मई 1
सन्त यूसुफ़, मजदूर - ऐच्छिक स्मरण-दिवस

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📕पहला पाठ

उत्पत्ति-ग्रंथ 1:26-2:3

"पृथ्वी पर फैल जाओ और उसे अपने अधीन कर लो।"

ईश्वर ने कहा, "हम मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनायें; वह हमारे सदृश हो । वह समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों, घरेलू और जंगली जानवरों और जमीन पर रेंगने वाले सब जीव-जन्तुओं पर शासन करे।" ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया; उसने उसे ईश्वर का प्रतिरूप बनाया; उसने नर और नारी के रूप में उनकी सृष्टि की। ईश्वर ने यह कह कर उन्हें आशीर्वाद दिया, "फलो-फूलो । पृथ्वी पर फैल जाओ और उसे अपने अधीन कर लो। समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों और पृथ्वी पर विचरने वाले सब जीव-जन्तुओं पर शासन करो।" ईश्वर ने कहा, "मैं तुम को पृथ्वी भर के बीज पैदा करने वाले सब पौधे, और बीजदार फल देने वाले सब पेड़ दे देता हूँ। यह तुम्हारा भोजन होगा। मैं सब जंगली जानवरों को, आकाश के सब पक्षियों को, पृथ्वी पर विचरने वाले जीव-जन्तुओं को उनके भोजन के लिए पौधों की हरियाली दे देता हूँ।" और ऐसा ही हुआ। ईश्वर ने अपने द्वारा बनाया हुआ सब कुछ देखा और यह उस को अच्छा लगा। संध्या हुई और फिर भोर हुआ यह छठा दिन था। इस प्रकार आकाश तथा पृथ्वी, और जो कुछ इन में है, सब की सृष्टि पूरी हुई। सातवें दिन ईश्वर का किया हुआ कार्य समाप्त हुआ। उसने अपना समस्त कार्य समाप्त कर, सातवें दिन विश्राम किया। ईश्वर ने सातवें दिन को आशीर्वाद दिया और उसे पवित्र माना; क्योंकि उस दिन उसने, सृष्टि का समस्त कार्य समाप्त कर, विश्राम किया था।

प्रभु की वाणी।

📕वैकल्पिक पहला पाठ

कलोसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:14-15,17,23-24

"आप लोग जो भी काम करें, मन लगा कर कीजिए, मानो मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि प्रभु के लिए काम कर रहे हों।"

आप आपस में प्रेम-भाव बनाये रखें। वह सब कुछ एकता में बाँध कर पूर्णता तक पहुँचा देता है। मसीह की शांति आपके हृदयों में राज्य करे। इसी शांति के लिए आप लोग, एक शरीर के अंग बन कर, बुलाये गये हैं। आप जो कुछ भी कहें या करें, वह सब प्रभु येसु के नाम पर किया करें। उन्हीं के द्वारा आप लोग पिता-परमेश्वर को धन्यवाद देते रहें। आप लोग जो भी काम करें, मन लगा कर कीजिए, मानो मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि प्रभु के लिए काम कर रहे हों; क्योंकि आप जानते हैं कि प्रभु पुरस्कार के रूप में आप को विरासत प्रदान करेगा। आप लोग प्रभु के दास हैं।

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 89: 2-4,12-14,16

अनुवाक्य : हे प्रभु! हमारे सब कार्यों पर तेरी आशिष! (अथवा : अल्लेलूया!)

1. पर्वतों के बनने के पहले से, पृथ्वी तथा संसार की उत्पत्ति के पहले से, तू ही अनादि-अनन्त ईश्वर है।

2. तू मनुष्य को फिर मिट्टी में मिला कर कहता है, "हे मनुष्य की सन्तान! लौट जाओ।" एक हज़ार वर्ष भी तुझे बीते कल की तरह लगते हैं, वे तेरी गिनती में रात के पहर के सदृश हैं।

3. हमें जीवन की क्षणभंगुरता सिखा, जिससे हम में सद्बुद्धि आये। हे प्रभु! क्षमा कर, हम कब तक तेरी प्रतीक्षा करें? तू अपने सेवकों पर दया कर।

4. तू भोर को हमें अपना प्रेम दिखा, जिससे हम दिन भर आनन्द के गीत गा सकें। तेरे सेवक तेरे महान् कार्य देखें और उनकी सन्तान तेरी महिमा के दर्शन करे।

📒जयघोष

अल्लेलूया, अल्लेलूया! हम प्रतिदिन प्रभु को धन्यवाद दिया करें। वह हमारा भार हल्का कर देता और हमारी रक्षा करता है। अल्लेलूया!

📙सुसमाचार

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 13:54-58

"क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है?"

येसु अपने नगर आये और लोगों को उनके सभागृह में शिक्षा देने लगे। वे अचंभे में पड़ कर कहने लगे, "इसे यह ज्ञान और यह सामर्थ्य कहाँ से मिला? क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है? क्या मरियम इसकी माँ नहीं? क्या यह याकूब, यूसुफ़, सिमोन और यूदस इसके भाई नहीं? क्या इसकी सब बहनें हमारे ही बीच नहीं रहतीं? तो यह सब इसे कहाँ से मिला?" और वे उन में विश्वास नहीं कर सके। येसु ने उन से कहा, "अपने नगर और अपने घर में नबी का आता नहीं होता।" लोगों के अविश्वास के कारण उन्होंने वहाँ बहुत कम चमत्कार दिखाये।

प्रभु का सुसमाचार।


📚 मनन-चिंतन

आज श्रमिक संत जोसफ का पर्व है, जो श्रमिकों के संरक्षक संत और श्रम की गरिमा का सम्मान करते हैं। संत पिता पियुष XII ने मानव श्रम के मूल्य को पहचानने के लिए 1955 में श्रमिक संत जोसफ के पर्व की स्थापना की। द्वितीय वाटिकन परिषद ने समाज की सेवा और ईश्वर की योजना में अपना योगदान देने हेतु काम अर्थात श्रम के महत्व पर जोर दिया। संत पापा फ्राँसिस ने जोर देकर कहा कि मनुष्य की गरिमा काम से आती है, शक्ति या धन से नहीं। एक विनम्र बढ़ई, संत जोसेफ ने, पवित्र परिवार के लिए दैनिक ज़रूरतों को अपने श्रम से कमाया और ईश्वर दिव्य योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पर्व के दिन, हमें काम की पवित्रता और ईश्वर की दृष्टि में उसके मूल्य की याद दिलाई जाती है। चाहे हमारा काम शारीरिक हो या बौद्धिक, छोटा या प्रतिष्ठित, हमें समर्पण और सेवा की भावना के साथ इसे गले लगाने के लिए आह्वान किया जाता है जैसा संत जोसफ ने किया।

संत जोसेफ का यह पर्व हमें श्रमिकों के अधिकारों और गरिमा का सम्मान करते हुए विश्व स्तर पर समान कामकाजी परिस्थितियों का समर्थन करने के लिए प्रेरित करता है। आइए हम अपने कार्यों में संत जोसेफ के मूल्यों का अनुकरण करें, उत्कृष्टता, अखंडता और करुणा के लिए सदा प्रयास करते रहें। श्रमिक संत जोसेफ का पर्व हमें प्रोत्साहित करता है कि हम अपने कामों को ईश्वर के सृष्टि और मुक्ति के सतत कार्यों में सहभागिता मानते हुए हमारे विश्वास को अपने रोजमर्रा के जीवन में साकार करें। हमारा श्रम, जब प्रेम से और ईश्वर की इच्छा के अनुसार होता है, तो वह पवित्रता का स्रोत और पृथ्वी पर ईश्वर के राज्य की स्थापना का एक साधन बन सकता है।

- फादर प्रीतम वसुनिया - इन्दौर धर्मप्रांत


📚 REFLECTION

Today we celebrate the Feast of St. Joseph the Worker, honouring the patron saint of workers and the dignity of labour. In 1955, Pope Pius XII established this Feast to acknowledge the significance of human labour. The Second Vatican Council emphasized that work has a crucial role in serving society and contributing to God’s plan. Pope Francis has emphasized that the dignity of man comes from work, not from power or money.

On this feast day, we are reminded of the sanctity of work and the value it holds in God's eyes. Whether our work is manual or intellectual, menial or prestigious, we are called to approach it with the same spirit of dedication and service that St. Joseph demonstrated. St. Joseph the Worker's Feast prompts us to champion equitable working conditions globally, respecting workers' rights and dignity. Let's emulate St. Joseph's values in our work, striving for excellence, integrity, and compassion.

The Feast of St. Joseph the Worker encourages us to bring our faith into our everyday lives by treating our work as a way to join in God's continuous work of creation and redemption. It reminds us that our labor, when performed with love and in accordance with God's will, can become a source of holiness and a means of creating the Kingdom of God on earth.

-Fr. Fr. Preetam Vasuniya - Indore Diocese