मई 28 - प्रभु येसु ख्रीस्त, शाश्वत महापुरोहित

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पहला पाठ

इसायाह का ग्रन्थ 52:13-53:12

देखो! मेरा सेवक फलेगा-फूलेगा। वह महिमान्वित किया जायेगा और अत्यन्त महान् होगा। उसकी आकृति इतनी विरूपित की गयी थी कि वह मनुष्य नही जान पड़ता था; लोग देख कर दंग रह गये थे। उसकी ओर बहुत-से राष्ट्र आश्चर्यचकित हो कर देखेंगे और उसके सामने राजा मौन रहेंगे; क्योंकि उनके सामने एक अपूर्व दृश्य प्रकट होगा और जो बात कभी सुनने में नहीं आयी, वे उसे अपनी आँखों से देखेंगे। किसने हमारे सन्देश पर विश्वास किया? प्रभु का सामर्थ्य किस पर प्रकट हुआ है? वह हमारे सामने एक छोटे-से पौधे की तरह, सूखी भूमि की जड़ की तरह बढ़ा। हमने उसे देखा था; उसमें न तो सुन्दरता थी, न तेज और न कोई आकर्षण ही। वह मनुष्यों द्वारा निन्दित और तिरस्कृत था, शोक का मारा और अत्यन्त दुःखी था। लोग जिन्हें देख कर मुँह फेर लेते हैं, उनकी तरह ही वह तिरस्कृत और तुच्छ समझा जाता था। परन्तु वह हमारे ही रोगों को अपने ऊपर लेता था और हमारे ही दुःखों से लदा हुआ था और हम उसे दण्डित, ईश्वर का मारा हुआ और तिरस्कृत समझते थे। हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया है। हमारे कूकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शान्ति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं। हम सब अपना-अपना रास्ता पकड़ कर भेड़ों की तरह भटक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सब के पापों का भार डाला है। वह अपने पर किया हुआ अत्याचार धैर्य से सहता गया और चुप रहा। वध के लिए ले जाये जाने वाले मेमने की तरह और ऊन कतरने वाले के सामने चुप रहने वाली भेड़ की तरह उसने अपना मुँह नहीं खोला। वे उसे बन्दीगृह और अदालत ले गये; कोई उसकी परवाह नहीं करता था। वह जीवितों के बीच में से उठा लिया गया है और वह अपने लोगों के पापों के कारण मारा गया है। यद्यपि उसने कोई अन्याय नहीं किया था और उसके मुँह से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली थी, फिर भी उसकी कब्र विधर्मियों के बीच बनायी गयी और वह धनियों के साथ दफ़नाया गया है। प्रभु ने चाहा कि वह दुःख से रौंदा जाये। उसने प्रायश्चित के रूप में अपना जीवन अर्पित किया; इसलिए उसका वंश बहुत दिनों तक बना रहेगा और उसके द्वारा प्रभु की इच्छा पूरी होगी। उसे दुःखभोग के कारण ज्योति और पूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा। उसने दुःख सह कर जिन लोगों का अधर्म अपने ऊपर लिया था, वह उन्हें उनके पापों से मुक्त करेगा। इसलिए मैं उसका भाग महान् लोगों के बीच बाँटूँगा और वह शक्तिशाली राजाओं के साथ लूट का माल बाँटेगा; क्योंकि उसने बहुतों के अपराध अपने ऊपर लेते हुए और पापियों के लिए प्रार्थना करते हुए अपने को बलि चढ़ा दिया और उसकी गिनती कुकर्मियों में हुई।

प्रभु की वाणी।

अथवा - पहला पाठ

इब्रानियों के नाम पत्र 10, 11-23

"उन्होंने उन को एक ही बलिदान द्वारा सदा के लिए पूर्णता तक पहुँचा दिया है।"

प्रत्येक दूसरा पुरोहित खड़ा हो कर प्रतिदिन धर्म-अनुष्ठान करता है और बार-बार एक ही प्रकार के बलिदान चढ़ाया करता है, जो पाप हरने में असमर्थ होते हैं। किन्तु वह, पापों के लिए एक ही बलिदान चढ़ाने के बाद, सदा के लिए ईश्वर के दाहिने विराजमान हो गये हैं, जहाँ वह उस समय की राह देखते हैं, जब उनके शत्रुओं को उनका पाँवदान बना दिया जायेगा। क्योंकि वह जिन लोगों को पवित्र करते हैं, उन्होंने उन को एक ही बलिदान द्वारा सदा के लिए पूर्णता तक पहुँचा दिया है। इसके संबंध में पवित्र आत्मा का साक्ष्य भी हमारे पास है। पहले वह बोलता है: प्रभु यह कहता है, मैं उनके लिए यह विधान निर्धारित करूँगा मैं अपने नियम उनके मन में रख दूँगा, मैं उन्हें उनके हृदय पर अंकित करूँगा। और इसके बाद वह फिर कहता है, मैं उनके पापों और अपराधों को याद भी नहीं रखूँगा। जब पाप क्षमा कर दिये गये हैं, तो फिर पाप के लिए बलिदान की आवश्यकता नहीं रही। भाइयो ! येसु का रक्त हमें निर्भय हो कर मंदिर-गर्भ में प्रवेश करने का आश्वासन देता है। उन्होंने हमारे लिए एक नवीन तथा जीवन्त मार्ग खोल दिया, जो उनके शरीर रूपी परदे से हो कर जाता है। अब हमें एक महान् पुरोहित प्राप्त हैं, जो ईश्वर के घराने पर नियुक्त किये गये हैं। इसलिए हम अपने हृदय को पाप के दोष से मुक्त कर और अपने शरीर को स्वच्छ जल से धो कर, निष्कपट हृदय से तथा परिपूर्ण विश्वास के साथ ईश्वर के पास चलें। हम अपने भरोसे का साक्ष्य देने में अटल एवं दृढ़ बने रहें, क्योंकि जिसने हमें वचन दिया है, वह सत्यप्रतिज्ञ है।

यह प्रभु की वाणी है।

भजन : स्तोत्र 23:1-6

अनुवाक्य : हे प्रभु ! जो लोग तेरे दर्शनों के लिए तरसते हैं, वे ऐसे ही हैं।

पृथ्वी और जो कुछ उस में है, संसार और उसके निवासी यह सब प्रभु का है। क्योंकि उसी ने समुद्र पर उसकी नींव डाली है, प्रभु ने जल पर उसे स्थापित किया है।

प्रभु के पर्वत पर कौन चढ़ेगा? उसके मंदिर में कौन रह पायेगा ? वही, जिसके हाथ निर्दोष हैं, जिसका हृदय निर्मल है, जिसका मन असार संसार में नहीं रमता।

उसी को प्रभु की आशिष प्राप्त होगी, वही अपने मुक्तिदाता ईश्वर से पुरस्कार पायेगा। वह उन लोगों के सदृश है, जो प्रभु की खोज में लगे रहते हैं, जो याकूब के ईश्वर के दर्शनों के लिए तरसते हैं।

जयघोष

अल्लेलूया, अल्लेलूया ! प्रभु कहते हैं, "भला गड़ेरिया मैं हूँ। मैं अपनी भेड़ों को जानता हूँ और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं।" अल्लेलूया !

सुसमाचार

लूकस के अनुसार पवित्र सुसमाचार 22:14-20

"यह मेरी स्मृति में किया करो। मैं तुम लोगों में सेवक जैसा हूँ।"

समय आने पर येसु प्रेरितों के साथ भोजन करने बैठे और उन्होंने उन से कहा, "मैं कितना चाहता था कि दुःख भोगने से पहले पास्का का यह भोजन तुम्हारे साथ करूँ; क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, जब तक यह ईश्वर के राज्य में पूर्ण न हो जाये, मैं उसे फिर नहीं खाऊँगा।" इसके बाद येसु ने प्याला लिया, धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और कहा, "इसे ले लो और आपस में बाँट लो; क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, जब तक ईश्वर का राज्य न आये, मैं दाख का रस फिर नहीं पिऊँगा।" उन्होंने रोटी लो और धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए शिष्यों को दिया, "यह मेरा शरीर है जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है। यह मेरी स्मृति में किया करो।" इसी तरह उन्होंने भोजन के बाद यह कहते हुए प्याला दिया, "यह प्याला मेरे रक्त का नूतन विधान है। यह तुम्हारे लिए बहाया जा रहा है।"

प्रभु का सुसमाचार।

मनन-चिंतन - 3

पवित्र पेन्तेकोस्त के बाद आने वाले गुरुवार को, काथलिक कलीसिया 'हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त: शाश्वत महापुरोहित' का पर्व मनाती है। जहाँ पुराने विधान के पुरोहितों को स्वयं के और दूसरों के पापों की क्षमा के लिए प्रतिदिन बलिदान चढ़ाना पड़ता था, वहीं शाश्वत पुरोहित येसु ख्रीस्त ने संपूर्ण मानवता की मुक्ति के लिए एक ही 'अनंत बलिदान' अर्पित किया। अटारी में 'अंतिम ब्यारी' के समय संस्कार के रूप में स्थापित यह बलिदान, कलवारी के क्रूस पर पूर्ण हुआ। अटारी के पास्का भोज के दौरान, जहाँ यहूदियों के लिए अंगूरी के चार प्याले पीना एक प्रथा थी, येसु ने चौथा प्याला नहीं लिया। उनका चौथा प्याला उन्हें क्रूस पर प्राप्त हुआ—जो उनके दुःखभोग और मृत्यु का प्याला था। क्रूस का वह बलिदान एक 'शाश्वत बलिदान' है, इसलिए अब किसी अन्य बलिदान की आवश्यकता नहीं है। येसु अन्य सभी लेवी पुरोहितों से भिन्न हैं। वे 'मेलखिज़ेदेक' के पद के अनुसार पुरोहित हैं, जो लेवी पुरोहित नहीं थे, बल्कि उन्होंने उत्पत्ति 14:17-20 के अनुसार अब्राहम के पास रोटी और अंगूरी लाकर उन्हें आशीर्वाद दिया था। वे 'शांति के राजा' और 'न्याय के राजा' हैं। वे 'पुरोहित-राजा' (Priest-King) हैं। प्रतिदिन मनाया जाने वाला 'पवित्र मिस्सा' कोई नया बलिदान नहीं है, बल्कि हमारे मुक्तिदाता के उस एकमात्र बलिदान का पुन: प्रस्तुतीकरण (re-enactment) है। आइए, हम पर्याप्त तैयारी के साथ यूखरिस्तीय बलिदान में सहभागी होने का संकल्प लें।

- -फादर फ्रांसिस स्करिया


REFLECTION

On Thursday after Pentecost, the Catholic Church celebrates the Feast of Our Lord Jesus Christ, the Eternal High Priest. While the Old Testament priests had to offer sacrifices every day for the forgiveness of their own sins and of the sins of others, Jesus Christ, the eternal priest offers an eternal sacrifice for the salvation of humanity. This sacrifice sacramentally established in the Upper Room at the Last Supper was completed on the Cross of Calvary. At the Paschal Meal in the upper room, while it was customary for the Jewish people to drink four cups of wine, Jesus did not take the fourth cup. His fourth cup was received on the cross – the cup of his suffering and death. That sacrifice of the Cross is an eternal sacrifice and so there is no need to make another sacrifice. Jesus is different from all other Levitical priests. He is a priest according to the Order of Melchizedek who was not a Levitical Priest who according to Gen 14:17-20 brought Bread and Wine to Abraham and blessed Abraham. He is the King of Peace and King of Righteousness. He is the Priest-King. Holy Mass celebrated every day is not another sacrifice, but the re-enactment of the one and only Sacrifice of our Redeemer. Let us resolve to participate in the Eucharistic Sacrifice with adequate preparations.

- Fr. Francis Scaria