प्रभु का स्वर्गारोहण – वर्ष A

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पहला और दूसरा पाठ, भजन एवं जयघोष के साथ वर्ष A, B & C के लिये सामान्य हैं।

📕पहला पाठ - वर्ष A, B, C

प्रभु के स्वर्गारोहण के बाद प्रेरितों से कहा जाता है 'आप लोग आकाश की ओर क्यों देखते रहते हैं?' प्रेरितों को अब समस्त संसार में जा कर पुनर्जीवित मसीह का संदेश सुनाना है। हमें निष्क्रिय रह कर नहीं, बल्कि अपने विश्वास को अपने आचरण में दिखा कर प्रभु के पुनरागमन की राह देखनी चाहिए।

प्रेरित-चरित 1:1-11

"उनके देखते-देखते वह स्वर्ग में आरोहित कर लिये गये।”

हे थेओफिलुस! मैंने अपनी पहली पुस्तक में उन सब बातों का वर्णन किया है, जिन्हें येसु उस दिन तक करते और सिखाते रहे, जिस दिन वह स्वर्ग में आरोहित कर लिये गये। इस से पहले येसु ने अपने प्रेरितों को, जिन्हें उन्होंने स्वयं चुन लिया था, पवित्र आत्मा द्वारा अपना कार्य सौंप दिया। येसु ने अपने दुःखभोग के बाद चालीस दिन तक उन प्रेरितों को बहुत-से प्रमाण दिये कि वह जीवित थे। वह बार-बार उन्हें दिखाई पड़े और उनके साथ ईश्वर के राज्य के विषय में बात करते रहे। येसु ने प्रेरितों के साथ भोजन करते समय उन्हें आदेश दिया कि वे येरुसालेम से नहीं जायें, किन्तु पिता ने जिस वरदान की प्रतिज्ञा की थी, उसी की प्रतीक्षा करते रहें। उन्होंने कहा, "मैंने तुम लोगों को उस प्रतिज्ञा के विषय में बता दिया है। योहन जल का बपतिस्मा देता था, परन्तु थोड़े ही दिनों के बाद तुम लोगों को पवित्र आत्मा का बपतिस्मा दिया जायेगा।” जब वे येसु के साथ एकत्र थे, तो वे उन से पूछने लगे, "प्रभु! क्या आप इसी इस्राएल का राज्य पुनः स्थापित करेंगे? “

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 46:2-3,6-78-9

अनुवाक्य : ईश्वर जयकार के साथ आगे बढ़ता है। वह तुरही के घोष के साथ आगे बढ़ता है।

1. समस्त राष्ट्रो! तालियाँ बजाओ और उल्लसित हो कर ईश्वर का जयकार करो; क्योंकि वह प्रभु है, सर्वोच्च है, आराध्य है। वह समस्त पृथ्वी का महान् राजा है।

2. ईश्वर जयकार के साथ आगे बढ़ता है। वह तुरही के घोष के साथ आगे बढ़ता है। हमारे ईश्वर के आदर में भजन गाओ, हमारे राजा के आदर में भजन गाओ।

3. ईश्वर समस्त पृथ्वी का राजा है। उसके आदर में शिक्षा-गीत सुनाओ। ईश्वर सभी राष्ट्रों पर राज्य करता है। वह अपने सिंहासन पर विराजमान है।

📘दूसरा पाठ - वर्ष A, B, C

एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:17-23

उसने मृतकों में से उन्हें पुनर्जीवित किया और स्वर्ग में अपने दाहिने बैठाया।

महिमामय पिता, हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर, आप लोगों को प्रज्ञा तथा आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करे, जिससे आप उसे सचमुच जान जायें। वह आप लोगों के मन की आँखों को ज्योति प्रदान करे जिससे आप यह देख सकें कि उसके द्वारा बुलाये जाने के कारण आप लोगों की आशा कितनी महान् है और सन्तों के साथ आप लोगों को जो विरासत मिली है, वह कितनी वैभवपूर्ण तथा महिमामय है, और हम विश्वासियों के कल्याण के लिए सक्रिय रहने वाले ईश्वर का सामर्थ्य कितना अपार है। ईश्वर ने मसीह में वही सामर्थ्य प्रदर्शित किया, जब उसने मृतकों में से उन्हें पुनर्जीवित किया और स्वर्ग में अपने दाहिने बैठाया। स्वर्ग में कितने ही प्राणी क्यों न हों और उनका नाम कितना ही महान् क्यों न हो, उन सब के ऊपर ईश्वर ने, इस युग के लिए और आने वाले युग के लिए, मसीह को स्थान दिया। उसने सब कुछ मसीह के पैरों तले डाल दिया और उन को सब कुछ पर अधिकार दे कर कलीसिया का शीर्ष नियुक्त किया। कलीसिया मसीह का शरीर और उनकी परिपूर्णता है। मसीह सब कुछ, सब तरह से, पूर्णता तक पहुँचा देते हैं।

प्रभु की वाणी।

📒जयघोष - वर्ष A, B, C

अल्लेलूया, अल्लेलूया! प्रभु कहते हैं, "तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बना लो। मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ"। अल्लेलूया!

📙सुसमाचार - वर्ष A

येसु इस पृथ्वी पर अंतिम बार अपने शिष्यों को दिखाई देते हैं और उन्हें सब राष्ट्रों को शिक्षा देने का कार्य सौंपते हैं। वे उन्हें यह आश्वासन देते हैं कि वह संसार के अंत तक सदा उनके साथ रहेंगे।

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 28:16-20

"मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है।”

तब ग्यारह शिष्य गलीलिया की उस पहाड़ी के पास गये, जहाँ येसु ने उन्हें बुलाया था। उन्होंने येसु को देख कर दण्डवत् किया, किन्तु किसी-किसी को संदेह भी हुआ। तब येसु ने उनके पास आ कर कहा, "मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बना लो और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो। मैंने तुम्हें जो-जो आदेश दिये हैं, तुम लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ और याद रखो मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ"।

प्रभु का सुसमाचार।


📚 मनन-चिंतन

आज हम प्रभु येसु के स्वर्गारोहण का महापर्व मनाते हैं, इसलिए यह रविवार स्वर्गारोहण रविवार कहलाता है। माता कलिसिया हमें सिखाती है कि ईश्वर बुरे लोगों को दंड देगा और भले लोगों को पुरस्कृत करेगा (कलिसिया के नियम)। जब हम पृथ्वी पर जीते हैं, जो भी कार्य करते हैं, वे या तो भले कार्य होते हैं या बुरे कार्य। वे चाहे भले कार्य हों या बुरे, अंतिम न्याय के समय हमें उनका लेखा देना होगा। उसी के अनुसार प्रभु हमारा न्याय करेगा। हम देखते हैं कि प्रभु येसु घूम-घूम कर लोगों की भलाई करते रहे। इसका संक्षिप्त सार हम आज के पहले पाठ में देखते हैं। उन्होंने अपने अपने वचनों द्वारा लोगों को नई राह दिखाई, अपने चमत्कारों द्वारा उनके दुख-दर्द मिटाए, और उतना ही नहीं, उन्होंने अपनी कष्टकारी मृत्यु द्वारा संसार के पाप भी मिटाए। ऐसा करना हम मामूली मनुष्यों के लिए असंभव था। जो प्रभु येसु ने किया वह और कोई नहीं कर सकता था। पिता ने जब उन्हें संसार की मुक्ति के लिए भेजा तो मुक्तिकार्य पूरा होने के बाद उन्हें वापस अपने पिता के पास लौटना था। प्रभु जिस असाधारण तरीके से इस दुनिया में आए उसी तरह से असाधारण तरीके से वे अपने पिता के पास वापस भी लौटते हैं। जब प्रभु येसु ने इतना असाधारण और अपूर्व बलिदान दिया तो जाहिर है कि उसके लिए पिता ईश्वर भी असाधारण उपहार देंगे। स्वर्ग पहुँचने के बाद पिता ईश्वर प्रभु येसु को सब कुछ पर अधिकार देते हैं, सब कुछ उनके अधीन कर देते हैं। ये स्वाभाविक भी था। प्रभु ने अपने बलिदान और पुनरुत्थान द्वारा मृत्यु को हराया था, पाप पर विजय पाई थी, संसार को शैतान के चंगुल से छुड़ाया था। उनकी जीत के उपहारस्वरूप वही अब इस दुनिया के प्रभु नियुक्त हुए हैं। ऐसा नहीं है कि पहले सब कुछ प्रभु येसु का नहीं था, लेकिन पहले उसे पाप से मुक्त किया जाना जरूरी था।

- फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

Today we celebrate the solemnity of the Ascension of our Lord, therefore this Sunday is called the ascension Sunday. Mother church teaches us that God will reward the good people and punish the bad ones. When we live in this world and whatever we do, those works are either good works or bad ones. Whether they are good works or bad works, at the end of the world, we all need to give an account of all that we do. God will judge us according to our own actions. We see that Jesus was going around and doing good to the people . The short summary of his good works, is seen in the first reading of today. His words were life-giving words, He freed the people from their pains and sorrows , even he accepted to die a painful death on the cross so that he could save sinful humanity. No human being can possibly do what Jesus did. When God the father sent his son into the world to save the world, when his saving work was over, he had to return to his heavily father. Jesus came into this world in an extraordinary way and similarly, he returns to his heavily father in the same way. If Jesus had undergone an extraordinary and painful death, in order to fulfill his Father’s will, Heavenly father would also reward him in return. As a reward, God puts everything under his feet, He gives power and authority over whole creation to his only begotten son. This was natural. Jesus defeated death through his sacrifice on the cross, he defeated sin and freed the world from the clutches of the devil. As a victory reward, he rules over the creation. Everything already belonged to the son, but by saving it through his death, he has all the more rightful claim.

-Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)

📚 मनन-चिंतन-2

आज माता कलिसिया प्रभु येसु के स्वर्गारोहण का पर्व मनाती है। प्रभु येसु की मृत्यु के बाद शिष्य लोग बहुत अधिक डर गये थे। उनकी हिम्मत ने जवाब दे दिया था। प्रभु येसु नहीं चाहते थे कि वे टूट जाएँ, वे निराश हो जाएँ और इसलिए मृत्यु के बाद तीसरे दिन जी उठने के बाद वे अपने शिष्यों को दिखाई देते रहे। उन्हें दर्शन देकर अपनी शिक्षाओं में दृढ़ करते रहे, पुनः समझाते रहे, और ऐसा वे चालीस दिनों तक करते रहे। लेकिन फिर समय आ गया कि उन्हें इस पृथ्वी से शारीरिक रूप से विदा होना था और आत्मिक रूप से पुनः हमेशा शिष्यों के साथ रहना था। स्वर्गारोहण के इस त्योहार में हम वही दृश्य देखते हैं जिसमें प्रभु शारीरिक रूप से स्वर्ग में अरोहित कर लिए गये।

जब किसी व्यक्ति का आख़िरी समय आता है तो वह व्यक्ति महत्वपूर्ण बातें ही करता है। किसी की मृत्यु या आख़िरी समय से पहले कहे गये शब्द बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। प्रभु येसु का स्वर्गारोहण का दिन भौतिक शरीर के साथ आख़िरी दिन था, उसके बाद वह उसी शिष्यों के साथ नहीं रहने वाले थे। इसलिए स्वर्गारोहण के इस अवसर पर प्रभु येसु द्वारा बोले गए ये शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। आज के इन शब्दों को “मिशन आदेश” अथवा अंतिम आदेश के रूप में जाना जाता है, इसलिये प्रभु येसु का यह आख़िरी आदेश हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रभु येसु आदेश देते हैं कि ‘तुम लोग जाकर सब राष्ट्रों को शिष्य बना लो और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।’ प्रभु येसु ने सारी दुनिया को शिष्य बनाने, सुसमाचार सुनाने का यह आदेश हमें दो हज़ार साल पहले दिया था, और दो हज़ार साल बाद तक भी हम सारी दुनिया को सुसमाचार नहीं सुना पाए हैं। आज भी दुनिया में ऐसे लोग और जगहें हैं जहाँ प्रभु येसु का नाम नहीं पहुँचा है। आख़िर क्यों? प्रभु येसु को स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है, सब कुछ प्रभु का है और प्रभु के अधीन है तो फिर भी दो हज़ार सालों में भी प्रभु के आदेश को पूरा क्यों नहीं कर पाए हैं। प्रभु येसु ने कहा कि मैं संसार के अंत तक सदा तुम्हारे साथ हूँ - फिर भी प्रभु का सुसमाचार संसार के कोने-कोने तक क्यों नहीं पहुँच रहा है?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर हम सभी के हृदयों में छुपा है। हमने प्रभु का यह आदेश व्यक्तिगत रूप से स्वीकार नहीं किया है। प्रभु येसु का यह आदेश क्या सिर्फ़ उन बारह शिष्यों के लिए ही था? जी नहीं ! यह आदेश प्रभु का अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए था, यह आदेश मेरे लिए, आपके लिए, सबके लिए था। लेकिन हमने कभी इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लिया। हम सोचते रहे कि प्रभु के काम को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी तो चुने हुए लोगों की है, सुसमाचार प्रचार के लिए तो फ़ादर-सिस्टर आदि बनना पड़ेगा। जी नहीं ! बपतिस्मा द्वारा यह ज़िम्मेदारी हम में से प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से दी गयी है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति को आगे आना होगा। आज के इस पावन दिन प्रभु येसु व्यक्तिगत रूप से हमसे एक बार पुनः आह्वान करते हैं कि “मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है - इसलिए तुम लोग जाकर सब राष्ट्रों को शिष्य बना लो।” प्रभु संसार के अंत तक हमारे साथ हैं। आमेन।

- फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

Today we celebrate the solemnity of the Ascension of our Lord Jesus Christ. The disciples were really shaken to core after the cruel death by crucifixion of Jesus. They were scared very much. Jesus wouldn’t want that they should break down or disheartened to the extent that everything fails. So after his death and resurrection he kept on showing himself to the disciples, made them with his presence, reaffirmed what he had taught, and he continue to do this for forty days. And after some time he had to go away ending his life in physical and beginning to be with them in Spirit. We witness the same event of Jesus going upto heaven on the occasion of this feast.

When a person sees his end, he doesn’t speak in vain, he talks what is urgent and important. The words uttered just before a person’s death or long departure are the words of great importance. The day of the Ascension of the Lord was last day in physical body with his disciples, after that he was not to be with them in the same form. Therefore the commandment given by Jesus just before his ascension is very important. These words are called “The Mission Commandment” or Final commandment nad therefore it is very important commandment for all of us.

Jesus commands us to ‘go and make disciples of all nations, baptising them in the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit…’ This mandate was given to us two thousand years before and even after two thousand years we have not yet fully executed it. There are still places and people in the world who are strange to the name of Jesus. Why? Jesus has all authority and power in heaven and on earth, whole creation is given to Jesus, yet why is it that we are not able to fully execute his command? Jesus is with us to the end of the age, then still why the Gospel has not yet reached to the corners of the world?

Answers to all these questions lie within our own hearts. We have not accepted this mandate individually, each and everyone for himself/herself. Did Jesus give this command only for his 12 disciples? No! This command was and is for everyone who follows and accepts Jesus in his life, this command was given to me, to you, to everyone! But we never took it personally. We thought the responsibility of continuing Jesus’ mission was of the few chosen ones, we had become priests or nuns to preach the gospel. But the fact is that through our Baptism each and everyone of us is given this responsibility individually. Each and everyone one of us has to come forward . On this auspicious day Jesus once again exhorts us, assures us that all power and authority is given to him, therefore go to the ends of the world to baptise and preach, and He is there with us to the ends of world. Amen.

-Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)