पास्का का तीसरा इतवार - वर्ष C

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📕पहला पाठ

धर्म के विरोधी कितना ही अत्याचार क्यों न करें, कलीसिया येसु के पुनरुत्थान का साक्ष्य देती रहेगी। यदि विश्वासियों को इस कारण दुःख उठाना पड़ता है, तो उनको आनन्द का अनुभव होता है; क्योंकि वे पेत्रुस और प्रेरितों की तरह 'येसु के नाम के कारण अपमानित हो जाने के योग्य समझे जाते हैं।'

प्रेरित-चरित 5:27-32,40-41

"हम और पवित्र आत्मा इन बातों के साक्षी हैं।"

प्रधानयाजक ने प्रेरितों से कहा, "हमने तुम लोगों को कड़ा आदेश दिया था कि वह नाम ले कर शिक्षा मत दिया करो और तुम लोगों ने येरुसालेम के कोने-कोने में अपनी शिक्षा का प्रचार किया और उस मनुष्य की हत्या की जिम्मेवारी हमारे सिर पर मढ़ना चाहते हो।" इस पर पेत्रुस और अन्य प्रेरितों ने यह उत्तर दिया, "मनुष्यों की अपेक्षा ईश्वर की आज्ञा का पालन करना अधिक उचित है। आप लोगों ने येसु को क्रूस पर लटका कर मार डाला था, किन्तु हमारे पूर्वजों के ईश्वर ने उन्हें जिलाया है। ईश्वर ने उन्हें शासक तथा मुक्तिदाता का उच्च पद दे कर अपने दाहिने बैठा दिया, जिससे वह उनके द्वारा इस्राएल को पश्चात्ताप तथा पापक्षमा प्रदान करे। इन बातों के साक्षी हम हैं और पवित्र आत्मा भी, जिसे ईश्वर ने उन लोगों को प्रदान किया है, जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं।" उन्होंने प्रेरितों को वह कड़ा आदेश दे कर छोड़ दिया। कि तुम लोग येसु का नाम ले कर उपदेश न दिया करो। प्रेरित इसलिए आनन्दित हो कर महासभा के भवन से निकले कि वे येसु के नाम के कारण अपमानित हो जाने के योग्य समझे गये।

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 29:2,4,11-13

अनुवाक्य : हे प्रभु! मैं तेरी स्तुति करूँगा। तूने मेरा उद्धार किया है। (अथवा : अल्लेलूया!)

1. हे प्रभु! मैं तेरी स्तुति करूँगा। तूने मेरा उद्धार किया है। तूने मेरे शत्रुओं को मुझ पर हँसने नहीं दिया। हे प्रभु! तूने मेरी आत्मा को अधोलोक से निकाला है, तूने मुझे मृत्यु से बचा लिया है।

2. जो प्रभु से प्रेम रखते हैं, वे प्रभु के आदर में गीत गायें, और उसके पवित्र नाम की महिमा करें। उसका क्रोध क्षण भर का है, किन्तु उसकी कृपा जीवन भर बनी रहती है। संध्या को भले ही रोना पड़े, किन्तु प्रातःकाल आनन्द ही आनन्द होता है।

3. हे प्रभु! मेरी सुन। मुझ पर दया कर। हे प्रभु! मेरी सहायता कर। तूने मेरा शोक आनन्द में बदल दिया है। हे प्रभु! मेरे ईश्वर! मैं अनन्तकाल तक तेरी स्तुति करूँगा।

📘दूसरा पाठ

येसु मसीह ही हम मसीही धर्म वालों की आशा के एकमात्र आधार हैं। हम विश्वास करते हैं कि धर्मग्रंथ में जो मेमना सम्मान, महिमा और स्तुति का अधिकारी बनाया जाता है, वही हमारा प्रभु येसु है। हम दुनिया की महिमा नहीं चाहते। हमें विश्वास है कि हम किसी दिन मसीह की महिमा के दर्शन करेंगे।

प्रकाशना-ग्रंथ 5:11-14

“बलि चढ़ाया हुआ मेमना वैभव तथा सामर्थ्य का अधिकारी है।"

मेरे सामने वह दर्शन चलता रहा और मैं योहन ने सिंहासन, प्राणियों और वयोवृद्धों के चारों ओर खड़े बहुत-से स्वर्गदूतों की आवाज सुनी उनकी संख्या लाखों और करोड़ों की थी। वे ऊँचे स्वर से कह रहे थे, "बलि चढ़ाया हुआ मेमना सामर्थ्य, वैभव, प्रज्ञा, शक्ति, सम्मान, महिमा तथा स्तुति का अधिकारी है।" तब मैंने यह कहते समस्त सृष्टि को आकाश और पृथ्वी के, पृथ्वी के नीचे और समुद्र के अन्दर के प्रत्येक जीव को सुना, "सिंहासन पर विराजमान को तथा मेमने को युगानुयुग स्तुति, सम्मान महिमा तथा सामर्थ्य!!" और चार प्राणी बोले, "आमेन" और वयोवृद्धों ने मुँह के बल गिर कर दण्डवत् किया।

प्रभु की वाणी।

📒जयघोष

अल्लेलूया, अल्लेलूया! हे प्रभु! हमारे लिए धर्मग्रंथ की व्याख्या कर। हम से बातें कर और हमारा हृदय उद्दीप्त कर दे। अल्लेलूया!

📙सुसमाचार

येसु अपनी मृत्यु के बाद अपने शिष्यों को बारम्बार अपने पुनरुत्थान का प्रमाण दे कर बड़े प्रेम से उन से मिले थे। वह हम को भी प्यार करते हैं और हमें भी उनके प्रेम के बदले उनको प्यार करना चाहिए।

सन्त योहन के अनुसार पवित्र सुसमाचार 21:1-19

[ कोष्ठक में रखा अंश छोड़ दिया जा सकता है]
“येसु शिष्यों के पास आये और रोटी ले कर उन्हें देने लगे, और उसी तरह मछली भी।"

तिबेरियस के समुद्र के पास येसु अपने शिष्यों को फिर दिखाई पड़े। यह इस प्रकार हुआ। सिमोन पेत्रुस, थोमस जो यमल कहलाता था, नथानाएल जो गलीलिया के काना का निवासी था, ज़बेदी के पुत्र और येसु के दो अन्य शिष्य साथ थे। सिमोन पेत्रुस ने उन से कहा, "मैं मछली मारने जा रहा हूँ।" वे उस से बोले, "हम भी आपके साथ चलते हैं।" वे चल पड़े और नाव पर चढ़े, किन्तु उस रात उन्हें कुछ नहीं मिला। सबेरा हो ही रहा था कि येसु तट पर दिखाई दिए; शिष्य उन्हें नहीं पहचान सके। येसु ने उन से कहा, "बच्चो! खाने को कुछ मिला? " उन्होंने उत्तर दिया, "जी नहीं।" इस पर येसु ने उन से कहा, "नाव के दाहिने जाल डाल दो और तुम्हें मिलेगा।" उन्होंने जाल डाला और इतनी मछलियाँ फँस गयीं कि वे जाल नहीं निकाल सके। तब उस शिष्य ने जिसे येसु प्यार करते थे, पेत्रुस से कहा, "यह तो प्रभु ही हैं।" जब पेत्रुस ने सुना कि यह प्रभु हैं, तो वह अपना कपड़ा पहन कर क्योंकि वह नंगा था समुद्र में कूद पड़ा। दूसरे शिष्य मछलियों से भरा जाल खींचते हुए डोंगी पर आए; वे किनारे से केवल लगभग दो सौ हाथ दूर थे। उन्होंने तट पर उतर कर वहाँ कोयले की आग पर रखी हुई मछली देखी और रोटी भी। येसु ने उन से कहा, "तुमने अभी-अभी जो मछलियाँ पकड़ी हैं, उन में से कुछ ले आओ।" सिमोन पेत्रुस गया और जाल किनारे खींच लाया। उस में एक सौ तिरपन बड़ी-बड़ी मछलियाँ थीं। और इतनी मछलियाँ होने पर भी जाल नहीं फटा था। येसु ने उन से कहा, "आओ, जलपान कर लो।" शिष्यों में से किसी को येसु से यह पूछने का साहस नहीं हुआ कि आप कौन हैं। वे जानते थे कि वह प्रभु हैं। येसु अब पास आए और रोटी ले कर उन्हें देने लगे, और उसी तरह मछली भी। इस प्रकार येसु मृतकों में से जी उठने के बाद तीसरी बार अपने शिष्यों के सामने प्रकट हुए।

[ जलपान के बाद येसु ने सिमोन पेत्रुस से कहा, "सिमोन, योहन के पुत्र! क्या तुम इनकी अपेक्षा मुझे अधिक प्यार करते हो? ” उसने उन्हें उत्तर दिया, "जी हाँ प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ।" उन्होंने पेत्रुस से कहा, "मेरे मेमनों को चराओ।" येसु ने दूसरी बार उस से कहा, "सिमोन, योहन के पुत्र! क्या तुम मुझे प्यार करते हो!" उसने उत्तर दिया, "जी हाँ, प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ।" उन्होंने पेत्रुस से कहा, "मेरी भेड़ों को चराओ।" येसु ने तीसरी बार उस से कहा, "सिमोन, योहन के पुत्र! क्या तुम मुझे प्यार करते हो? " पेत्रुस को इस से दुःख हुआ कि उन्होंने तीसरी बार उस से यह पूछा, "क्या तुम मुझे प्यार करते हो? " और उसने येसु से कहा, "प्रभु! आप को तो सब कुछ मालूम है; आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ।" येसु ने उस से कहा, "मेरे मेमनों को चराओ।" "मैं तुम से कहे देता हूँ जवानी में तुम स्वयं अपनी कमर कस कर जहाँ चाहते थे, वहाँ घूमते-फिरते थे; लेकिन बुढ़ापे में तुम अपने हाथ फैला दोगे और दूसरा व्यक्ति तुम्हारी कमर कस कर तुम्हें वहाँ ले जाएगा, जहाँ तुम जाना नहीं चाहते।" इन शब्दों से येसु ने संकेत किया कि किस प्रकार की मृत्यु से पेत्रुस द्वारा ईश्वर की महिमा का विस्तार होने वाला है। येसु ने अंत में पेत्रुस से कहा, "मेरा अनुसरण करो।"]

प्रभु का सुसमाचार।


📚 मनन-चिंतन-

सुसमाचार में, शिष्य मछुआरे के रूप में अपनी आजीविका पर वापस लौट आए। इसलिए वे अपने स्वयं के प्रयास से मछली पकड़ने गए और शायद वे येसु के बारे में भूल गए। क्योंकि उन्होंने सोचा कि येसु पुनर्जीवित नहीं हुए हैं। हम शिष्यों के जीवन में येसु के चमत्कारी प्रभाव को देखते हैं। जब वे येसु के बिना मछली पकड़ने गए तो उन्होंने कुछ भी नहीं पकड़ा लेकिन जब येसु तस्वीर में आए तो उन्होंने बहुत सारी मछलियाँ पकड़ीं। यह सुसमाचार का परिदृश्य हमारे दैनिक जीवन में भी लागू होता है। यदि हम प्रभु के मार्गदर्शन के बिना खुद से काम करते हैं, तो हमारे पास कुछ भी नहीं होता है। प्रभु के मार्गदर्शन के बिना इस दुनिया में हम जो भी गतिविधि या कोई भी प्रयास करते हैं, वह निरर्थक और खाली है। लेकिन जिस क्षण हम येसु से अपने जीवन के प्रयासों और लक्ष्यों की प्राप्ति में हमारा मार्गदर्शक प्रकाश बनने के लिए कहते हैं तो येसु असंभव को संभव बनाते हैं चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न लगे। वे निराश लोगों को आशा देते हैं, वे अर्थहीन जीवन को सार्थक और उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं। हमें केवल एक काम करने की आवश्यकता है और वह है उनकी मदद और मार्गदर्शन माँगना।

- फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)


📚 REFLECTION

In the gospel, the disciples reverted back to their livelihood as fishermen. So they went fishing by their own effort and perhaps they forgot about the Lord. Because they thought that the Lord has not risen. We see the miraculous influence that Jesus had in the lives of the disciples. When they went fishing without Jesus they caught nothing but when Jesus came into the picture they caught plenty of fish. This gospel scenario is also applicable in our daily lives. If we do things by ourselves without asking the guidance of the Lord, we end up with nothing. Every activity or any endeavour that we do in this world without the guidance of the Lord is meaningless and empty. But the moment we ask Jesus to be our guiding light in the achievement of our lives endeavours and goals. Jesus is alive and risen! He makes the impossible possible no matter how difficult it may seem. He gives hope to the hopeless, He makes a meaningless life meaningful and with purpose. We only need to do one thing and that is to ask for His help and guidance.

-Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)

📚 मनन-चिंतन- 2

1 मई 1955 को, कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ इटालियन वर्कर्स को दी गई सार्वजनिक दर्शकों के दौरान, जिनके सदस्य उस दिन सेंट पीटर स्क्वायर में अपने समाज की 10 वीं वर्षगांठ मनाने और चर्च के सामाजिक कार्यक्रम के प्रति अपनी वफादारी की प्रतिज्ञा करने के लिए एकत्र हुए थे। पोप पायस XII ने सेंट जोसेफ द वर्कर के लिटर्जिकल त्यौहार की स्थापना की और इसे मई के पहले दिन को सौंपा, जिससे सेंट जोसेफ और मजदूर वर्ग के बीच विशेष संबंधों को ठोस अभिव्यक्ति मिली। संत पापा ने अपने श्रोताओं और "सारी दुनिया के मेहनतकश लोगों" को आश्वासन दिया: "आपके पास एक चरवाहा, एक रक्षक और एक पिता है।" जैसा कि क्लेरवॉक्स के सेंट बर्नार्ड कहते हैं, "उसके नाम से उसकी कीमत की कल्पना करें, जिसका अर्थ है, 'वृद्धि'!"

पोप पायस XII ने आगे कहा, "ऐसा करने का हमारा इरादा सभी पुरुषों को श्रम की गरिमा को पहचानने के लिए है। यह हमारी आशा है, कि यह गरिमा, अधिकारों और कर्तव्यों के समान वितरण पर स्थापित एक सामाजिक व्यवस्था और कानून के एक निकाय के गठन के मकसद की आपूर्ति कर सकती है। हमें यकीन है कि आप वास्तव में विनम्र लोगों से प्रसन्न हैं। नाज़रेथ का मेहनती आदमी न केवल परमेश्वर और कलीसिया के सामने अपने हाथों से काम करने वालों की गरिमा को दर्शाता है, बल्कि वह आपकी और आपके परिवारों का निरंतर संरक्षक भी है।

माता कलीसिया, ईसाई कार्यकर्ताओं को ईसाई कारीगरी के मॉडल और उदाहरण के रूप में सेंट जोसेफ को उनके संरक्षक के रूप में देखने का निर्देश देती है। काम कभी भी एक सजा नहीं था; बल्कि,परमेश्वर की योजना है । और, इसलिए, चाहे हम एक कुर्सी बनाएं या एक गिरजाघर का निर्माण करें, हमें अपने हाथों, अपने दिलों और दिमागों से अंतिम उद्देश्य को परिणाम देने के लिए कहा जाता है, अर्थात, मसीह के शरीर का निर्माण करना ।

चिंतन: "चाहे तुम खाओ या पीओ, वा जो कुछ भी करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो" (1 कुरिन्थियों 10:31)।

- फादर पायस लकड़ा


📚 REFLECTION

In our gospel today, Jesus asked Peter three times: “Do you love me?” Many would say that these three questions of Jesus are related to Peter’s threefold denial of Jesus in the night of His arrest. They see Peter’s affirmation of love. “Lord, you know that I love you,” as erasing his threefold denial of Jesus. In other words, it allows Peter to make amends for his past and to redeem himself.

My dear friends what is needed here is our “yes” to the love of Jesus and this must be our response to His love because we are loved-people. He loves us. We can respond to His love by loving Him too, but in what way? It is by loving others. I’m hoping that loving others becomes our guiding Christian principle.

Today is the feast of Saint Joseph the Worker, the foster father of Jesus. On May 1, 1955, Pope Pius XII granted a public audience to the Catholic Association of Italian Workers, whose members had gathered in Saint Peter’s Square to celebrate the tenth anniversary of their society. They were solemnly renewing, in common, their promise of loyalty to the social doctrine of the Church, and it was on that day that the Pope instituted the liturgical feast of May 1, in honour of Saint Joseph the Worker to coincide with Labour Day. He assured his audience and the working people of the world: “You have beside you a shepherd, a defender and a father” in Saint Joseph, the carpenter whom God in His providence chose to be the virginal father of Jesus and the head of the Holy Family. He is silent but has excellent hearing, and his intercession is very powerful over the Heart of the Saviour. That is why this could be the reason why May 1 is also Labour Day

May 1, as the feast of St. Joseph the Worker is not only a mere celebration for labourers as workers because the intention of the Church in instituting this feast is for the workers and people in general to see work in the context of relationship, more specifically around the basic unit of society. This is to show also that the Church recognizes the basic rights of labourers in the context of exploitation and manipulation.

St. Joseph the Worker is the patron saint for labourers precisely because in that they are affirmed in their dignity as working persons, they are also reminded to be faithful in their responsibilities not only to society in general but above all to their respective families and especially to God that they worship and believe.

But what kind of a worker or a carpenter was he? The Bible did not say anything. But let us look at Jesus, we can see how good or bad he was. Looking at Jesus, whom St. Joseph moulded too and we catch a glimpse of who he was. The people in today’s gospel say something about Jesus whom St. Joseph formed when still a child: “Where did this man get such wisdom and mighty deeds?” (Matt 13:54-58).

-Fr. Pius Lakra

मनन-चिंतन-3

संत योहन का सुसमाचार 20:30-31 में वचन कहता है, ‘‘ईसा ने अपने शिष्यों के सामने और बहुत से चमत्कार दिखाये, जिनका विवरण इस पुस्तक में नहीं दिया गया हैं। इनका ही विवरण दिया गया है, जिससे तुम विश्वास करो कि ईसा ही मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं और विश्वास करने से उनके नाम द्वारा जीवन प्राप्त करो।’’ सुमाचारों में ईसा ने जिन महत्वपूर्ण विषयों पर जोर दिया है, उन महत्वपूर्ण विषयों में से एक है ‘विश्वास’। विश्वास के विषय में प्रभु ने कई शिक्षाएँ दी है, ‘‘यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो और तुम इस पहाड़ से यह कहो, ‘यहाँ से वहाँ तक हट जा, तो यह हट जायेगा’ (मत्ती 17:20)’’; ‘‘यदि तुम विश्वास करोगी, तो ईश्वर की महिमा देखोगी (योहन 11:40)’’; इसके साथ कई ऐसे विवरण है जो बताते हैं कि जब येसु ने चमत्कार किया तो बहुतो ने उन पर विश्वास किया जैसे योहन 8:30, योहन 10:42 आदि। विभिन्न चमत्कार और उनकी शिक्षाएँ विश्वास की ओर अग्रसर करती हैं। किस पर विश्वास? केवल चमत्कारों पर ही नहीं परन्तु उससे भी अधिक येसु पर विश्वास। क्योंकि येसु पर विश्वास करने से जीवन प्राप्त है, मुक्ति प्राप्त है। ‘‘जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे। (योहन 3:16)’’; ‘‘यदि आप लोग मुख से स्वीकार करते हैं कि ईसा प्रभु हैं और हृदय से विश्वास करते हैं कि ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया, तो आप को मुक्ति प्राप्त होगी।’’ (रोमियों 10:9); जब कारापाल ने पौलुस तथा सीलस से पूछा “सज्जनो, मुक्ति प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?” तब उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘आप प्रभु ईसा में विश्वास कीजिए, तो आप को और आपके परिवार को मुक्ति प्राप्त होगी।’’ (प्रेरित चरित 16:30-31) आज का पाठ हमें यही निमंत्रण देता है कि हम उस में विश्वास करें और हमें क्या विश्वास करना है? यही की प्रभु येसु ही जीवन्त ईश्वर है। वो इम्मानुएल है हमारे साथ है। वो आज भी जीवित है जैसे वे आदि से थे और अनन्तकाल तक रहेंगे और वे ही परम पिता द्वारा भेजे गए ईश्वर के पुत्र हैं। अतः यह विश्वास करना हम सभी के लिए मुक्ति का रास्ता है।

प्रभु येसु पुनरूत्थान के बाद चालीस दिनों तक अपने शिष्यों को दिखाई दिये उनका प्रमुख उद्देश्य प्रेरितों में विश्वास को बढ़ाना था जिससे वे पेंतेकोस्त के दिन पवित्र आत्मा को ग्रहण करने के लिए तैयार हो सकें - । ईसा को मालूम था कि उनके क्रूस पर मर जाने पर सब बिखर जायेंगे और उनका विश्वास कमजोर हो जायेगा। ‘‘क्योंकि लिखा है - मैं चरवाहे को मारूँगा और झुण्ड की भेड़ें तितर-बितर हो जायेंगी’’ (मत्ती 26:31) अतः येसु चालीस दिनों तक उनके सामने प्रकट होते रहे। आज का सुसमाचार उन्हीं प्रकटीकरणों में से एक है जहाँ पर वे सिमोन पेत्रुस, थोमस, नथनाएल और जे़बेदी के पुत्रों और दो अन्य शिष्यों को दर्शन देते हैं।

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि किस प्रकार शिष्यगण प्रभु येसु के चले जाने के बाद पुनः अपने पुराने व्यवसाय में लौट जाते हैं जहाँ से प्रभु येसु ने उन्हें बुलाया था, उन्हें एक नया कार्य सौपनें के लिए, मछलियों को पकड़ने के लिए नहीं परन्तु मनुष्यों को पकड़ने के लिए। ‘‘मेरे पीछे चले आओ। मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुए बनाऊँगा’’ (मत्ती 4:19)। प्रभु येसु के मिशन कार्य को जारी रखने के लिए उन्होंने शिष्यों को चुना था। प्रभु येसु को ज्ञात था कि यह कार्य तभी आगे बढ़ सकता है जब वे पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होंगे और पवित्र आत्मा को ग्रहण करने के लिए यह आवश्यक है कि वे विश्वास करें कि प्रभु मृतकों में से जी उठे हैं और वही जीवन्त ईश्वर है।

प्रभु येसु सिमोन पेत्रुस से तीन बार यह प्रश्न करते हैं कि ‘‘क्या तुम मुझे प्यार करते हो?’’ इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला, कि प्रभु येसु पेत्रुस पर अपनी कलीसिया स्थापित करना चाहते थे। ‘‘मैं तुम से कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात् चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा’’ (मत्ती 16:18) दूसरा, वह सभी शिष्यों में प्रमुख था उसमें नेतृत्व की कला थी, इसलिए जब उसने कहा ‘’मैं मछली मारने जा रहा हूँ’’ तो बाकी सब भी उसके पीछे चल पड़ते हैं। अतः सभी शिष्यों में से पेत्रुस का विश्वास बढ़ना सबसे महत्वपूर्ण था। येसु चाहते थे कि जो वचन स्वर्गिक पिता ने पेत्रुस द्वारा प्रकट की थी वह पेत्रुस के विश्वास के जीवन में परिपूर्णता तक पहुँच जाये - ’’आप मसीह हैं, आप जीवंत ईश्वर के पुत्र है।’’ अतः येसु तीन बार प्रश्न करते हुए पेत्रुस का विश्वास और येसु के प्रति प्रेम को दृढ़ करते हैं।

जब पेत्रुस विश्वास और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो जाते हैं तो उनके जीवन का उद्देश्य, उनके जीने का कारण, उनके जीने का आधार जीवंत येसु बन जाते हैं, उनके लिए दृश्यमान मनुष्य से ज्यादा अदृश्यमान ईश्वर का होना कहीं ज्यादा स्पष्ट था, कहीं ज्यादा सत्य था, कहीं ज्यादा यथार्थ था।

इसलिए जब प्रधानयाजक पेत्रुस और अन्य प्रेरितों को महासभा के सामने कड़ा आदेश देते हैं कि येसु का नाम लेकर शिक्षा मत दिया करो तब पेत्रुस और अन्य प्रेरित यह उत्तर देते है, ‘‘मनुष्य की अपेक्षा ईश्वर की आज्ञा का पालन करना कहीं अधिक उचित है।’’

पुनरूत्थान और उसके बाद की घटनाएँ हम सब के लिए एक आह्वान, निमंत्रण है कि हम जीवित येसु में विश्वास करें कि वे जीवित ईश्वर है और अपने विश्वास को पूर्णता तक ले जायें जहाँ पर प्रभु येसु की उपस्थिति मनुष्यों की उपस्थिति से कई ज्यादा यथार्थ, ज्वलंत और दृष्यमान हो जाये जिससे हम जो भी कार्य करे प्रभु येसु के वचन और उसकी आज्ञा के अनुसार करें। ईश्वर हम सबके विश्वास को बढ़ाए और हमें अपना मार्ग दिखाए।

-फादर डेन्नीस तिग्गा