पवित्र त्रित्व का उत्सव - पेन्तेकोस्त के बाद का रविवार – वर्ष C

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📕पहला पाठ

सूक्ति-ग्रंथ 8:22-31

"पृथ्वी से पहले प्रज्ञा की उत्पत्ति हुई है।"

प्रज्ञा पुकार कर कहती है, "आदि में, प्रभु ने अन्य कार्यों से पहले मेरी सृष्टि की है। प्रारम्भ में, पृथ्वी की उत्पत्ति से पहले, अनन्त काल पूर्व ही मेरी सृष्टि हुई है। जिस समय मेरा जन्म हुआ, न तो महासागर था और न उमड़ते जल-स्स्रोत थे। मैं पर्वतों की स्थापना से पहले, पहाड़ियों से पहले उत्पन्न हुई थी। जब उसने पृथ्वी, समतल भूमि तथा संसार के मूल-तत्त्व बनाये, तो मेरा जन्म हो चुका था। जब उसने आकाश-मंडल का निर्माण किया और महासागर के चारों ओर वृत्त खींचा, तो मैं विद्यमान थी। जब उसने बादलों का स्थान निर्धारित किया और समुद्र के स्रोत उमड़ने लगे, जब उसने समुद्र की सीमा निश्चित की - जिससे जल तट का अतिक्रमण न करे - जब उसने पृथ्वी की नींव डाली, उस समय मैं कुशल शिल्पकार की भाँति उसके साथ थी। मैं नित्यप्रति उसका मनोरंजन करती और उसके सम्मुख क्रीड़ा करती रही, मैं पृथ्वी पर सर्वत्र क्रीड़ा करती और मनुष्यों के साथ मनोरंजन करती रही।

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 8:4-9

अनुवाक्य : हे प्रभु ! हमारे ईश्वर ! तेरा नाम समस्त पृथ्वी पर कितना महान् है !

1. जब मैं तेरे बनाये हुए आकाश, चाँद और तारे देखता हूँ, तो सोचने लगता हूँ- मनुष्य क्या है, जो तू उसकी सुध ले? आदम का पुत्र क्या है, जो तू उसकी देखभाल करे?

2. तूने उसे स्वर्गदूत से कुछ ही कम बनाया और उसे महिमा तथा सम्मान का मुकुट पहनाया। तूने उसे अपनी सृष्टि पर अधिकार दिया और सब कुछ उसके पैरों तले डाल दिया।

3. सब भेड़-बकरियों, गाय-बैलों और जंगल के बनैले पशुओं को; आकाश के पक्षियों, समुद्र की मछलियों और सारे जलचारी जन्तुओं को।

📘दूसरा पाठ

रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 5:1-5

"पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में ईश्वर का प्रेम उमड़ पड़ा है।"

ईश्वर ने हमारे विश्वास के कारण हमें धार्मिक माना है। हम अपने प्रभु येसु मसीह द्वारा ईश्वर से मेल बनाये रखें। मसीह ने हमारे लिए उस अनुग्रह का द्वार खोला है, जो हमें प्राप्त हो गया है। हम इस बात पर गौरव करें कि हमें ईश्वर की महिमा के भागी बनने की आशा है। इतना ही नहीं, हम दुःख-तकलीफ़ पर भी गौरव करें, क्योंकि हम जानते हैं कि दुःख-तकलीफ़ से धैर्य, धैर्य से दृढ़ता, और दृढ़ता से आशा उत्पन्न होती है। आशा व्यर्थ नहीं होती, क्योंकि ईश्वर ने हमें पवित्र आत्मा को प्रदान किया है और उसी के द्वारा ईश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उमड़ पड़ा है।

प्रभु की वाणी।

📒जयघोष

(अल्लेलूया, अल्लेलूया !) पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को महिमा ! उसी ईश्वर को, जो है, जो था और जो आने वाला है। (अल्लेलूया !)

📙सुसमाचार

योहन के अनुसार पवित्र सुसमाचार 16:12-15

"जो कुछ पिता का है, वह मेरा है। इसलिए मैंने कहा कि उसे मेरी ओर से जो मिला है, वह तुम्हें वही बतायेगा।"

"मुझे तुम लोगों से और बहुत कुछ कहना है, परन्तु अभी तुम वह नहीं सह सकते। जब वह सत्य का आत्मा आयेगा, तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य तक ले जायेगा; क्योंकि वह अपनी ओर से नहीं कहेगा, बल्कि वह, जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा और तुम्हें आने वाली बातों के विषय में बतायेगा। वह मुझे महिमान्वित करेगा, क्योंकि उसे मेरी ओर से जो मिला है, वह तुम्हें वही बतायेगा। जो कुछ पिता का है, वह मेरा है। इसलिए मैंने कहा कि उसे मेरी ओर से जो मिला है, वह तुम्हें वही बतायेगा।

प्रभु का सुसमाचार।


📚 मनन-चिंतन

योहन 16:12-15 में येसु अपने षिष्यों को धीरे से तैयार करते हैं, ताकि वे पवित्र आत्मा के आगमन को समझ सकें। वे कहते हैं कि आत्मा उन्हें सारी सच्चाई में ले चलेगा। वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा, बल्कि वही बताएगा जो वह सुनेगा, और वह मसीह की महिमा करेगा। यह वचन हमें पवित्र त्रित्व की एक सुंदर झलक देता है - पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच की पूर्ण एकता और प्रेमभरी सहभागिता। त्रित्व कोई रहस्य नहीं जिसे समझना है, बल्कि एक रिष्ता है जिसे जीना है। ईश्वर स्वयं प्रेम हैं, और यह प्रेम पिता, पुत्र और आत्मा के बीच सदा से चलता आ रहा है। पिता पुत्र को प्रेम भेजते हैं, पुत्र पिता को प्रकट करते हैं, और पवित्र आत्मा हमें इस दिव्य प्रेम का अनुभव कराते हैं। तीनों एक साथ कार्य करते हैं - कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, कोई विभाजन नहीं। इसका मतलब है कि जब हम येसु से मिलते हैं, तो हम पिता के हृदय को जानते हैं। और जब आत्मा हमसे बात करता है, तो वह येसु को हमारे सामने प्रकट करता है। आत्मा कोई नया संदेश नहीं लाता, बल्कि वह हमें मसीह को गहराई से समझने और जीने का सामर्थ देता है। एक भ्रमित और बंटी हुई दुनिया में, त्रित्व हमें एकता, प्रेम और सच्चाई के जीवन में प्रवेश करने का निमंत्रण देता है। पवित्र आत्मा हमें न केवल यह समझने में मदद करता है कि ईश्वर कौन हैं, बल्कि यह भी कि हम कौन हैं अर्थात् पिता की संतान, पुत्र की कृपा में और आत्मा की संगति में जीने वाले। हमारा जीवन पवित्र त्रित्व सच्चाई और एकता को प्रकट करे। आमेन।

- फादर डेन्नीस तिग्गा


📚 REFLECTION

In John 16:12–15, Jesus gently prepares His disciples for the coming of the Holy Spirit. He tells them that the Spirit will guide them into all truth—not speaking on His own, but declaring what He hears, and glorifying Christ by revealing His truth. This passage gives us a beautiful glimpse into the mystery of the Holy Trinity: the perfect unity and harmony between the Father, the Son, and the Holy Spirit. The Trinity is not a puzzle to be solved, but a relationship to be lived. God is love, and this love is shared eternally between the three Persons of the Trinity. The Father sends the Son, the Son reveals the Father, and the Spirit makes their love known to us. Each Person works together in perfect unity—never competing, never divided. This means that when we encounter Jesus, we encounter the Father’s heart. And when the Holy Spirit speaks to us, it is Jesus who is being revealed. The Spirit doesn’t bring a new message—He deepens our understanding of Christ and empowers us to live as children of the Father. In a world of confusion and division, the Trinity invites us into divine communion—into a life of truth, love, and unity. The Holy Spirit is our guide, not only into understanding who God is, but into becoming who we are meant to be: sons and daughters who live in the love of the Father, the grace of the Son, and the fellowship of the Spirit. May our lives reflect the unity and truth of the Holy Trinity. Amen.

-Fr. Dennis Tigga

📚 मनन-चिंतन - 2

हम सब ख्रीस्तीय पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर सभी कार्य करते है, विशेष रूप से प्रार्थना की शुरुआत और अंत। पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा तीन व्यक्ति है परंतु एक ईश्वर है और इसी त्रियेक ईश्वर का पर्व हम आज मनाते है, जिसे पवित्र त्रित्व के महापर्व से जाना जाता है।

मनुष्यों ने हमेशा से ही ईश्वर के बारे में जानने की कोशिश की है। प्रभु येसु और पवित्र आत्मा के द्वारा हमने ईश्वर और उनकी योजनाओं के बारे में कई रहस्य या सिद्धांत को समझा और जाना है परंतु जरूरी नहीं कि हम ईश्वर के हर रहस्य को समझ पाये। उनमें से एक रहस्य पवित्र त्रित्व का है जो हमारे इस क्षणिक दिमाग में कभी भी नहीं समा सकता।

आज के तीनों पाठ आज के पर्व के संदर्भ के अनुसार है। पहला पाठ में हमे शक्तिशाली पिता ईश्वर के विषय में बताया गया है जिसने इस अद्भुत सृष्टि की रचना की और महान चमत्कारों द्वारा इस्राएल को बचाया; वह पिता एक शक्तिशाली ईश्वर है और उसके सिवा कोई और ईश्वर नहीं है।

दूसरे पाठ में पवित्र आत्मा के विषय में बताया गया है। पवित्र आत्मा ईश्वर बाहर नहीं परंतु हमारे भीतर बसने वाला ईश्वर है क्योकि हमारा शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है। जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित है उनमें ईश्वर के जीवन का संचार है और वह इस संसार से परे रहकर ईश्वर के पुत्र के मनोभाव के अनुसार जीवन बिताता है।

सुसमाचार में हम प्रभु येसु के अंतिम आदेश के बारे में जानते है जहॉं प्रभु येसु अपने शिष्यों से कहते है कि, ’’मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।’’ प्रभु येसु जाते जाते पवित्र त्रित्व के नाम को उजागर कर के जाते है।

पवित्र त्रित्व का पर्व हमारे लिए त्रियेक ईश्वर को जानने का और प्रार्थना करने का सुंदर अवसर है परंतु इस रहस्य या सिद्धांत को पूर्ण रूप से समझना हमारे दिमाग के बस की बात नहीं। एक ईश्वर में तीन जन- इस रहस्य को समझाने के लिए कई विद्वानों ने कई उदाहरण देकर समझना चाहा परंतु किसी ने भी एक ठोस रूप से इसकी गहराई को समझा नहीं पाया है।

पवित्र त्रित्व का पर्व एकता का पाठ पढ़ाती है। जिस प्रकार पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अलग अलग व्यक्ति है परंतु वे एक है। जिस प्रकार प्रभु येसु कहते है मै पिता में हुँ और पिता मुझमें है ठीक उसी प्रकार पवित्र आत्मा भी पिता और पुत्र में हैं और वे पवित्र आत्मा में अर्थात् वे तीनों एक है। आज के पर्व की आशीष द्वारा हम भी ईश्वर में एक बनें रहें जिस प्रकार प्रभु येसु हमारे लिए चाह रखते है, ’’सब के सब एक हो जायें। पिता! जिस तरह तू मुझ में है और मैं तुझ में, उसी तरह वे भी हम में एक हो जायें’’ (योहन 17:21)। आमेन!

- फादर डेन्नीस तिग्गा


📚 REFLECTION

We all Christians do all the works in the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit, especially before and after the prayer. Father, Son and Holy Spirit are three persons but one God and this triune God’s feast we are celebrating today which is popularly known as Feast of Holy Trinity.

Humans have always tried to know about God. Because of Jesus and the Holy Spirit we understood many mysteries or concept about God and his plans but it is not necessary that we may understand every mystery. Among those mystery is the mystery of Holy Trinity which our temporary minds cannot contain it.

Today’s all the three readings are based on today’s feast. First reading is about the Almighty Father who created this wonderful creation and with great miracles He rescued Israelites; The Father is Almighty God and there is no other.

Second Reading is about the Holy Spirit. Holy Spirit God is a God who wants to live not outside but inside of us because our body is the temple of the Holy Spirit. Those who are led by the Spirit in them God’s power flows and setting themselves apart they live according to the mind of children of God.

In the Gospel we read about the mandate of Jesus where Lord Jesus says to the disciples, “All authority in heaven and on earth has been given to me. Go therefore and make disciples of all nations, baptizing them in the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit.” Before going Jesus manifest the name of the Holy Trinity.

The feast of Holy Trinity is a beautiful opportunity to know about triune God and to pray to Him, but to understand the mystery or concept fully is out of our brain. Three persons in one God- to understand this mystery many scholars tried to understand through various examples but none of them have explained the depth of it in a concrete manner.

The feast of Holy Trinity teaches us the lesson of unity. As the Father, Son and the Holy Spirit are three different persons but they are united as one. As Lord Jesus says I am in the Father and Father is in me similarly Holy Spirit is also in the Father and the Son and they in the Holy Spirit that is to say they three are one. By the grace of today’s feast we also may remain one in God as Lord Jesus wants for us, “that they may be one, as you, Father, are in me and I am in you, may they also be in us.” Amen!

-Fr. Dennis Tigga

मनन-चिंतन -3

आज हम पवित्र त्रिएक ईश्वर का रविवार मनाते हैं। और आज के दिन शायद प्रवचन देना सबसे मुश्किल होता है। क्योंकि पवित्र त्रित्व का रहस्य ईश्वर के अस्तित्व का सबसे गहरा रहस्य है। ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में, या उनके देहधारण को या फिर उनके पुनरूत्थान को काफी हद तक समझा जा सकता है। परन्तु एक ही ईश्वर होते हुए भी उसमें तीन जन होना, वो भी बिना किसी भिन्नता के, बिना किसी विरोधाभास के और बिना किसी वर्गीकरण के। ऐसे एक अटूट व परिपूर्ण एकतारूपी ईश्वर के अस्तित्व को समझना साधारण व सीमित मानवबुद्धि के बस की बात नहीं।

कई लोग इसे समझाने के लिए कई ऐसे उदाहरण पेश करते हैं जिसे हम हमारी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा अनुभव कर सकते हैं और समझ सकते हैं। जैसे कई लोग पानी की तीन विभिन्न अवस्थाओं का हवाला देते हुए कहते हैं जैसे पानी का मौलिक रूप H2O है पर वह तीन विभिन्न अवस्थाओं में पाया जाता है जैसे द्रव, ठोस (बर्फ) और गैस (भाप)। इन तीनों रूपों में वह है तो वही पानी पर तीन विभिन्न अवस्थाओं में मौजूद रहता है। वैसे ही ईश्वर है तो एक ही वास्तविकता, एक ही अस्तित्व, पर वह तीन विविध रूपों में अपने आप को प्रकट करता है - पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।

परन्तु सच्चाई यह है कि कोई भी अनुभवजन्य ज्ञान या उदाहरण पवित्र त्रित्व को समझाने के लिए सटीक या पर्याप्त नहीं है। क्योंकि यह ‘ईश्वर’का रहस्य है। इसायाह 55:8-9 में वही ईश्वर हम से कहते हैं - ‘‘तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं है और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं है। जिस तरह आकाश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।’’

जब हम पवित्र त्रित्व के बारे में बात करते हैं तो मैं इसकी शुरूआत संत योहन के पहले पत्र अध्याय 4:8 से करना उचित समझता हूँ। जहाँ पर संत योहन ईश्वर की परिभाषा इन शब्दों में पेश करते हैं - ‘‘ईश्वर प्रेम है”।

हम ख्रीस्तीयों की सबसे हटकर एक पहचान है और वह है हमारी ईश्वर की समझ या ईश्वर की पहचान। ख्रीस्तीयों के लिए ईश्वर प्यार है। एक यहूदी या फिर मुस्लिम यह कहेंगे कि ईश्वर प्यार करता है। यह सच है। परन्तु ईसाईत की अलग पहचान इस बात को लेकर है कि हमारे लिए ‘ईश्वर प्यार है।’ दूसरे शब्दों में प्यार वह कोई चीज नहीं जिसे ईश्वर करता है परन्तु प्यार ईश्वर की परिभाषा है, प्यार ईश्वर की एक पहचान है। या फिर प्यार ईश्वर का अस्तित्व है। ‘ईश्वर प्यार है’यह दावा ही पवित्र त्रित्व को समझने व पहचानने का आधार है। ईश्वर प्यार है और ईश्वर त्रित्व है ये दोनों एक ही बात की ओर इंगित करते हैं।

यदि हम यह कहते हैं कि ईश्वर प्यार है तो ईश्वर के अपने अस्तित्व के भीतर ही यह प्यार क्रियाशील होना चाहिए। याने ईश्वर के एक ही अस्तित्व में प्यार करने वाला, प्यार पाने वाला और प्यार स्वयं मौजूद होना चाहिए। जी हॉं ईश्वर संसार से प्यार करता है यह सत्य है। परन्तु आदिकाल से ईश्वर की पहचान यह है कि वह प्यार है। और इसलिए हमें यह कहना उचित है कि ईश्वर प्यार है और अपने अंदर उस प्यार की तीन भूमिकायें हैं। पिता जो कि प्यार का उद्गम है जो पुत्र से प्रेम करता है और पिता पुत्र के बीच का यह प्रेम ही आत्मा है। पवित्र त्रियेक ईश्वर यह बतलाता है कि उसमें प्रेम की परिपूर्णता है। जिसमें प्रेम की परिपूर्णता है वही सच्चा और पूर्ण ईश्वर हो सकता है। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा में प्रेम की परिपूर्णता विद्यमान है। जब हम प्रेम की बात करते हैं तो हमारा अनुभव हमें यह बतलाता है कि प्यार कभी निश्चल नहीं हो सकता है परन्तु प्यार हमेशा गतिशील रहता है। यदि मुझमें किसी के प्रति प्यार है तो वह प्यार मेरे भीतर निष्क्रिय रूप में पडा नहीं रहता पर वह गतिशील या क्रियाशील होकर अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता खोजता है। वह शब्दों द्वारा, उपहार द्वारा, आलिंगन द्वारा, स्पर्श द्वारा, चुंबन द्वारा या फिर मन में प्रेम भरी एक कल्पना द्वारा व्यक्त किया जाता है।

उसी प्रकार जब हम कहते हैं कि ईश्वर प्यार है तो यह प्यार अपने आप में निष्क्रिय नहीं रह सकता। वह अपनी अभिव्यक्ति खोजेगा। हम यह जानते और विश्वास करते हैं कि ईश्वर अनादिकाल से विद्यमान हैं। यदि ईश्वर अनादि काल से विद्यमान है और वह ईश्वर प्रेम है तो उस ईश्वर को त्रियेक रूप में होना आवश्यक है। क्योंकि एक ही जन में, अपने आप में प्रेम की अभिव्यक्ति असंभव है। इसलिए ईश्वर जो कि प्यार है वह पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रूप में एक ही प्यार के बंधन में एक ही सह अस्तित्व में निवास करता हैं। इसलिए पवित्र त्रित्व में ही पूर्ण ईश्वर हो सकता है। अन्यथा ईश्वर में एक अधूरापन रह जाता है। और जिसमें अधूरापन है वह ईश्वर नहीं हो सकता। यदि हम पवित्र त्रित्व में से किसी भी एक जन को इसमें से अलग कर देते हैं तो ईश्वर अपने अस्तित्व का अर्थ खो देते हैं। यदि हम आत्मा को त्रित्व से अलग कर दें तो हमारे पास पिता और पुत्र रह जाते हैं पर मनुष्यों में प्राण भरने वाला आत्मा, जिसके द्वारा ईश्वर सृष्टि का नवनिर्माण करता है नहीं रह जाता। यदि हम पुत्र को त्रित्व से अलग कर दें तो हमारे पास पिता और आत्मा रह जाते हैं पर हमारे पास वह ईश्वर नहीं रह जाता जो अपने आप को मनुष्यों के बीच प्रकट करता है जो अपने प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए स्वयं मनुष्य का शरीर धारण कर लेता है। और यदि पिता को त्रित्व से अलग कर दिया जाये तो पुत्र और आत्मा तो हमारे साथ रहते हैं पर सारे ब्रह्माण का संचालन करने वाली दिव्य सत्ता हमारे साथ नहीं होती।

अब ये पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अपना अलग-अलग अस्तित्व रखने वाले तीन ईश्वर नहीं वरन एक ही ईश्वर के तीन जन हैं। इनका अस्तित्व एक ही है और वह है एकमात्र ईश्वर का अस्तित्व। ये तीनों अलग-अलग अस्तित्व नहीं रख सकते। इन तीनों को एक ही अस्तित्व में परिपूर्णता से बाँधे रखने वाली शक्ति है उनका प्रेम। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच कभी विभाजित न की जा सकने वाली एकता का रहस्य है उनका अविभाजित, कभी न तोडा जा सकने वाला और कभी न खत्म होने वाला प्यार। इसलिए प्रभु येसु संत योहन 10:30 में कहते हैं - ‘‘मैं और पिता एक हैं”। और योहन 14:9 में प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है”। और संत पेत्रुस पेंतेकोस्त के दिन अपने प्रथम भाषण में लोगों से नबी योएल के ग्रंथ का हवाला देते हुए पवित्र आत्मा के विषय में की गई भविष्यवाणी के बारे में बतलाते हैं – “मैं अंतिम दिनों सब शरीरधारियों पर अपना आत्मा उतारूँगा”। यहाँ पर ईश्वर अपने आत्मा के बारे में कह रहे हैं। जो आत्मा पेंतेकोस्त के दिन प्रेरितो पर उतरा वह ईश्वर से बाहर अस्तित्व रखने वाली कोई आत्मा नहीं परन्तु स्वयं ईश्वर का आत्मा था। याने पवित्र त्रित्व का तीसरा जन स्वयं ईश्वर की त्रियेक सत्ता से प्रसृत होता है।

ईश्वर का त्रिएक रूप में होना हमें क्या सिखलाता है? ईश्वर का त्रिएक अस्तित्व है याने प्रेम की परिपूर्णता का अस्तित्व है। अपने इसी स्वाभाव के कारण ईश्वर हमारी सृष्टि करता है और वही त्रियेक ईश्वर हमें अपने इस प्रेम में भागीदार होने के लिए बुलाता है। संत योहन 14:23 में प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘यदि कोई मुझे प्यार करेगा तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आकर उसमें निवास करेंगे”। तो यह है पवित्र त्रित्व में विश्वास करने का अंतिम उद्देश्य कि हम ईश्वर के इस असीम और अनन्त प्रेम के भागीदार बन जायें।

संत योहन 14:1 में प्रभु येसु अपनी ख्वाहिश इन श्ब्दों में बयाँ करते हैं – “जिससे जहाँ मैं हूँ वहाँ तुम भी रहो”। प्रभु येसु कहॉँ है? इसके बारे में योहन 14:11 में येसु हमें बतलाते हैं - ‘‘मैं पिता में हूँ ओर पिता मुझमें हैं”। इसका आशय यह हुआ कि पवित्र त्रिएक ईश्वर हमें अपने प्रेम में एक हो जाने के लिए बुलाता है।

येसु ख्रीस्त की शिक्षाओं पर चले बिना हम उनसे प्यार नहीं कर पायेंगे और न ही उनके प्यार के सहभागी बन पायेंगे। तो सबसे पहले हमें येसु ख्रीस्त को पहचानना उन्हें स्वीकार करना और उनकी आज्ञाओं को मानना होगा। तब हम उनसे प्यार कर पायेंगे और स्वयं पिता हमें प्यार करेगा और पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा हममें आकर निवास करेंगे। आमेन।

-फादर प्रीतम वसुनिया (इन्दौर धर्मप्रांत)