हूँ। (5) नहीं डरो! मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं पूर्व से तुम्हारे वंशजों को लौटाऊँगा। मैं पश्चिम से तुम लोगों को एकत्र करूँगा। (6) मैं उत्तर से कहूँगा, ’उन्हें छोड़ दो’ और दक्शिण से, ’उन्हें मत रोको।’ मेरे पुत्रों को दूर-दूर से ला दो और मेरी पुत्रियों को पृथ्वी के कोने-कोने से; (7) उन सबों को, जो मेरे कहलाते हैं, जिनकी सृष्टि मैंने अपनी महिमा के लिए की है, जिन्हें मैंने गढ़ा और बनाया है।”

मारकुस 4:37-40 “उस समय एकाएक झंझावात उठा। लहरें इतने ज़ोर से नाव से टकरा नहीं थीं कि वह पानी से भरी जा रही थी। (38) ईसा दुम्बाल में तकिया लगाये सो रहे थे। शिष्यों ने उन्हें जगा कर कहा, ’’गुरुवर! हम डूब रहे हैं! क्या आप को इसकी कोई चिन्ता नहीं?’’ (39) वे जाग गये और उन्होंने वायु को डाँटा और समुद्र से कहा, ’’शान्त हो! थम जा!’’ वायु मन्द हो गयी और पूर्ण शान्ति छा गयी। (40) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, ’’तुम लोग इस प्रकार क्यों डरते हो ? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं हैं?’’

येसु ने आँधी और तूफ़ान के सामने खडे होकर अधिकार के साथ कहा, “शांत हो जा, थम जा” और आँधी-तूफ़ान ने उनकी आज्ञा का पालन किया। हमारे जीवन की आँधी-तूफ़ान के समय अगर हम अपने जीवन-नाव में सोने वाले येसु को जगायेंगे, तो अवश्य ही सभी आँधी-तूफ़ान को वे शांत करेंगे।

येसु के साथ थोडी देर समय बिताने के बाद समारी स्त्री के जीवन में कितनी खुशी का अनुभव हुआ था। (योहन 4)

येसु से मिलने के बाद ज़केयुस का जीवन कितना बदल गया था! (लूकस 19:1-10)

लूकस 7:37-50 “नगर की एक पापिनी स्त्री को यह पता चला कि ईसा फ़रीसी के यहाँ भोजन कर रहे हैं। वह संगमरमर के पात्र में इत्र ले कर आयी (38) और रोती हुई ईसा के चरणों के पास खड़ी हो गयी। उसके आँसू उनके चरण भिगोने लगे, इसलिए उसने उन्हें अपने केशों से पोंछ लिया और उनके चरणो को चूम-चूम कर उन पर इत्र लगाया। (39) जिस फ़रीसी ने ईसा को निमन्त्रण दिया था, उसने यह देख कर मन-ही-मन कहा, ’’यदि वह आदमी नबी होता, तो जरूर जाना जाता कि जो स्त्री इसे छू रही है, वह कौन और कैसी है-वह तो पापिनी है’’। (40) इस पर ईसा ने उस से कहा, ’’सिमोन, मुझे तुम से कुछ कहना है’’। उसने उत्तर दिया, ’’गुरूवर! कहिए’’। (41) ’’किसी महाजन के दो कर्जदार थे। एक पाँच सौ दीनार का ऋणी था और दूसरा, पचास का। (42) उनके पास कर्ज अदा करने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए महाजन ने दोनों को माफ़ कर दिया। उन दोनों में से कौन उसे अधिक प्यार करेगा?’’ (43) सिमोन ने उत्तर दिया, ’’मेरी समझ में तो वही, जिसका अधिक ऋण माफ हुआ’’। ईसा ने उस से कहा, ’’तुम्हारा निर्णय सही है।’’। (44) तब उन्होंने उस स्त्री की ओर मुड़ कर सिमोन से कहा, ’’इस स्त्री को देखते हो? मैं तुम्हारे घर आया, तुमने मुझे पैर धोने के लिए पानी नहीं दिया; पर इसने मेरे पैर अपने आँसुओं से धोये और अपने केशों से पोंछे। (45) तुमने मेरा चुम्बन नहीं किया, परन्तु यह जब से भीतर आयी है, मेरे पैर चूमती रही है। (46) तुमने मेरे सिर में तेल नहीं लगाया, पर इसने मेरे पैरों पर इत्र लगाया है। (47) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, इसके बहुत-से पाप क्षमा हो गये हैं, क्योंकि इसने बहुत प्यार दिखाया है। पर जिसे कम क्षमा किया गया, वह कम प्यार दिखाता है।’’ (48) तब ईसा ने उस स्त्री से कहा, ’’तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं’’। (49) साथ भोजन करने वाले मन-ही-मन कहने लगे, ’’यह कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?’’ (50) पर ईसा ने उस स्त्री से कहा, ’’तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है। शान्ति प्राप्त कर जाओ।’’

इसायाह 6:1-8 “राजा उज़्ज़ीया के देहान्त के वर्ष मैंने प्रभु को एक ऊँचे सिंहासन पर बैठा हुआ देखा। उसके वस्त्र का पल्ला मन्दिर का पूरा फ़र्श ढक रहा था। (2) उसके ऊपर सेराफ़म विराजमान थे, उनके छः-छः पंख थेः दो चेहरा ढकने, दो पैर ढकने और उड़ने के लिए (3) और वे एक दूसरे को पुकार-पुकार कर यह कहते थे, “पवत्रि, पवत्रि, पवत्रि है विश्वमडल का प्रभु! उसकी महिमा समस्त पृथ्वी में व्याप्त है।“ (4) पुकारने वाले की आवाज़ से प्रवेशद्वार की नींव हिल उठी और मन्दिर धुएँ से भर गया। (5) मैंने कहा, “हाय! हाय! मैं नष्ट हुआ; क्योंकि मैं तो अशुद्ध होंठों वाला मनुष्य हूँ और अशुद्ध होंठों वाले मनुष्यों को बीच रहता हूँ और मैंने विश्वमण्डल के प्रभु, राजाधिराज को अपनी आँखों से देखा“। (6) एक सेराफ़ीम उड़ कर मेरे पास आया। उसके हाथ में एक अंगार था, जिसे उसने चिमटे से वेदी पर से ले लिया था। (7) उस से मेरा मुँह छू कर उसने कहा, “देखिए, अंगार ने आपके होंठों का स्पर्श किया है। आपका पाप दूर हो गया और आपका अधर्म मिट गया है।“ (8) तब मुझे प्रभु की वाणी यह कहते हुए सुनाई पड़ी “मैं किसे भेजूँ? हमारा सन्देश-वाहक कौन होगा?“ और मैंने उत्तर दिया, “मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज!“


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Praise the Lord!