
कुछ लोग यहूदिया से अंताखिया आये और भाइयों को यह शिक्षा देने लगे कि यदि मूसा से चली आयी हुई प्रथा के अनुसार आप लोगों का खतना नहीं होगा, तो आप को मुक्ति नहीं मिलेगी। इस विषय पर पौलुस तथा बरनाबस और उन लोगों के बीच तीव्र मतभेद और वाद-विवाद छिड़ गया, और यह निश्चय किया गया कि पौलुस तथा बरनाबस अंताखिया के कुछ लोगों के साथ येरुसालेम जायेंगे और इस समस्या के विषय में प्रेरितों तथा पुरोहितों से परामर्श करेंगे। तब सारी कलीसिया की सहमति से प्रेरितों तथा पुरोहितों ने निश्चय किया कि हम में से कुछ लोगों को चुन कर पौलुस तथा बरनाबस के साथ अंताखिया भेजा जाये। उन्होंने दो व्यक्तियों को चुन लिया, जो भाइयों में प्रमुख थे, अर्थात् यूदस को, जो बरसब्बा कहलाता था, तथा सीलस को, और उनके हाथ यह पत्र भेज दिया – “प्रेरित तथा पुरोहित, आप लोगों के भाई, अंताखिया, सिरिया तथा सिलीसिया के गैर-यहूदी भाइयों को नमस्कार करते हैं। हमने सुना है कि हमारे यहाँ के कुछ लोगों ने, जिन्हें हमने कोई अधिकार नहीं दिया था, अपनी बातों से आप को घबरा दिया और उलझन में डाला है। इसलिए हमने सर्वसम्मति से निर्णय किया कि हम प्रतिनिधियों को चुन लें और अपने प्रिय भाइयों बरनाबस और पौलुस के साथ, जिन्होंने हमारे प्रभु येसु मसीह के नाम पर अपना जीवन अर्पित किया है, आप लोगों के पास भेजें। हमने यूदस तथा सीलस को भेजा है; वे भी आप लोगों को यह सब मौखिक रूप से बता देंगे। पवित्र आत्मा को और हमें यह उचित जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों के सिवा आप लोगों पर कोई और भार न लादा जाये - आप लोग देव-मूर्तियों को चढ़ाये हुए मांस से, रक्त से, गला घोंटे हुए पशुओं के मास से और व्यभिचार से परहेज करें। इन से अपने को बचाये रखने में आप लोगों का कल्याण है। अलविदा।”
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : हे ईश्वर! राष्ट्र तेरी स्तुति करें, सभी राष्ट्र तुझे धन्य कहें। (अथवा : अल्लेलूया।)
1. हे ईश्वर! हम पर दया कर और हमें आशिष दे, हम पर प्रसन्न हो कर दयादृष्टि कर, जिससे पृथ्वी के निवासी तेरा मार्ग समझ लें, सभी राष्ट्र तेरा मुक्ति-विधान जान जायें।
2. सभी राष्ट्र उल्लसित हो कर आनन्द मनायें, क्योंकि तू न्यायपूर्वक संसार का शासन करता है। तू निष्पक्ष हो कर पृथ्वी के देशों का शासन करता और सभी राष्ट्रों का संचालन करता है।
3. हे ईश्वर! राष्ट्र तेरी स्तुति करें, सभी राष्ट्र तेरी महिमा गायें। ईश्वर हमें आशीर्वाद प्रदान करे और समस्त पृथ्वी उस पर श्रद्धा रखे।
मैं आत्मा से आविष्ट हो गया और स्वर्गदूत ने मुझे एक विशाल तथा ऊँचे पर्वत पर ले जा कर पवित्र नगर येरुसालेम दिखाया। वह ईश्वर के यहाँ से आकाश में उतर रहा था। वह ईश्वर की महिमा से विभूषित था और बहुमूल्य रत्न तथा उज्जवल सूर्यकान्त-मणि की तरह चमकता था। उसके चारों ओर एक बड़ी और ऊँची दीवार थी, जिस में बारह फाटक थे और हर एक फाटक के सामने एक स्वर्गदूत खड़ा था। फाटकों पर इस्राएल के बारह वंशों के नाम अंकित थे। पूर्व की ओर तीन, उत्तर की ओर तीन, पश्चिम की ओर तीन और दक्षिण की ओर तीन फाटक थे। नगर की दीवार पर नींव के बारह पत्थरों पर खड़ी थी और उन पर मेमने के बारह प्रेरितों के नाम अंकित थे। मैंने उस में कोई मंदिर नहीं देखा, क्योंकि सर्वशक्तिमान् प्रभु-ईश्वर उसका मंदिर है, और मेमना भी। नगर को सूर्य अथवा चन्द्रमा के प्रकाश की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ईश्वर की महिमा उसकी ज्योति और मेमना उसका प्रदीप है।
प्रभु की वाणी।
अल्लेलूया, अल्लेलूया! येसु ने कहा, "यदि कोई मुझे प्यार करेगा, तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आ कर उस में निवास करेंगे।” अल्लेलूया।
येसु ने अपने शिष्यों से कहा, "यदि कोई मुझे प्यार करेगा, तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आ कर उस में निवास करेंगे। जो मुझे प्यार नहीं करता, वह मेरी शिक्षा पर नहीं चलता। जो शिक्षा तुम सुनते हो, वह मेरी नहीं, बल्कि उस पिता की है, जिसने मुझे भेजा है। तुम्हारे साथ रहते समय मैंने तुम लोगों को इतना ही बताया है। परन्तु वह सहायक, वह पवित्र आत्मा, जिसे पिता मेरे नाम पर भेजेगा, तुम्हें यह सब समझा देगा। मैंने तुम्हें जो कुछ बताया, वह उसका स्मरण दिलायेगा। "मैं तुम्हारे लिए शांति छोड़ जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो। तुमने सुना है कि मैंने तुम से कहा - मैं जा रहा हूँ और फिर तुम्हारे पास आऊँगा। यद तुम मुझे प्यार करते, तो आनन्दित होते कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ, क्योंकि पिता मुझ से महान् है। इस प्रकार मैंने पहले ही तुम लोगों को यह बतला दिया, जिससे वैसा हो जाने पर तुम विश्वास करो।”
प्रभु का सुसमाचार।
येसु अपने शिष्यों को सतर्क रहने और उन संकेतों के प्रति सचेत रहने की चेतावनी देते है जो उनकी वापसी से पहले होंगे। येसु अपने अनुयायियों से सतर्क और समझदार बने रहने का आग्रह करते हैं, इस बात पर जोर देते हुए कि ये घटनाएँ ईश्वर की योजना की पूर्ति का संकेत देंगी। इस अंश पर विचार करते हुए, हमें आध्यात्मिक सतर्कता और तैयारी के महत्व की याद दिलाई जाती है। धोखे के बारे में येसु की चेतावनियाँ विचलित करने वाली और झूठी शिक्षाओं से भरी दुनिया में समझदारी की ज़रूरत को उजागर करती हैं। यह अंश हमें अपने जीवन को ईश्वर की इच्छा के साथ संरेखित करते हुए, तत्परता और उद्देश्य की भावना के साथ जीने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह हमें समय के संकेतों के प्रति चौकस रहने के लिए कहता है, डर से नहीं, बल्कि मसीह की वापसी के लिए आशा और तत्परता से। यह सतर्कता निष्क्रिय नहीं है, बल्कि इसमें हमारे विश्वास में सक्रिय भागीदारी, पवित्रशास्त्र में निहित रहना और हमारी आध्यात्मिक स्थिति के प्रति सचेत रहना शामिल है। अंततः, येसु का संदेश आशा का संदेश है, जो हमें आश्वस्त करता है।
✍ - फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)
Jesus warns his disciples to be vigilant and alert to the signs that will precede his return. Jesus urges his followers to remain vigilant and discerning, emphasizing that these events will signal the fulfillment of God’s plan. In reflecting on this passage, we are reminded of the importance of spiritual vigilance and preparation. Jesus’ warnings about deception highlight the need for discernment in a world filled with distractions and false teachings. This passage encourages us to live our lives with a sense of readiness and purpose, aligning our lives with God’s will. It calls us to be attentive to the signs of the times, not out of fear, but out of hope and readiness for Christ’s return. This vigilance is not passive, but involves active participation in our faith, staying rooted in Scripture, and being mindful of our spiritual condition. Ultimately, Jesus’ message is a message of hope, which reassures us.
✍ -Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)
मुझे आश्चर्य होता है कभी कभी कि यीशु के समय की महिलाओं की सोच क्या होगी । क्योंकि प्रेरित, परिषद के प्रतिनिधि और चर्च के कमिटी के सभी पुरुष थे। पुरुषों को आधिकारिक तौर पर बारह प्रेरितों के रूप में चुना गया और उन्हें सुसमाचार के राजदूत और प्रेरित के रूप में भेजा गया। और फिर भी, हम जानते हैं कि यीशु के जीवन में महिलाएं अहम् भूमिका निभयीं । उसकी माँ, मैरी; मरियम मगदलीनी, जो कब्र के पास जी उठे हुए मसीह का दर्शन की और प्रेरितों को बताई ; समारिया की ओ स्त्री जो कुएं के पास थी और वह स्त्री जिसे पथराव होने से बचाया गया था। स्त्रियाँ भी यीशु को जानती और प्रेम करती थीं और सुसमाचार की वाहक थीं। वे हमें याद दिलाते हैं कि महिलाओं और पुरुषों को दुनिया में यीशु के प्रेम के जीवित गवाह, आशा के राजदूत और दया के प्रेरित और प्रेरक होने के लिए बुलाया गया है। चाहे हमें धार्मिक, विवाहित, अविवाहित, या किसी भी स्थिति में हो, हम सभी को यरूशलेम की परिषद के उस 'पत्र' द्वारा सुसमाचार की घोषणा करने और हमारे पुनर्जीवित मसीह के आनंद में जीने के लिए अनिवार्य किया गया है।
✍ - फादर पायस लकड़ा
Today we are already on the Sixth Sunday of Easter. This Sunday comes just before the Lord’s Ascension. It marks Jesus’ last presence with His disciples. The gospel reading contains Jesus’ tender farewell to His disciples. This gospel starts with a very beautiful statement: “If anyone loves me, he will keep my word.”
Jesus will go away but His departure will not mark the end of His ministry and of His mission to bring people back to God. In fact His death and resurrection will be the culmination of His work. But He will also mark a different kind of His presence among us. He will no longer walk with His disciples as the Rabbi of Nazareth. He will be the glorious but invisible Lord.
He will not leave them orphans. He will send the Holy Spirit as their Paraclete, that is, their consoler, advocate, inspirer and one who will teach them everything about Jesus. With the help of the Holy Spirit, they will certainly be capable of continuing the Master’s work: to announce the good news of salvation to the whole world.
When Jesus mentions the Holy Spirit, he also mentions peace. What do we mean by peace? St. Augustine has a beautiful definition of peace. According to him, peace means: “Serenity of the mind, simplicity of heart and tranquillity of soul.”
Jesus’ work of peace and love is still in force until today even though two thousand years had passed.
✍ -Fr. Pius Lakra
प्रभु ईश्वर ने मूसा को दस नियम दिये और उनमें से पहला नियम सम्पूर्ण संहिता और हमारे जीवन के लिए सबसे बड़ी आज्ञा है। ‘‘ईसा ने उस से कहा, ‘अपने ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो। यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है’’’ (मत्ती 9:36)। हमारे जीवन में अशांति, तनाव, अधूरापन, असंतुष्टि इत्यादि का कारण यही है कि हम अपने जीवन में ईश्वर की सबसे बड़ी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं। पुनरुत्थान के बाद प्रभु येसु ने पेत्रुस से तीन बार यह प्रश्न किया कि क्या तुम मुझे प्यार करते हो? (योहन 21:15-17)। आज प्रभु येसु हम सब से भी यही प्रश्न करते हैं कि क्या हम उन्हें प्यार करते हैं? अगर हम किसी ख्रीस्तीय से पूछे कि क्या आप येसु को प्यार करता है, तो उसका जवाब यही होगा - हाँ, मै करता हूँ या करती हूँ। परन्तु हमको यह कैसे मालूम हो जायेगा कि कौन प्रभु से सबसे अधिक या सच्चा प्रेम करता है। आज का वचन कहता है, ‘‘यदि कोई मुझे प्यार करेगा, तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा।’’ अगर हम किसी से अत्याधिक प्रेम करते हंत तो वह व्यक्ति हम से जो भी कहता है हम वही करते हैं - चाहे वह सही काम हो या बुरा। ठीक उसी प्रकार प्रभु की शिक्षा पर चलना यह दर्शाता है कि हम उनसे प्रेम करते हैं। प्रेम का प्रकटीकरण हमारे कार्यों द्वारा होता है। आज बहुत सारे लोग ख्रीस्तीय हैं, इसाई हैं, परन्तु क्या सभी ख्रीस्तीय प्रभु से प्रेम करते हैं? यह एक प्रश्न चिन्ह है। जो ख्रीस्तीय सचमुच में ईश्वर से प्रेम करते हैं, वह प्रेम उनके जीवन में, उनके व्यवहारों में प्रकट हो जाता है। क्योंकि येसु की दूसरी आज्ञा है ‘‘अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।’’
हम सब येसु से प्रेम करते हैं - यह सत्य है परन्तु यह भी सत्य है कि हम दूसरी चीज़ो से भी प्रेम करते हैं। इसलिए जरुरत आने पर अपनी सुविधा के अनुसार हम कुछ शिक्षा का पालन करते हैं और कुछ का नही। अर्थात् हमारा प्रेम बटां हुआ है। प्रभु येसु कहते हैं, ‘‘कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा’’ (मत्ती 6:24)। ‘‘जो अपने पिता या अपनी माता को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं।’’(मत्ती 10:37)। हम प्रभु से प्रेम तो करते हैं परन्तु सम्पूर्ण दिल से प्रेम नहीं करते। इसलिए जब कभी हमारे जीवन में कुछ संकट, कठिनाई आती है तब हम विचलित हो जाते हैं। परन्तु प्रभु का वचन कहता है ‘‘यदि तुमने मेरी आज्ञाओं का पालन किया होता, तो तुम्हारी सुख-शांति नदी की तरह उमड़ती रहती और तुम्हारी धार्मिकता समुद्र की लहरों की तरह’’ (इसा0 48:18)।
आज के सुसमाचार के अनुसार प्रभु इस संसार से जाते जाते हमें दो और उपहार दे कर गये। पहला पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा और दूसरा अपनी शांति। पवित्र आत्मा का आगमन हम पेन्तेकोस्त के दिन पाते हैं जहाँ पर माँ मरियम के साथ शिष्यगण प्रार्थना कर रहे थे और पवित्र आत्मा उन पर उतरा (प्रे0 च0 2)। यह इस बात का साक्ष्य है कि प्रभु ईसा ने हमें इस संसार में अकेला नहीं छोड़ा है परंतु हमारे लिए एक सहायक प्रदान किया है जिससे हम इस आधुनिक संसार में भी उसके वचनों पर चल सकें और उनके कार्य को आगे बढ़ा सकें। पवित्र आत्मा की सहायता के बिना पवित्र जीवन बिताना असंभव है। इसके साथ साथ प्रभु येसु अपनी शांति हम सभी के लिए छोड़ कर जाते हैं। यह शांति इस संसार की शांति जैसी नहीं है, परंतु दिव्य शांति है जो किसी और से प्राप्त नहीं हो सकती। इस आधुनिक दुनिया में सब कोई शांति की खोज में है, बहुत लोगों के पास सब कुछ है परंतु शांति नहीं है। और यह शांति सिर्फ प्रभु ईसा से प्राप्त हो सकती है।
आज के वचनों के द्वारा ईसा अपने शिष्यों को उस दिन के लिए तैयार करते हैं जब वे शारीरिक रूप से इस संसार में नहीं रहेंगे। जिनको बाद में होने वाली घटना का ज्ञान न हो तो उनके लिए उस समय येसु का उन से दूर चले जाना जीवन का सबसे बड़ा झटका था और बहुत ही दुविधा भरा समय था। इसलिए प्रभु उन्हें आने वाले समय के लिए तैयार करते हैं।
प्रभु येसु अपने अनुयाइयों को लौकिक या भौतिक वस्तुओं पर आसक्त न रह कर उसके साथ गहराई पूर्ण रिश्ते में जुड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं। अक्सर हम पुरानी चीजों को छोड़कर नयी चीजों को अपनाना नहीं चाहते जिससे हम पुराने जीवन में जीते रहते हैं और अपने वर्तमान को मृत्यु की ओर अग्रसर करते जाते हैं। आईये हम प्रभु ईसा के द्वारा हमारे जीवन में होने वाले पवित्र आत्मा के नये कार्य पर हम दृष्टि लगायें। प्रभु ईश्वर हम सबसे कहते हैं, ’’पिछली बातें भुला दो, पुरानी बातें जाने दो। देखो, मैं एक नया कार्य करने जा रहा हूँ। वह प्रारम्भ हो चुका है। क्या तुम उसे नहीं देखते?’’(इसा0 43:19)। आइए हम अपने जीवन में हमारे लिए ईश्वर की योजनाओं को समझने के लिए पवित्र आत्मा से सहायता माँगें।
✍ -फादर डेन्नीस तिग्गा