
पौलुस और उसके साथी नाव से चल कर पाफोस से पांफिलिया के पेरजे पहुँचे। वहाँ योहन ने उन्हें छोड़ दिया और वह येरुसालेम लौटा। पौलुस और बरनाबस पेरजे से आगे बढ़ कर पिसिदिया के अंताखिया पहुँचे। वे विश्राम के दिन सभागृह में जा कर बैठ गये। संहिता तथा नबियों का पाठ समाप्त हो जाने पर, सभागृह के अधिकारियों ने उन्हें यह कहला भेजा, “भाइयो! यदि आप प्रवचन के रूप में जनता से कुछ कहना चाहें, तो कहिये।” इस पर पौलुस खड़ा हो गया और हाथ से उन्हें चुप करने का संकेत कर बोला, "इस्राएली भाइयो और ईश्वर-भक्त सज्जनो! सुनिए। इस्राएली प्रजा के ईश्वर ने हमारे पूर्वजों को चुना, उन्हें मिस्र देश में प्रवास के समय महान् बनाया और वह अपने भुजबल से उन्हें वहाँ से निकाल लाया। उसने चालीस बरस तक मरुभूमि में उनकी देख-भाल की। तब उसने कनान देश में सात राष्ट्रों को नष्ट किया और उनकी भूमि हमारे पूर्वजों के अधिकार में दे दी। लगभग साढ़े चार सौ वर्ष बाद वह उनके लिए न्यायकर्ताओं को नियुक्त करने लगा और नबी समूएल के समय तक ऐसा करता रहा। तब उन्होंने अपने लिए एक राजा की माँग की और ईश्वर ने उन्हें बेनजामीन वंशी कीश के पुत्र साऊल को प्रदान किया जो चालीस वर्ष तक राज्य करता रहा। इसके बाद ईश्वर ने दाऊद को उनका राजा बनाया और उनके विषय में यह साक्ष्य दिया मुझे अपने मन के अनुकूल एक मनुष्य, येस्से का पुत्र दाऊद मिल गया है। वह मेरी सभी इच्छाएँ पूरी करेगा। ईश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उन्हीं दाऊद के वंश में इस्राएल के लिए एक मुक्तिदाता अर्थात् येसु को उत्पन्न किया है। उनके आगमन से पहले अग्रदूत योहन ने इस्राएल की सारी प्रजा को पश्चात्ताप के बपतिस्मा का उपदेश दिया था। अपना जीवन-कार्य पूरा करते समय योहन ने कहा, 'तुम लोग मुझे जो समझते हो, मैं वह नहीं हूँ। किन्तु देखो - मेरे बाद वह आने वाले हैं, जिनके चरणों के जूते खोलने योग्य भी मैं नहीं हूँ।”
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : हे प्रभु! मैं सदा ही तेरी कृपा का गीत गाता रहूँगा। (अथवा : अल्लेलूया!)
1. हे प्रभु! मैं सदा ही तेरी कृपा का गीत गाता रहूँगा। मैं पीढ़ी-दर-पीढ़ी तेरी सत्यप्रतिज्ञता घोषित करता रहूँगा। तूने कहा - मेरी कृपा सदा ही बनी रहेगी। मेरी सत्यप्रतिज्ञता आकाश की तरह चिरस्थायी है।
2. मैंने अपने सेवक दाऊद को चुन कर अपने पवित्र तेल से उसका अभिषेक किया। मेरा हाथ उसे सँभालता रहेगा और मेरा बाहुबल उसे शक्ति प्रदान करेगा।
3. मेरी सत्यप्रतिज्ञता और मेरी कृपा उसका साथ देती रहेगी। मेरे नाम के कारण उसकी शक्ति बढ़ती जायेगी। वह मुझ से कहेगा, “तू ही मेरा पिता, मेरा ईश्वर और उद्धारक है।”
अल्लेलूया! हे येसु मसीह! आप विश्वासनीय साक्षी और मृतकों में से पहलौठे हैं। आपने हमें प्यार किया और अपने रक्त से हमें पाप से मुक्त किया है। अल्लेलूया!
शिष्यों के पैर धोने के बाद येसु ने उन से यह कहा, "मैं तुम से कहे देता हूँ- सेवक अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता और न भेजा हुआ उस से, जिसने उसे भेजा है। यदि तुम ये बातें समझ कर इनके अनुसार आचरण करोगे, तो धन्य होगे। "यह मैं तुम सबों के विषय में नहीं कह रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि मैंने किन-किन लोगों को चुना है; परन्तु यह इसलिए हुआ कि धर्मग्रन्थ का यह कथन पूरा हो जायेः जो मेरी रोटी खाता है, उसने मुझे लंगी मारी है। अब मैं तुम्हें पहले ही यह बताता हूँ, जिससे ऐसा हो जाने पर तुम विश्वास करो कि मैं वही हूँ। मैं तुम से कहे देता हूँ जो मेरे भेज़े हुए का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है, वह उसका स्वागत करता है, जिसने मुझे भेजा है।”
प्रभु का सुसमाचार।
येसु अपने शिष्यों के पैर धोने के बाद उन्हें एक गहन शिक्षा देते हैं। वे नम्रता और सेवा के महत्व पर जोर देते हैं, यह प्रदर्शित करते हुए कि सच्ची महानता दूसरों की सेवा करने से आती है। येसु इस बात की पुष्टि करके शुरू करते हैं कि एक सेवक अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता, न ही भेजा गया व्यक्ति उससे बड़ा होता है जिसने उसे भेजा है। यह कथन शिष्यों की महानता की सांस्कृतिक समझ को चुनौती देता है, जो अक्सर शक्ति और अधिकार पर केंद्रित होती है। इसके बजाय, येसु ने महानता को निस्वार्थ सेवा और विनम्रता के रूप में फिर से परिभाषित किया। इसके अलावा, येसु ने घोषणा की कि जो लोग उसके दूतों को स्वीकार करते हैं, वे उसे स्वीकार करते हैं, और जो लोग उसे स्वीकार करते हैं, वे उसे प्राप्त करते हैं जिसने उसे भेजा है। यह येसु, उसके शिष्यों और पिता के परस्पर संबंध को उजागर करता है। येसु को स्वीकार करना स्वयं परमेश्वर को स्वीकार करना है, और विस्तार से, जिन्हें येसु भेजता है उन्हें स्वीकार करना उसे स्वीकार करना है। इसके अलावा, हमें मसीह के राजदूत होने के गहन विशेषाधिकार और जिम्मेदारी की याद दिलाई जाती है। जब हम दूसरों के साथ येसु का संदेश साझा करते हैं, तो हम उनकी उपस्थिति को अपने साथ ले जाते हैं, और हमारे कार्य उन्हें प्रतिबिंबित करते हैं। इसलिए, आइए हम विनम्र सेवा और वफादार गवाही के लिए अपने आह्वान को स्वीकार करें, यह जानते हुए कि ऐसा करने से, हम उस व्यक्ति का सम्मान और महिमा करते हैं जिसने हमें भेजा है।
✍ - फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)
Jesus addresses His disciples during the Last Supper, imparting crucial lessons about humility, obedience, and the significance of His impending betrayal. This passage prompts contemplation on the nature of discipleship and the radical call to emulate Jesus' humility and servanthood. It challenges believers to move beyond mere intellectual understanding to active obedience, even in the face of betrayal and adversity. Ultimately, it invites us to deepen our relationship with Christ, recognizing Him as the ultimate authority and source of blessing in our lives.
✍ -Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)
आज के पहले पाठ में संत पौलुस और उनके साथी हमारे लिए ईश्वर की चुनी हुई प्रजा के इतिहास को संक्षेप में प्रकट करते हैं जिसमें प्रभु येसु का आगमन उस इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। वे लोग घूम घूम कर प्रभु येसु का प्रचार करते थे, वे एक जगह से दूसरी जगह सुसमाचार को फैलाने में लगे हुए थे क्योंकि उन्हें प्रभु येसू ने भेजा था और प्रभु येसु सदैव उनके साथ थे । इसलिए आज के सुसमाचार में प्रभु येसु कहते हैं, जो मेरे भेजें हुए को ग्रहण करता है वह मुझे ग्रहण करता है और जो मुझे ग्रहण करता है वह पिता ईश्वर को ग्रहण करता है इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रभु के शिष्य प्रभु के साथ एक है और प्रभु पिता के साथ एक है अतः प्रभु येसू के शिष्य भी पिता के साथ एक है।
ये कौन लोग हैं जो प्रभु येसु द्वारा भेजे गए हैं? क्या वे गिने चुने कुछ ही लोग हैं या बहुत सारे लोग ? उन्हें क्यों भेजा गया है? योहन 3:16 में बताता है कि ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने इकलौते पुत्र को भेज दिया। प्रभु येसू के पास भी अपने शिष्यों को संसार में भेजे जाने के लिए वही कारण है । वह प्रत्येक व्यक्ति जो अपने जीवन में ईश्वर के प्रेम को अनुभव करता है उसका यह कर्तव्य है कि उस ईश्वरीय प्रेम को वह दूसरों के साथ बांटें । जो अपने जीवन में प्रभु येसू को स्वीकार करते हैं वे स्वर्गीय पिता के प्रेम को भी स्वीकार करते हैं और बदले में वह प्रेम उन्हें दूसरों के साथ बांटना है ।
✍ - फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
Saint Paul and his companions summarize the history of God’s chosen people for us in the first reading of today, where coming of Jesus is the culmination of that history. They were going around proclaiming Jesus. They were going from one place to another tirelessly, because they were sent by Jesus, and Jesus himself was with them. That’s why, in the gospel today, Jesus says, “whoever receives the one I sent, receives me, and whoever receives me, receives the one who sent me.” Thus the followers of Jesus are not only one with Jesus, but also one with the father.
Who are these people, who are sent by Jesus? Are they chosen few or everyone? And why are they sent? John 3:16 says, God loved the world, so he sent his son, Jesus also has same reason to send us. Everyone who is loved by God, and experiences God’s mercy, is bound to share that love and mercy with others. Jesus died to save the whole world; to express heavily father’s love for the whole world. All those who accept Jesus in their life, they also accept the free gift of God’s unconditional love, they in turn are to share that love with the whole world.
✍ -Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)
यीशु चेलों से कहते हैं, 'जो कोई मेरे भेजे हुए को ग्रहण करता है, वह भेजनेवाले को ग्रहण करता है और जो कोई उनका स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है; । यह मुझे सन्देश वाहकों को स्वीकार करने के बारे में बताता है। 'स्वागत', स्वीकार शब्द एक उदार शब्द है। यह खुली बाहों, गर्मजोशी, देखभाल और आतिथ्य की बात करता है। आपका देखभाल किया जाता है, स्वीकार किया जाता है और स्वागत किया जाता है। दूसरों का स्वागत करने में सक्षम होना, यह एक सुंदर उपहार है, चाहे वह घर में हो, या बातचीत में, या भोजन के लिए हो। यह स्थान या अवसर साझा करने के लिए हो सकता है। दूसरे का स्वागत करने में, हम पिता परमेश्वर का स्वागत करने के कार्य में भी भाग लेते हैं। हम प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर की उपस्थिति का हमारे प्रत्येक हृदय में गर्मजोशी से स्वागत हो।
✍ - फादर पायस लकड़ा
In today’s gospel, Jesus who is the Greatest Teacher reverses the order in giving lectures and teaching. He first washes the feet of His disciples and then teaches them on Christian service. He serves them first and then only afterwards, gives them a lecture on how to serve.
Jesus teaches us to serve others because He himself came into this world to serve and not to be served. Somebody said that He expects us to be humble even as we serve because humility is the trademark of His own service.
Service is, comprehensively speaking, doing the will of God. The supreme test of service is this: ‘For whom am I doing this?’
We need to ask whether our serving is Self-focused, or self-service, concerned with impressive gains or Christ-focused which doesn’t distinguish between small and large.
At the end let us reflect these coming from Evangelii Nuntiandi of Pope Paul VI: “Modern man no longer listens to teachers but to witnesses. If he listens to teachers, it is because they are first witnesses.”
✍ -Fr. Pius Lakra
जब सभागृह के अधिकारी ने पौलुस को जनता से प्रवचन देने का अनुरोध किया तो उन्होंने इस्राएल के मुक्ति के इतिहास को दोहराया। ईश्वर ने इस प्रक्रिया की शुरूआत को इब्राहिम, इसहाक और याकूब को चुनकर आगे बढाया। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने ईश्वर को नहीं चुना था किन्तु ईश्वर ने उन्हें चुना था। फिर ईश्वर ने उन्हें मिस्र देश में फलने-फूलने दिया तथा बाद में वहां की गुलामी से मुक्त करा कर उन्हें एक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। ईश्वर ने सात देशों को नष्ट कर उनके लिये स्थान तैयार किया। उसने उनके लिये न्यायकर्ताओं, नबियों तथा राजा को नियुक्त किया। दाउद जो उनके इतिहास के सबसे गौरवशाली पुरूषों में से है, के वंश से एक मसीह की प्रतिज्ञा की। और अंत में योहन बपतिस्ता ने येसु मसीह के आगमन की घोषणा की।
ये घटनायें सारे इतिहास विशेषकरके मुक्ति के इतिहास पर ईश्वर के प्रभुत्व को बताती है। ईश्वर ने इस्राएल को चुना तथा स्थापित किया। इस कार्य का लक्ष्य तथा पराकाष्ठा प्रभु येसु है। ऐफिसियों के नाम पत्र में संत पौलुस लिखते हैं, ’’उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार निश्चय किया था कि वह समय पूरा हो जाने पर स्वर्ग तथा पृथ्वी में जो कुछ है, वह सब मसीह के अधीन कर एकता में बाँध देगा। उसने अपने संकल्प का यह रहस्य हम पर प्रकट किया है।’’(ऐफेसिया 1:11) जो भी व्यक्ति येसु की सार्वभौमिकता एवं ईश्वत्व को नही मानता वह ईश्वर का नहीं हो सकता है। पुराने विधान का मुख्य उददेश्य भविष्य में आने वाले मसीह की प्रतिज्ञा तथा उन्हें चिन्हित करना था। मसीह नबियों की सभी भविष्यवाणियों का सच तथा अनुग्रह की परिपूर्णता है। ईश्वन ने अपनी चुनी प्रजा से मुक्तिदाता भेजने की प्रतिज्ञा की थी और वह प्रतिज्ञात मुक्तिदाता, दाउद के पुत्र, हमारे प्रभु ईसा मसीह है।
✍फादर रोनाल्ड वाँनWhen Paul was invited by the synagogue president to speak a message of God, he chose to narrate the salvation history of Israel. God began the process by choosing Abraham, Isaac, and Jacob. It was not their choice of God, but God’s choice of them, that is significant. Then, God made them flourished in Egypt and set them free from the slavery, brought them out and established them as a nation. He destroyed seven nations to make a place for them. He provided them judges, prophets and the kings to rule over them. From David, one of the most distinguished personalities, he promised them a Messiah. It was John the Baptist who welcomed Jesus in most humble manner.
It shows God and His sovereignty over all of history, especially the history of salvation. it was God who took initiative in choosing and establishing Israel.
However,the goal and culmination of history is the Jesus Christ. God purposed to sum up all things in heaven and earth in Christ (Eph. 1:11). “All things have been created through Him and for Him. He is before all things, and in Him all things hold together. He is also head of the body, the church; and He is the beginning, the firstborn from the dead, so that He Himself will come to have first place in everything”.
Anyone denies the centrality and supremacy of Jesus Christ is not from God. All of the Old Testament was written to point forward to Jesus Christ. He is thefulfilment of prophecies and fulness of grace.God graciously promised His chosen people to send a Saviour, and that Jesus, the son of David, is that promised Saviour.
✍ -Fr. Ronald Vaughan