
सारी कलीसिया की सहमति से प्रेरितों तथा पुरोहितों ने निश्चय किया कि हम में से कुछ लोगों को चुन कर पौलुस तथा बरनाबस के साथ अंताखिया भेजा जाये। उन्होंने दो व्यक्तियों को चुन लिया, जो भाइयों में प्रमुख थे, अर्थात् यूदस को, जो बरसब्बा कहलाता था, तथा सीलस को, और उनके हाथ यह पत्र भेज दिया। “प्रेरित तथा पुरोहित, आप लोगों के भाई, अंताखिया, सीरिया तथा सिलीसिया के गैरयहूदी भाइयों को नमस्कार करते हैं। हमने सुना है कि हमारे यहाँ के कुछ लोगों ने, जिन्हें हमने कोई अधिकार नहीं दिया था, अपनी बातों से आप लोगों में घबराहट उत्पन्न की और आपके मन को उलझन में डाल दिया है। इसलिए हमने सर्वसम्मति से निर्णय किया कि हम प्रतिनिधियों को चुन लें और उन को अपने प्रिय भाई बरनाबस और पौलुस के साथ, जिन्होंने हमारे प्रभु येसु मसीह के नाम पर अपना जीवन अर्पित किया है, आप लोगों के पास भेजें। हमने यूदस तथा सीलस को भेजा है; वे भी आप लोगों को वह सब मौखिक रूप से बता देंगे। पवित्र आत्मा को और हमें यह उचित जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों के सिवा आप लोगों पर कोई और भार न डाला जाये - आप लोग देवमूर्तियों पर चढ़ाये हुए मांस से, रक्त से, गला घोंटे हुए पशुओं के मांस से और व्यभिचार से परहेज करें। इन से अपने को बचाये रखने में आप लोगों का कल्याण है। अलविदा।” वे विदा हो कर अंताखिया चल दिये और वहाँ पहुँच कर उन्होंने भाइयों को एकत्र कर वह पत्र दिया। पत्र की सान्त्वनापूर्ण बातें पढ़ने के बाद लोगों को बड़ा आनन्द हुआ।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : हे प्रभु! मैं राष्ट्रों के बीच तुझे धन्य कहूँगा। (अथवा : अल्लेलूया!)
1. हे ईश्वर! मेरा हृदय प्रस्तुत है। प्रस्तुत है मेरा हृदय। मैं गाते हुए तेरी स्तुति करूँगा। सारंगी और सितार बोल उठें, मैं प्रभात से पहले ही प्रभु की स्तुति करूँगा।
2. हे प्रभु! मैं राष्ट्रों के बीच तुझे धन्य कहूँगा, मैं देश-विदेश में तेरा स्तुतिगान करूँगा। आकाश के सदृश ऊँचा है तेरा प्रेम और तारा-मंडल के सदृश तेरी सत्यप्रतिज्ञता। हे ईश्वर! तू स्वर्ग से भी महान् है तेरी महिमा समस्त पृथ्वी में व्याप्त है।
अल्लेलूया! प्रभु कहते हैं, "मैंने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि मैंने अपने पिता से जो कुछ सुना है, वह सब तुम्हें बता दिया है।” अल्लेलूया।
येसु ने अपने शिष्यों से यह कहा, "यह मेरी आज्ञा है मैंने जैसे तुम लोगों को प्यार किया है, वैसे तुम भी एक दूसरे को प्यार करो। अपने मित्रों के लिए अपने प्राण अर्पित करने से बड़ा किसी का प्रेम नहीं। यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो। अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसको स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि मैंने अपने पिता से जो कुछ सुना है, वह सब तुम्हें बता दिया है। तुमने मुझे नहीं चुना है, बल्कि मैंने तुम्हें चुना और नियुक्त किया है, जिससे तुम जा कर फल उत्पन्न करो और तुम्हारा फल बना रहे। तब तुम मेरा नाम ले कर पिता से जो कुछ माँगोगे, वह तुम्हें वही प्रदान करेगा। मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ- एक दूसरे को प्यार करो।”
प्रभु का सुसमाचार।
आज प्रभु येसु न केवल हमें नई आज्ञा देते हैं बल्कि उस आज्ञा को समझाते भी हैं। पुराने व्यवस्थान में पिता ईश्वर ने इस्रायलियों को दस आज्ञायें दी थी। बाद में लोगों को समझाने के लिए उनकी व्याख्या की गई, और इस तरह वे दस आज्ञायें सैकड़ों आज्ञायें बन गईं। लोगों के लिए जिनका पालन करना आसान होना चाहिए था, उसे ही कठिन बना दिया गया था। इसलिए पूछे जाने पर प्रभु येसु उन्हें सिर्फ दो आज्ञाओं में समाहित कर देते हैं (देखिए मारकुस 12:29-31)। आज्ञाओं के उसी सार को आज प्रभु येसु हमें एक नई आज्ञा के रूप में प्रदान करते हैं। इस आज्ञा के अनुसार इसका चरम है कि हमें दूसरों को इस हद प्यार करना है कि जरूरत पड़ने पर अपनी जान भी गँवानी पड़े तो पीछे नहीं हटना है। प्रभु येसु ने स्वयं हमारे सामने खुद अपने प्राण न्योछावर करके एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। प्रभु येसु के लिए ऐसा करना आसान नहीं था। ऐसे कई सन्त हुए हैं जिन्होंने न केवल प्रभु की इस आज्ञा का अक्षरशः पालन किया बल्कि दूसरों के लिए अपने प्राण भी न्योछावर किए। सन्त कोल्बे हमारे ही युग के सन्त हैं, फादर दमीयन एक और उदाहरण हैं जिन्होंने कुष्ठ रोगियों के लिए अपने प्राण गँवाए। ऐसे संतों की एक लंबी लिस्ट बन जाएगी। मैं अपने जीवन में प्रभु की इस आज्ञा का किस हद तक पालन करता/करती हूँ?
✍ - फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
Today Jesus not only gives us a new commandment but also explains that commandment for us. God gave ten Commandments to the Israelites in the old testament. Later on the explanation was given so that common people could understand them And thus the 10 Commandments became hundreds of commandments. Things that should have been made easy for the people to follow , they were made difficult. When Jesus was asked to summarize the commandments he summarized them just into two. In today’s gospel even that summary is again summarized into one commandment. The culmination of this new Commandment is that we have to love others to the extent that if we need to sacrifice our life for others then we should do so. Jesus himself has set an example before us by laying his life for us. It was not easy for Jesus to do so. There have been many saints who not only obeyed this commandment of Jesus but also happily sacrificed their life for others. St. Kolbe is the modern saint as an example for us, father Damian is another example who sacrificed his life while serving the leprosy patients and he himself got the leprosy. The list can go on. How far am I ready to go to obey this commandment of Jesus in my life?
✍ -Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)
यीशु चाहता है कि उसका आनंद मुझ में बनी रहे । मेरी भी यही इच्छा है। गहरा, स्थायी आनंद, जो कठिनाई और दुख के समय में भी रहता है। यीशु ने मेरे साथ अपने शब्दों और शिक्षाओं को साझा किया ताकि मैं उन पर ध्यान दे सकूं, उन्हें दिल में रखूँ और उन्हें और अधिक गहराई से समझ सकूं, ताकि उनका आनंद मुझ में बना रहे। आज मैं ईश्वर के आनंद के लिए प्रार्थना करता हूं कि वह मुझमें वास करे और मुझ में बना रहे। मुझे पता है कि कभी-कभी आनंदित होना कठिन हो सकता है, लेकिन मुझे परमेश्वर के प्रेम और भविष्य पर भरोसा है। दिव्य आनन्द, मेरे हृदय में बस जा । मेरी हर्षित उपस्थिति उन लोगों के लिए एक मलहम हो, जिनसे मेरी मुलाकात होती है और मुझमें आपकी उपस्थिति का साक्षी हो।
✍ - फादर पायस लकड़ा
All of us know that the old commandment was to “love your neighbour as you love yourself,” (Lev. 19:8) and Jesus quoted it (Matthew 19:19; 22:39) accurately.
In today’s gospel reading, we hear Jesus commanding us to love one another. There are many reasons why Jesus commands us to love because if we do not love it is like committing a murder, nothing less.
But when He speaks from Himself He says “This is my commandment, that you love one another as I have loved you,” (v. 12). There is a great difference between the way our neighbour might love us and the way that Jesus loves us. Unless we love one another in the Spirit of Jesus, our love is very likely to be narcissistic or a disguised form of control, or a projection of some private struggle. ‘Love’ covers a multitude, in every sense.
And the gospel today shows us that our love for God is a love of friendship. He says: “You are my friends, if you do what I command you.” To be a friend of God is a great gift. Jesus’ discourse on friendship and brotherly love echoes the words of Proverbs: “A friend loves at all times; and a brother is born for adversity,” (Prov. 17:17). An old Jewish proverb says: “A friend is one who warns you.”
✍ -Fr. Pius Lakra
आज हम सिएना के सेंट बर्नाडाइन (1380-1444) का पर्व का जश्न मनाते हैं, जिन्होंने सुसमाचार में यीशु के निमंत्रण को स्वीकारा और दूसरों से प्यार किया जैसे यीशु ने प्यार किया और इस प्रकार येसु की शीख को क्रियानवित किया। 20 साल की उम्र में, बर्नाडाइन ने अपने गृहनगर सिएना, इटली में प्लेग से पीड़ित रोगियों की देखभाल करते हुए चार महीने बिताए। 22 साल की उम्र में, उन्होंने फ्रांसिस्कन धर्म संस्था में प्रवेश किया और उनके आदेश का पालन करते हुए, कई वर्षों तक एकांत और प्रार्थना में रहे। फिर वह लोगों के बीच सुसमाचार का प्रचार करने के लिए, पैदल यात्रा करते हुए सड़क पर गया। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है जिसने भारी भीड़ को आकर्षित किया। उन्हें प्रतीक चिन्ह IHS (ग्रीक में 'यीशु' के पहले तीन अक्षर) के निर्माता के रूप में श्रेय दिया जाता है, जो एक धधकते सूरज के ऊपर रखा जाता है , जो बाद में चर्चों, घरों और सार्वजनिक भवनों में दिखाई दिया। संत बर्नडाइन की तरह, हम मसीह के प्रेम से प्रेरित फल उत्पन्न करें।
✍फ़ादर डेनिस तिग्गाIn this world we meet lots of people and become familiarize with many. With the people we like we start the relationship of friendship with them. In this world we get many friends but the true friend is one who helps us in bad times.We worship, adore, serve God and we see Him as an Almighty and All Holy God. But can the Holy, Almighty God become our friend? Today Lord Jesus rising above the relationship of Owner and servant extends the hand of friendship towards us.
Jesus kept the relationship of friendship by sacrificing his life because of his steadfast love towards us. How can we become the friend of God? Jesus says, “You are my friends if you do what I command you.” Jesus doesn’t call us servants but he wants us to be his friends. When the relationship of friendship is deep then the two friends know each other very well and even share the personal life to each other. The friends who love each other are ready to do anything for each other that is why people give the example of friendship.
Today we have an opportunity to be called Jesus’ friends who keeps friendship with us.Obeying his commandments let’s remain to be called his friends.
✍ -Fr. Dennis Tigga