
उनका वंश राष्ट्रों में प्रसिद्ध होगा और उनकी संतति का नाम देश-विदेश में फैल जायेगा। उन्हें देखने वाले सब के सब जान जायेंगे कि वे प्रभु की चुनी हुई प्रजा हैं। मैं प्रभु में प्रफुल्लित हो उठता हूँ, मेरा मन अपने ईश्वर में आनन्द मनाता है। जिस तरह वर पगड़ी बाँध कर और वधू गहने पहन कर सुशोभित होते हैं, उसी तरह प्रभु ने मुझे मुक्ति के वस्त्र पहनाये और मुझ पर धार्मिकता की चादर डाल दी है। जिस तरह पृथ्वी अपनी उपज उगाती है और बाग बीजों को अंकुरित करता है, उसी तरह प्रभु-ईश्वर सभी राष्ट्रों में धार्मिकता तथा भक्ति उत्पन्न करता है।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : मेरा हृदय प्रभु के कारण आनन्दित हो उठता है।
1. मेरा हृदय प्रभु के कारण आनन्दित हो उठता है। मुझे अपने प्रभु से शक्ति मिली है और मैं अपने शत्रुओं का सामना कर सकता हूँ, क्योंकि तेरा सहारा मुझे उत्साह देता है।
2. शक्तिशालियों के धनुष टूट गये और जो दुर्बल थे, वे शक्तिसम्पन्न बन गये। जो धनी थे, वे रोटी के लिए मज़दूरी करते हैं और जो भूखे थे, वे सम्पन्न बन गये। जो बाँझ थी, यह सात बार प्रसव करती है और जो पुत्रवती थी, उसकी गोद खाली है।
3. प्रभु ही मारता और जिलाता है, वह मनुष्यों को अधोलोक पहुँचाता और वहाँ से निकालता है, प्रभु निर्धन और धनी बनाता है, वह मनुष्यों को नीचा दिखाता और उन्हें ऊँचा उठाता है।
4. वह दीन-हीन को धूल में से निकालता है और कूड़े पर बैठे हुए कंगाल को ऊपर उठा कर उसे रइसों की संगति में पहुँचाता है और सम्मान के आसन पर बैठाता है।
(अल्लेलूया, अल्लेलूया!) हे संत कुँवारी मरियम, आप धन्य हैं और सब प्रशंसा के योग्य! क्योंकि न्याया का सूर्य, मसीह, हमारा ईश्वर आप से उत्पन्न हुआ है। (अल्लेलूया)
येसु के माता-पिता प्रति वर्ष पास्का पर्व के लिए येरुसालेम जाया करते थे। जब बालक बारह बरस का था, तो वे प्रथा के अनुसार पर्व के लिए येरुसालेम गये। पर्व समाप्त हुआ और वे लौट पड़े; परन्तु बालक येसु अपने माता-पिता के अनजान में येरुसालेम में रह गया। वे यह समझ रहे थे कि वह यात्रीदल के साथ है; इसलिए वे एक दिन की यात्रा पूरी करने के बाद ही उसे अपने कुटुम्बियों और परिचितों के बीच ढूँढ़ने लगे। उन्होंने उसे नहीं पाया और ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वे येरुसालेम लौटे। तीन दिनों के बाद उन्होंने येसु को मंदिर में शास्त्रियों के बीच बैठे, उनकी बातें सुनते और उन से प्रश्न करते पाया। सभी सुनने वाले उसकी बुद्धि और उसके उत्तरों पर चकित रह जाते थे। उसके माता-पिता उसे देख कर अचंभे में पड़ गये और उसकी माता ने उस से कहा, “बेटा! तुमने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? देखो तो, तुम्हारे पिता और मैं दुःखी हो कर तुम को ढूँढ़ रहे थे।" उसने अपने माता-पिता से कहा, "मुझे ढूँढ़ने की क्या जरूरत थी! क्या आप यह नहीं जानते थे कि मैं निश्चय ही अपने पिता के घर में होऊँगा?" परन्तु येसु का यह कथन उनकी समझ में नहीं आया। येसु उनके साथ नाज़रेत गये और उनके अधीन रहे।
प्रभु का सुसमाचार।
मरियम का निष्कलंक हृदय का पर्व हमें मरियम के हृदय की ओर देखने के लिए बुलाता है - वह हृदय जो ईश्वर से पूरा प्रेम करता था, जो दुख में भी भरोसा करता था, और जो पूरी तरह ईश्वर की इच्छा में ‘हाँ’ कहता था। मरियम का हृदय पवित्र और निर्मल था - न केवल इसलिए कि उसमें पाप नहीं था, बल्कि इसलिए कि वह हमेशा ईश्वर के लिए खुला और समर्पित था। जब वह अपने बेटे येसु को दुख में देखती थी, तब भी वह ईश्वर की योजना में भरोसा रखती थी। उसने हर बात को अपने हृदय में संजोकर रखा (लूकस 2:19)। वह दुख से नहीं भागी - वह क्रूस के नीचे खड़ी रही। वह प्रेम में, विश्वास में और मौन में बनी रही। मरियम हमें सिखाती हैं कि कैसे हम निर्भय होकर प्रेम करें, कैसे भ्रम या पीड़ा में भी ईश्वर पर विश्वास करें, और कैसे हर दिन छोटे-छोटे कार्यों में भी ईश्वर को ‘हाँ’ कहें। आज के शोरगुल और उलझनों से भरी दुनिया में, मरियम का हृदय हमें शांत, सुनने वाला और ईश्वर के करीब रहने वाला हृदय बनना सिखाता है। इस पर्व पर हम माता मरियम से प्रार्थना करें कि वे हमें भी अपना सा हृदय दें - पवित्र, विश्वासपूर्ण, और ईश्वर व दूसरों के लिए प्रेम से भरा हुआ।
✍ - फादर डेन्नीस तिग्गा
The Feast of the Immaculate Heart of Mary invites us to look closely at the heart of the Mother of Jesus — a heart that loved God with all her being, a heart that trusted even in sorrow, and a heart that said “yes” to God completely. Mary’s heart was pure, not just because she was without sin, but because her heart was always open to God’s will. She did not always understand what God was doing, especially when she saw her Son suffer, but she kept everything in her heart (Luke 2:19). She did not run away from pain — she stood at the foot of the Cross. She remained faithful, loving, and silent in suffering. Her heart teaches us how to love without fear, how to trust even in confusion, and how to say “yes” to God every day, even in small things. In a world full of noise and distractions, Mary shows us the beauty of a quiet, listening heart — a heart that finds joy in being close to Jesus. On this feast, let us ask the Blessed Mother to help us make our hearts like hers: pure, faithful, and full of love for God and others.
✍ -Fr. Dennis Tigga
आज कलीसिया कुँवारी मरियम का निष्कलंक ह्दय को स्मरण करती है। कल हमने प्रभु येसु ख्रीस्त का पवित्रतम ह्दय का पर्व मनाया और आज हम उनकी माता मरियम के निष्कलंक ह्दय को याद करते है। कुँवारी मरियम का निष्कलंक ह्दय उनके ह्दय को दर्शाता है कि वह पाप रहित और किसी प्रकार के दोष से रहित था। उनके ह्दय में प्रभु का वचन और उसको पूर्णता तक ले जाने की इच्छा विद्यमान थी।
जहाँ पर प्रभु येसु ख्रीस्त का पवित्रतम ह्दय के प्रति भक्ति हमें ईश्वर का मनुष्यों के प्रति असीम प्रेम को इंगित करता है तो वही दूसरी ओर कुँवारी मरियम का निष्कलंक ह्दय एक उदाहरण के रूप में येसु के प्रति प्रेम और ईश्वर के प्रति प्रेम को दर्शाता है।
मरियम ने अपने ह्दय में सुख और दुख दोनों का अनुभव किया परंतु वे अपने जीवन भर में ईश्वर के प्रति विश्वसनीय बनी रही और आज का पर्व भी हमें येसु को प्रेम करने और सदा विश्वसनीय पात्र बने रहने के लिए प्रेरित करता है।
✍ - फादर डेन्नीस तिग्गा, भोपाल
Today the Church remembers the Immaculate Heart of the Virgin Mary. Yesterday we celebrated the Sacred Heart of the Lord Jesus Christ and today we remember the Immaculate Heart of his mother Mary. The Immaculate Heart of the Virgin Mary shows that how her heart was sinless and free from any impurities. In her heart was the word of the Lord and the desire to take it to perfection.
Where the Devotion to the Sacred Heart of Lord Jesus Christ indicates to us the infinite love of God for human beings, on the other hand the Immaculate Heart of the Virgin Mary shows the love for Jesus and love for God as an example.
Mary experienced both joy and sorrow in her heart, but she remained faithful to God throughout her life, and today's feast also inspires us to love Jesus and to remain faithful forever.
✍ -Fr. Dennis Tigga, Bhopal
किसी घर या स्थान की प्रकृति उन सब वस्तुओं के द्वारा परिभाषित की जाती है जो उसमें रहती है। मरियम का हृदय निष्कलंक है। उनका हृदय निष्कलंक माना जाता है क्योंकि वह उनके पुत्र येसु तथा ईश-वचन से भरा था जो दिन प्रतिदिन उनका मार्गदर्शन करता था। मरियम का हृदय ऐसा था जो ईश्वर के वचन को सुनता तथा उस पर दिन-रात चिंतन किया करता था। स्वर्गदूत ने मरियम पर यह प्रकट किया कि माता बनेगी तथा जो उनसे पुत्र होगा वे सर्वोच्च के पुत्र कहलायेंगे। मरियम में शब्द ने देहधारण किया। जब येसु के जन्म पर चरवाहों ने मरियम को स्वर्गदूतों के जयघोष, ’’सर्वोच्च स्वर्ग में ईश्वर की महिमा प्रकट हो और पृथ्वी पर उसके कृपापात्रों को शान्ति मिले!’’(लूकस 2:14) को बताया तो ’’मरियम ने इन सब बातों को अपने हृदय में संचित रखा और वह इन पर विचार किया करती थी।’’ (लूकस 2:19) वे येसु की इस बात को भी नहीं समझ सके जब वे कहते हैं, “मुझे ढूँढ़ने की जरूरत क्या थी? क्या आप यह नहीं जानते थे कि मैं निश्चय ही अपने पिता के घर होऊँगा?“उनकी माता ने इन सब बातों को अपने हृदय में संचित रखा।’’ (लूकस 2:49-51)
सुसमाचार इस बात को अक्सर बताता है कि मरियम ने वचन को अपने हृदय में रखा तथा उस पर चिंतन किया। वे उन्हें संचित रख विश्वास एवं धैर्य में वचन के अर्थ तथा प्रकटीकरण का इंतजार किया करती थी। मरियम ने वचन को सतही तौर पर नहीं लिया बल्कि उसके आंतरिक तथा गहरे अर्थ को, येसु के जीवन के घटनाक्र्रम से जुडकर जानने का प्रयत्न किया। ऐसा करने से उनका हृदय सदैव ईश्वरीय बातों तथा विचार पवित्र बना रहा। जब बालक येसु भीड में खो जाते हैं तो मरियम उन्हें तीन दिनों बाद पाती है। यह घटना येसु की मृत्यु तथा उनके तीसरे दिन पुनरूत्थान का पूर्व संकेत थी। वे अधिकांश समय मौन रही किन्तु येसु के जीवन तथा हो रही घटनाओं के प्रति बेहद सचेत बनी रही। उन्होंने अपनी आंखों से अपने प्रिय पुत्र की घोर प्राण-पीडा तथा क्रूस पर मृत्यु को देखा। उन्होंने विश्वास में अपने पुत्र के पुनरूत्थान पर विश्वास किया तथा वे जानती थी कि ऐसा होगा। येसु की प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने शिष्यों के साथ प्रार्थना में एक होकर पवित्र आत्मा का इंतजार किया।
येसु का जीवन मरियम से प्रारंभ हुआ तथा मरियम ने पवित्र आत्मा के आगमन तक उनका साथ दिया। मरियम का निष्कलंक हृदय हमारे लिये प्रार्थना करे।
✍ -फादर रोनाल्ड वाँन, भोपाल
The state of a house or place is defined by the nature of the things it possesses. Mary’s heart is an immaculate heart. It was considered immaculate because it was always full of Jesus her son and the word of God that would be unfolding day by day.Mary’s is the heart that listens and contemplates endlessly the divine word. It was announced to her by angel Gabriel that she would be the mother of the son of the Most High. In her word became flesh. At the nativity when shepherds told them the divine singing, “Glory to God in the highest, and on earth peace among men with whom he is pleased!”. (Luke 2:14) and “Mary kept all these things pondering them in her heart.”(2:19) They could not understand the meaning of the saying “Did you not know that I must be in my father’s house?” but Mary his mother kept all these things in her heart. (Luke 2:49-51)
Gospels repeatedly tell that Mary was keeping the word of God in her heart and pondering over them. She was treasuring them and waiting in faith with patience for their unfolding. Mary meditates which goes beyond the surface of events of Jesus’ life to seek deeper meaning. By doing this her heart remains immaculate and an ocean of love for Jesus and godly things. When Jesus was lost, she was very anxiously looking for him. She found him only after three days. This was premonition of the death of Jesus and his subsequent laying in the tomb for three days. She was silent on most of occasions but massively attentive to all that was happening to Jesus and through Jesus. She saw with her naked eyes the suffering of her beloved son Jesus and his gruesome death. She waited with faith for the resurrection and knew that it would be. She prayed with the apostles till the Holy Spirit came upon them.
The mission of Jesus began with her and she accompanied him all along till the promised helper Holy spirit came in her presence. May the immaculate heart of Mary ever intercede for us.
✍ -Rev. Fr. Ronald Vaughan, Bhopal