मैं देख ही रहा था कि सिंहासन रख दिये गये और एक वयोवृद्ध व्यक्ति बैठ गया। उसके वस्त्र हिम की तरह उज्ज्वल थे और उसके सिर के केश निर्मल ऊन की तरह। उसका सिंहासन ज्वालाओं का समूह था और सिंहासन के पहिये, धधकती अग्नि। उसके सामने से आग की धारा बह रही थी। सहस्रों उसकी सेवा कर रहे थे, लाखों उसके सामने खड़े थे। न्याय की कार्यवाही प्रारम्भ हो रही थी और पुस्तकें खोल दी गयी थीं। मैं रात का दृश्य देख रहा था। और देखो! आकाश के बादलों पर मानव पुत्र जैसा कोई आया। वह वयोवृद्ध के यहाँ पहुँचा और उसके सामने लाया गया। उसे प्रभुत्व, सम्मान तथा राजत्व दिया गया। सभी देश, राष्ट्र और भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी उसकी सेवा करेंगे। उसका प्रभुत्व अनन्त है, वह सदा ही बना रहेगा, उसके राज्य का कभी विनाश नहीं होगा।
प्रभु की वाणी।अनुवाक्य : प्रभु समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च राजा है।
1. प्रभु राज्य करता है। पृथ्वी प्रफुल्लित हो जाये, असंख्य द्वीप आनन्द मनायें। अन्धकारमय बादल उसके चारों ओर मँडराते हैं। उसका सिंहासन सत्य और न्याय पर आधारित है।
2. पृथ्वी के अधिपति के आगमन पर पर्वत मोम की तरह पिघलते हैं। आकाश प्रभु का न्याय घोषित करता है। सभी राष्ट्र उसकी महिमा देखते हैं।
3. क्योंकि तू ही प्रभु है। तू ही समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च है, तू ही सभी देवमूर्तियों से महान् है।
जब हमने आप लोगों को अपने प्रभु येसु मसीह के सामर्थ्य तथा पुनरागमन के विषय में बताया तो हमने मनगढ़न्त कथाओं का सहारा नहीं लिया, बल्कि हमने अपनी ही आँखों से उनका प्रताप उस समय देखा है, जब उन्हें पिता-परमेश्वर से सम्मान तथा महिमा प्राप्त हुई और भव्य ऐश्वर्य में से उनके प्रति एक वाणी यह कहती हुई सुनाई पड़ी, "यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" जब हम पवित्र पर्वत पर उनके साथ थे, तो हमने स्वयं स्वर्ग से आती हुई यह वाणी सुनी थी। इस घटना द्वारा नबियों की वाणी हमारे लिए और भी विश्वसनीय सिद्ध हुई। इस पर ध्यान देने में आप लोगों का कल्याण है, क्योंकि जब तक पौ नहीं फटती और आपके हृदयों में प्रभात का तारा उदित नहीं होता, तब तक नबियों की वाणी अँधेरे में चमकते हुए दीपक के सदृश है।
प्रभु की वाणी।
अल्लेलूया, अल्लेलूया! यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसकी सुनो। अल्लेलूया!
येसु पेत्रुस, योहन और याकूब को अपने साथ ले गये और प्रार्थना करने के लिए एक पहाड़ पर चढ़े। प्रार्थना करते समय येसु के मुखमंडल का रूपान्तरण हो गया और उनके वस्त्र विद्युत की तरह उज्ज्वल हो कर जगमगाने लगे। दो पुरुष उनके साथ बात-चीत कर रहे थे। वे मूसा और एलियस थे, जो महिमा सहित प्रकट हो कर येरुसालेम में होने वाली उनकी मृत्यु के विषय में बातें कर रहे थे। पेत्रुस और उनके साथी, जो ऊँघ रहे थे, अब पूरी तरह जाग गये। उन्होंने येसु की महिमा को और उनके साथ उन दो पुरुषों को देखा। वे विदा हो ही रहे थे कि पेत्रुस ने येसु से कहा, "गुरुवर! यहाँ होना हमारे लिए कितना अच्छा है! हम तीन तम्बू खड़ा कर दें एक आपके लिए, एक मूसा और एक एलियस के लिए।" उसे पता नहीं था कि वह क्या कह रहा है। वह बोल ही रहा था कि बादल आ कर उन पर छा गया और वे बादल से घिर जाने के कारण भयभीत हो गये। बादल में से यह वाणी सुनाई पड़ी, "यह मेरा परमप्रिय पुत्र है। इसकी सुनो।" वाणी समाप्त होने पर येसु अकेले ही रह गये। शिष्य इस सम्बन्ध चुप रहे और उन्होंने जो देखा था, उस विषय पर वे उन दिनों किसी से कुछ भी नहीं बोले।
प्रभु का सुसमाचार।
आज संसार भर की कलीसिया प्रभु येसु के रूपांतरण का पर्व मनाती है। हम जानते हैं कि जब प्रभु येसु अपने प्रिय शिष्यों के साथ ताबोर पर्वत पर गए थे, वहीं उनका रूपांतरण हो गया। शिष्यों को नबी मूसा और नबी एलियाह दिखाई दिए। उन्हें पिता ईश्वर की वाणी भी सुनाई पड़ी। नबी मूसा सभी नबियों में महान थे (विधि विवरण ३४:१०)। ईश्वर अपनी योजना पूरी करने वाले थे, इन दोनों नबियों का प्रभु के रूपांतरण के समय दिखाई देना इस बात का संकेत था दुनिया की बहुत महान घटना घटने वाली है। प्रभु येसु मृत्यु को जीतने वाले थे, शैतान को हराने वाले थे, मानव जाति को मुक्ति दिलाने वाले थे। पिता ईश्वर सबके सामने अपने पुत्र को स्वीकार करते हैं, इसका अर्थ है कि वह इस महान कार्य में प्रभु येसु के साथ हैं, और प्रभु की सुननी है अर्थात हमें प्रभु के मिशन में उनका साथ देना है। प्रभु की सुनने का अर्थ है प्रभु की बातों में विश्वास करना। कभी-कभी हम प्रभु की बातों को अनसुना कर देते हैं, और उनके मिशन में सहयोग नहीं करते। अपने मन की जाँच करें।
✍फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर)Today, the Church across the world celebrates the Feast of the Transfiguration of the Lord. We know that when Jesus went up Mount Tabor with His beloved disciples, He was transfigured before them. The disciples saw the prophets Mosesand Elijah appear with Him. They also heard the voice of God the Father. The prophet Moses was considered the greatest among all prophets (Deuteronomy 34:10). God was about to fulfill His divine plan, and the appearance of both prophets at the moment of Jesus’ transfiguration was a sign that a most significant event was about to take place. Jesus was about to conquer death, defeat Satan, and bring salvation to humankind. God the Father publicly acknowledged His Son, which meant He was with Jesus in this great mission. And when God says, “Listen to Him,” it means we are to join in Jesus’ mission. To “listen to the Lord” means to believe in His words. Yet, at times, we ignore the voice of the Lord and do not cooperate in His mission. Let us examine our hearts.
✍ -Fr. Johnson B. Maria (Gwalior)
यह महान दिन उस विशेष क्षण का जश्न मनाता है जब मसीह के तीन शिष्यों ने मसीह की दिव्य महिमा की झलक देखी। पेत्रुस, याकूब और योहन ने मसीह को देखा कि वह वास्तव में कौन है - न केवल एक भविष्यद्वक्ता, या कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तियों में से एक, बल्कि ईश्वर है। येसु मसीह का आश्चर्यजनक रहस्यमय घटना, जो कि ईश्वर है, जिसे कलीसिया आज मनाती है। चेहरे की तेज चमक ईश्वर के सबसे करीबी लोगों की विशेषता है। जब मूसा विधान की पाटीयो को दोनों हाथो में लिये हुए सिनई पर्वत से उतरा, तो उसके मुख का रंग इस कारण से चमक उठा, कि उसने ईश्वर से बातें की। इसी तरह, हम सभी के पास अपने जीवन में रूपांतरित होने और ईश्वर के साथ एक घनिष्ठ संबंध प्राप्त करने का अवसर है। इसलिए, हम सभी के पास ईश्वर के निकटतम लोगों के दृश्य संकेतों को प्रकट करने का अवसर है।
✍ - फादर संजय कुजूर एस.वी.डी.
This great day celebrates the privileged moment when three of Christ’s disciples glimpsed Christ’s divine glory. Peter, James, and John saw Christ for who he really and truly is-not just a prophet, or one of many important historical figures, but God. The surprising revelation of Jesus Christ, who is God, is what the Church celebrates today. The bright radiance and shining of the face is also a characteristic of those closest to God. When Moses came down from Mount Sinai with the two tables of the testimony in his hand, the skin of his face shone because he had been talking with God. In like manner, we all have the opportunity to be transfigured in our lives and to acquire a close relationship with God. So, too, we all have the opportunity to manifest the visible signs of those closest to God.
✍ -Fr. Snjay Kujur SVD
आज माता कलिसिया प्रभु येसु के रूपांतरण का पर्व मनाती है। प्रभु येसु अपने तीन सबसे प्रिय शिष्यों को अपने साथ एक ऊँचे पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहाँ उनकी उपस्थिति में उनका रूपांतरण हो जाता है। नबी मूसा और एलियस आकर उनसे चर्चा करते हैं और अंत में पिता ईश्वर की वाणी यह कहते हुए सुनाई देती है, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ, इसकी सुनो।”
यह घटना प्रभु येसु के मानव जीवन की बहुत महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। हालाँकि प्रभु येसु के जीवन की सारी घटनायें महत्वपूर्ण थी क्योंकि सब कुछ पिता ईश्वर की इच्छा और योजना के अनुसार ही था, लेकिन कुछ घटनाएँ जैसे प्रभु येसु का बपतिस्मा, चालीस दिन और चालीस रात का उपवास, रूपांतरण, येरूसलेम में प्रवेश, गेथसेमनी बारी में प्रभु येसु की प्राण-पीड़ा आदि बहुत महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं जो क्रूस के बलिदान की ओर इंगित करती हैं।
प्रभु येसु का इस दुनिया में आने का उद्देश्य क्रूस पर अपने आप को बलिदान करना और संसार को मुक्ति प्रदान करना था। यह बहुत पीड़ादायी होने वाला था, और यहाँ हम देखते हैं कि पिता ईश्वर अपने पुत्र के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करते हैं, जो प्रभु येसु को शक्ति और साहस प्रदान करता है। ईश्वर हममें से सभी को प्यार करते हैं। जब हम मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करते हैं, तो हमें अपने आंतरिक पर्वत पर चढ़ना है, और अपने स्वर्गीय पिता की वाणी को सुनना है, “तू मेरा प्रिय पुत्र है, तू मेरी प्रिय पुत्री है, मैं तुझसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” पिता ईश्वर की वह वाणी हमें भी प्रभु येसु की तरह रूपांतरित कर देगी। आमेन।
✍ - फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
Today we celebrate the Feast of the Transfiguration of the Lord. Jesus took his three very close disciples to a high mountain and there he was transfigured. Prophets Moses and Elijah come to discuss with Jesus and at the end voice of God the Father is heard saying, “this is my beloved son, with whom I am well pleased, Listen to him.”
This is among most important events of Jesus’ human life. Although all the events in Jesus’ life were important because everything was planned and according to God’s will, but some events like Baptism of Jesus, Fasting for forty days and forty nights, Transfiguration, Triumphal Entry into Jerusalem, Agony in the garden etc are very important events leading to the ultimate sacrifice on the Cross.
The purpose of Jesus’ coming was to sacrifice himself on the cross and make salvation available to all. This process was going to be painful, perhaps most painful of all the events in Jesus’ life and here Father acknowledges his love for his Son, that certainly gives strength to Jesus. God loves each one of us. When we are faced with difficulties and challenges, we need to go to our inner mountain and hear the voice of the Father. That would certainly transfigure us. Amen.
✍ -Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)