चालीसे का दूसरा सप्ताह – इतवार – चक्र A

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पहला पाठ

ईश्वर ने अब्राम को अपना देश छोड़ने का आदेश दिया और उन्हें अपनी प्रजा का आदिपुरुष बना देने की प्रतिज्ञा की। अब्राम ने ईश्वर पर विश्वास किया। हमें भी ईश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास करना चाहिए। वह हमें हृदय-परिवर्तन तथा पश्चात्ताप के लिए बुलाता है।

उत्पत्ति-ग्रंथ 12:1-4

“ईश्वर की प्रजा के आदिपुरुष अब्राम का बुलावा।”

प्रभु ने अब्राम से कहा, “अपना देश, अपना कुटुम्ब और अपने पिंता का घर छोड़ दो और उस देश जाओ, जिसे मैं तुम्हें दिखाउँगा। मैं तुम्हारे द्वारा एक महान्‌ राष्ट्र उत्पन्न करूँगा, तुम्हें आशीर्वाद दूँगा और तुम्हारा नाम इतना महान बनाऊँगा कि वह कल्याण का स्रोत बन जायेगा - जो तुम्हें आशीर्वाद देते हैं, मैं उन्हें आशीर्वाद दूँगा। जो तुम्हें शाप देते हैं, मैं उन्हें शाप दूँगा। तुम्हारे द्वारा पृथ्वी भर के वंश आशीर्वाद प्राप्त करेंगे”। तब अब्राम चला गया जैसा कि प्रभु ने उस से कहा था।

प्रभु की वाणी।

भजन : स्तोत्र 32:4-5,18-20,22

अनुवाक्य : हे प्रभु ! तेरा प्रेम हम पर बना रहे। हम तुझ पर ही पूर्ण आशा रखते हैं।

प्रभु का वचन सच्चा है, उसके समस्त कार्य विश्वसनीय हैं। उसे धार्मिकता तथा न्याय प्रिय हैं। पृथ्वी उसके प्रेम से भरपूर है।

प्रभु की कृपादृष्टि अपने भक्तों पर बनी रहती है, उन पर जो उसके प्रेम से यह आशा करते हैं कि वह उन्हें मृत्यु से बचायेगा और अकाल के समय उनका पोषण करेगा।

हम प्रभु की राह देखते रहते हैं, वही हमारा उद्धारक और रक्षक है। हे प्रभु ! तेरा प्रेम हम पर बना रहे। तुझ पर ही हमारा भरोसा है।

दूसरा पाठ

ईश्वर हमें अब्राम की तरह एक नये जीवन के लिए बुलाता है। हमें ईश्वर की कृपा पर यह भरोसा रखना चाहिए कि हम येसु मसीह के साथ मृत्यु पर विजयी हो कर अनन्त जीवन प्राप्त कर सकते हैं।

तिमथी के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र1:8-10

“ईश्वर हमें बुलाता और ज्योति प्रदान करता है।”

ईश्वर के सामर्थ्य पर भरोसा रख कर, तुम मेरे साथ सुसमाचार के लिए कष्ट सहते रहो। ईश्वर ने हमारा उद्धार किया है और हमें पत्रित्र जीवन बिताने के लिए बुलाया है। उसने हमारे किसी पुण्य के कारण नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य तथा अपनी कृपा के कारण ही ऐसा किया है। वह कृपा अनादिकाल से येसु मसीह द्वारा हमें प्राप्त थी, किन्तु वह अब हमारे मुक्तिदाता येसु मसीह के आगमन से प्रकट हुई है। येसु ने मृत्यु का विनाश किया और अपने सुसमाचार द्वारा अमर जीवन को आलोकित किया है।

प्रभु की वाणी।

जयघोष

बादल में से पिता की यह वाणी सुनाई पड़ी, “यह मेरा प्रिय पुत्र है। इसकी सुनो"।

सुसमाचार

येसु के शिष्य दुःखभोग की भविष्यवाणी सुन कर उदास थे। इसलिए येसु उन्हें अपना दिव्य रूप दिखलाते हैं, ताकि उनका विश्वास दृढ़ हो जाये।

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 17:1-9

“उनका मुखमण्डल सूर्य की तरह दमक उठा।”

छह दिन बाद येसु ने पेत्रुस, याकूब और उसके भाई योहन को अपने साथ ले लिया और वह उन्हें एक ऊँचे पहाड़ पर एकान्त में ले चले। उनके सामने ही येसु का रूपान्तरण हो गया। उनका मुखमण्डल सूर्य की तरह दमक उठा और उनके वस्त्र प्रकाश के समान उज्जवल हो गये। शिष्यों को मूसा और एलियस उनके साथ बातचीत करते दिखाई दिये। तब पेत्रुस ने येसु से कहा, “प्रभु ! यहाँ होना हमारे लिए कितना अच्छा है। आप चाहें, तो मैं यहाँ तीन तम्बू खड़ा कर दूँगा - एक आपके लिए, एक मूसा और एक एलियस के लिए”। वह बोल ही रहा था कि उन पर एक चमकीला बादल छा गया और उस बादल में से यह वाणी सुनाई पड़ी, “यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ; इसकी सुनो”। यह वाणी सुन कर वे मुँह के बल गिर पड़े और बहुत ही डर गये। तब येसु ने पास आ कर उनका स्पर्श किया और कहा, “उठ जाओ, डरो मत”। उन्होंने आँखें ऊपर उठायीं, तो उन्हें येसु के सिवा और कोई नहीं दिखाई पड़ा। येसु ने पहाड़ से उतरते समय उन्हें यह आदेश दिया, “जब तक मानव पुत्र मृतकों में से न जी उठे, तब तक तुम लोग किसी से भी इस दर्शन की चरचा नहीं करना”।

प्रभु का सुसमाचार।

📚 मनन-चिंतन

आज के इस पाठ में हम एक दिव्य रहस्योद्घाटन के क्षण का साक्षात्कार करते हैं -येसु का रूपांतरण। येसु पेत्रुस, याकूब और योहन को एक ऊँचे पर्वत पर ले जाते हैं, जहाँ उनके सामने येसु का रूप परिवर्तित हो जाता है- उनका चेहरा सूर्य की तरह दमकने लगता है और उनके वस्त्र उज्ज्वल श्वेत हो जाते हैं। वहाँ मूसा और एलियाह प्रकट होते हैं, जो क्रमशः विधान और नबियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह दृश्य दो महत्वपूर्ण बातों की पुष्टि करता है। पहला, यह येसु की दिव्य पहचान को प्रमाणित करता है - वे केवल एक शिक्षक या नबी नहीं, बल्कि ईश्वर के पुत्र हैं, जो दिव्य महिमा में प्रकट होते हैं। दूसरा, यह उनके शिष्यों के विश्वास को दृढ़ करता है, विशेष रूप से उस चुनौतीपूर्ण मार्ग के लिए जो उन्हें येरूसालेम की ओर ले जाएगा। हम सभी को ऐसे पर्वत-शिखर के अनुभवों की आवश्यकता होती है। जैसे शिष्यों ने येसु के साथ वह क्षण जिया, वैसे ही हमें भी प्रार्थना, आत्मचिंतन, या धर्मग्रंथ के अध्ययन के माध्यम से प्रभु के निकट आने के समय चाहिए - ऐसे क्षण जो हमारे विश्वास को ताज़गी प्रदान करते हैं। प्रश्न यह हैः क्या हम संसार की आवाज़ों को अधिक सुन रहे हैं, या प्रभु की आवाज़ को?

रूपांतरण केवल येसु के परिवर्तन का दृश्य नहीं था, बल्कि शिष्यों के अंतर्मन में भी एक गहन परिवर्तन की तैयारी थी। जब हम प्रभु से सच्चे अर्थों में मिलते हैं, तो हमारा हृदय, हमारे विचार, हमारी भाषा और हमारे कर्म -सब कुछ बदल जाता है। आमेन।

- फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)


📚 REFLECTION

In this powerful passage, we witness a moment of divine revelation — the Transfiguration of Jesus. Jesus takes Peter, James, and John up a high mountain, and before their eyes, His appearance changes: His face shines like the sun, and His clothes become dazzling white. Moses and Elijah appear, representing the Law and the Prophets, speaking with Jesus. This moment is rich in meaning. First, it affirms Jesus’ divine identity. He is not just a teacher or prophet — He is the Son of God, radiant with glory. Second, it strengthens the disciples’ faith as they prepare for the difficult journey to Jerusalem, where Jesus will suffer and die. We All Need “Mountain Moments”

Like the disciples, we need moments of clarity, prayer, and encounter with God — our own “mountain-top” experiences. Whether it's a retreat, a quiet moment in adoration, or reading Scripture, these are times that renew our faith and help us see the bigger picture. Whose voice am I listening to the most — the world’s, or the Lord’s? Transfiguration Leads to Transformation

This vision was not only about seeing Jesus changed — it was about preparing the disciples to be changed too.

When we encounter the Lord, we are transformed — in how we think, act, and love. Amen.

-Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर अपने सामर्थ्य से सब कुछ पूरा कर देता है। जो बातें हम मनुष्य के लिए अंसभव हैं, वह प्रभु के लिए संभव है। हमारी हर परिस्थिति में प्रभु ही हमारा आसरा और भरोशा हैं। हमारी आशा उन पर टिकी रहती हैं। अब्राहम को पता नही था कि वह कहां जा रहा था। अपना सब कुछ छोड़कर एक ऐसे जीवन की ओर आगे बढ़ना जिसका कुछ अता पता न हो। प्रभु ने जो कुछ प्रतिज्ञा की इब्राहिम ने विश्वास किया और आगे बढ़ा, इसलिए वे राष्ट्रों के पिता बनें ।

सुसमाचार के लिए हमें कई कष्ट सहना होगा। हमें हमारे बुलाहट में आगे बढ़ना पड़ेगा। कई प्रलोभन एवं उतार चढ़ाव इस यात्रा के दौरान होगी। हमें हमारी यात्रा जारी रखना हैं। प्रभु पर भरोसा रख, सुसमााचार के लिए कष्ट सहना हैं। प्रभु येसु श्ष्यिों को एक पहाड़ पर यात्रा के लिए ले जाते हैं। येसु का रूपातंरण श्ष्यिों के लिए एक अद््भुत दृृश्य था। प्रभु येसु और नबियों को देखना उनके लिए अंसभव था। शिष्य लोग इस घटना से द्वारा इतने प्रभावित हुए कि वे वहां से जाना नहीं चाहते। प्रभु की शरण मे रहना उनके लिए एक अद्भुत अनुभव था।

- फादर साइमन मोहता (इंदौर धर्मप्रांत)


📚 REFLECTION

God accomplishes everything by his power. The things which are impossible for us humans, are possible for the Lord. In every situation, God is our only reliable support and trust. Our hope rests on him. Abraham did not know where he was going, leaving everything behind, moving forward towards a life that has no end in sight. Abraham believed what the Lord promised and went ahead. So, he became the father of nations.

We have to suffer many things for the sake of the gospel. We have to keep moving forward in our calling. Many temptations and ups and downs will happen during this journey. We have to continue our journey, trusting in the Lord. We have to suffer for the sake of the gospel. Lord Jesus takes the disciples on a journey up a mountain. The Transfiguration of Jesus was a wonderful sight for the disciples. It was impossible for them to look at the glory of the Lord Jesus and the prophets. The disciples were so moved by this incident that they did not want to leave mountain top. It was a wonderful experience for them to be in the shelter of the Lord.

-Fr. Simon Mohta (Indore Diocese)

📚 मनन-चिंतन - 2

प्रभु येसु के रूपांतरण के दौरान शिष्य येसु का स्वर्गीक रूप और महिमा देखते हैं। वे उन्हें मूसा और एलियाह से बातें करते हुये देखते पाते तथा पिता की वाणी, ’’यह मेरा प्रिय पुत्र है इसकी सुनो’’ को सुनते हैं जो येसु को उन्हें अपना पुत्र घोषित करती है। रूपांतरण के दौरान पेत्रुस कहते हैं, ’’प्रभु! यहाँ होना हमारे लिए कितना अच्छा है! आप चाहें, तो मैं यहाँ तीन तम्बू खड़ा कर दूगाँ- एक आपके लिए, एक मूसा और एक एलियस के लिए।’’। (मत्ती 9ः4) पेत्रुस इस दिव्य दृश्य को देखकर भाव-विभोर हो गये थे। वे इससे दूर होना नहीं चाहते थे। वे इस अनुभव को और अधिक लंबा करना चाहते थे। किन्तु यह येसु का उद्देश्य नहीं था क्योंकि इसके बाद ईसा उन्हें पहाड से नीचे ले आते हैं।

रूपांतरण एक भविष्य के सूचक और तैयारी की घटना थी। इसके द्वारा येसु शिष्यों को आगे ले जाना चाहते थे। वे चाहते थे कि शिष्य उन्हें पहचाने तथा उनका विश्वास सांसारिक घटनाक्रम से विचलित न हो।

येसु उन्हें बताना चाहते थे कि उनका भावी दुखभोग पिता की योजना और इच्छा है। येसु चाहते थे कि शिष्य इस दुखभोग और मरण में ईश्वर की उपस्थिति को देखे तथा समझे। येसु ने स्वयं के दुखभोग एवं क्रूसमरण को पिता की इच्छा मानकर स्वीकार किया तथा वहन भी किया। जब हम अपने जीवन में दुख झेलते हैं तो शायद हम दुखित हो जाते हैं। हम दूसरों पर दोष लगाते तथा कुढकुढाते है। ऐसी स्थिति में अपने ईश्वर को भूल जाते हैं। किन्तु इस रूपांतरण की घटना हमें सिखाती है कि जीवन के दुखों तथा अभावों को हमें ईश्वर की योजना से जोडकर तथा उसे पिता ईश्वर को समर्पित कर उसे ईश्वर की इच्छा मानकर उसे ख््राीस्तीय साहस के साथ स्वीकार करना है।

- फादर रोनाल्ड वाँन


📚 REFLECTION

During the transfiguration the apostles Peter, James and John see the heavenly glory of Jesus. They see and hear Moses and Elijah talking to Jesus about his impending suffering and death and the voice of the Father declaring, ‘this is my beloved son, listen to him.’ Peter was wonderstruck by the turn of events. He didn’t know what to say, yet he says, “it is good be here, we shall raise three tents, one for you and one for Moses and Elijah. Peter wanted to prolonged this experience. He didn’t want it to end soon. But the Lord had something specific purpose and lessons to be taught. He led them back to plain.

Transfiguration was symbolic and forward looking event. It was meant to prepare the apostles for the suffering and death of Jesus. Jesus wanted them to learn that his suffering and death is the part of God’s plan and is the will of the father.

When we see suffering from God’s point of view we would find great comfort and consolation in life during our trials. However if we grumble and indulge in blame game then it produces deep sorrow and bitterness in life. We need to challenge our mind set and remind that all our sufferings are not hidden from God. We ought to see the hand of God present in our present situation and circumstances. And believe that he would do everything to rescue us.

-Fr. Ronald Vaughan

प्रवचन - 01

येसु का रूपांतरण शिष्यों के येसु से मुलाकात तथा उन्हें पहचानने की घटना थी। इस घटना में शिष्य पेत्रुस, योहन और याकूब येसु के दिव्य रूप को देखते हैं। वे उन्हें मूसा और एलियाह से बातें करते हुये देखते और सुनते हैं। वे पिता की वाणी को सुनते हैं जो येसु को उन्हें अपना पुत्र घोषित करती है। येसु के रूपांतरण के दर्शन करना तथा उन दिव्य घटनाक्रमों के साक्षी बनना एक संयोग नहीं थी बल्कि सुनियोजित योजना थी। येसु स्वयं इन तीनों शिष्यों को लेकर पहाडी पर चढे थे। वे चाहते थे कि ये तीनों शिष्य उनके वास्तविक दिव्य रूप को पहचाने तथा उसके अनुसार अपने आप को भविष्य में होने वाली घटनाओं के लिये तैयार करें।

येसु मूसा और एलियाह से ’’महिमा-सहित प्रकट हो कर येरूसालेम में होने वाली उनकी मृत्यु के विषय में बातें कर रहे थे।’’ (लूकस 9:31) शिष्य भी इस आने वाले दुखभोग एवं मरण की बातें सुनते हैं। इस वार्तालाप के द्वारा शिष्यों को इस बात का अहसास दिलाना था कि येसु को जब दुख भोगना, क्रूस उठाना तथा कलवारी पर मरना पडे तो उनका विश्वास न टूटे। यह सब पिता की इच्छानुसार पूर्व-निर्धारित घटना होगी। येसु जानते थे कि उनका दुखभोग एक साधारण घटना मात्र नहीं होगी। इससे अनेकों का विश्वास हिल जायेगा। किन्तु जो येसु को ’ईश्वर के पुत्र’ होने में विश्वास करते हो वे इस दौरान भी अपना विश्वास बनाये रखेंगे। इस दिव्य आध्यात्मिक अनुभव के द्वारा इन तीन शिष्यों का येसु में विश्वास अन्यों की अपेक्षा कहीं अधिक गहरा होना चाहिये था क्योंकि उन्होंने स्वयं इस अद्धितीय रूप को देखा था।

संत पेत्रुस अपने पत्र में इस घटना के अनुभव को विश्वास का महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हैं तथा लोगों को विश्वास के लिये प्रेरित करते हुये लिखते हैं, ’’जब हमने आप लोगों को अपने प्रभु ईसा मसीह के सामर्थ्य तथा पुनरागमन के विषय में बताया, तो हमने कपट-कल्पित कथाओं का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपनी ही आंखों से उनका प्रताप उस समय देखा, जब उन्हें पिता-परमेश्वर के सम्मान तथा महिमा प्राप्त हुई और भव्य ऐश्वर्य में से उनके प्रति एक वाणी यह कहती हुई सुनाई पड़ी, ’यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।’’ (2 पेत्रुस 1:16-17)

येसु हमारे जीवन में भी हमें उनके दिव्य रूपांतरण का अनुभव कराते हैं। ये वे घटनायें होती हैं जब हम येसु से मिलते, उनका अनुभव करते तथा उनको ईश्वर के रूप पहचानते हैं। ऐसे अनुभव हमारे जीवन में गहरा प्रभाव डालते हैं। वे हमारी सोच तथा दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं तथा हमें आंतरिक बल प्रदान करते हैं जिससे हम जीवन की चुनौतियों को सामना ख्रीस्तीय विश्वास एवं मूल्यों के साथ कर सकें। ये घटनायें हमें वर्तमान में सांत्वना देती, भविष्य के लिये तैयार करती तथा हमारे विश्वास को नये आयाम पर ले जाती है।

हम पवित्र बाइबिल में कई ऐसी घटनाओं को पाते हैं जब ईश्वर ने अपने चुने हुये लोगों को अपना सामर्थ्य तथा दिव्य अनुभव कराया।

दाउद जब नवयुवक थे तो उन्होंने गोलियत नामक योद्धा से लडने की इजाजत मांगी। किसी को भी विश्वास नहीं था कि नवयुवक दाउद गोलियत के सामने टिक भी सकेगा। किन्तु दाउद राजा साउल को अपने ईश्वर अनुभव की बात बताते हुये कहते हैं कि किस प्रकार ईश्वर ने उनकी जंगली जानवरों से रक्षा की और कैसे वही ईश्वर उनको गोलियत से भी बचायेगा। ’’आपका यह दास जब अपने पिता की भेड़ें चराता था और कोई सिंह या भालू आ कर झुण्ड से कोई भेड़ पकड़ ले जाता, तो मैं उसके पीछे जा कर उसे मारता और उसके मुँह से उसे छीन लेता था और यदि वह मेरा सामना करता, तो मैं उसकी अयाल पकड़ कर उस पर प्रहार करता और उसे मार डालता था। आपके दास ने तो सिंहों और भालूओं को मारा है। इस बेखतना फिलिस्ती के साथ भी ऐसा ही होगा, .....प्रभु ने मुझे सिंह और भालू के पंजे से बचा लिया। वह मुझे उस फिलिस्ती के हाथ से भी बचायेगा।’’ (1समुएल 17:34-37)

दाउद ने अपने ईश्वर अनुभव में ईश्वर को पहचाना तथा उसी पहचान एवं अनुभव के द्वारा उन्होंने जीवनभर ईश्वर के विश्वस्त सेवक रहकर सेवा की। अपने स्तोत्र में ईश्वर को चरवाहे के रूप में प्रस्तुत करते हुये कहते हैं, ’’प्रभु मेरा चरवाहा है,.... चाहे अँधेरी घाटी हो कर जाना पड़े, मुझे किसी अनिष्ट की शंका नहीं, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है। मुझे तेरी लाठी, तेरे डण्डे का भरोसा है।’’ (स्तोत्र 23:1,2)

उत्पति ग्रन्थ में याकूब की ईश्वर से भिंडत की घटना इस सच्चाई को बडे प्रभावशाली रूप प्रस्तुत करती है। जब याकूब अपने बडे भाई एसाव से धोखा करता है तो उसका भाई उसे जान से मारना चाहता था। इस कारण वह घर से भाग कर अपने मामा लाबान के यहॉ शरण लेता है। कई वर्ष बीत जाने के बाद वह अपने परिवार के साथ घर लौटना चाहता था। किन्तु उसमें अपने भाई का भीषण भय छा जाता है। याकूब रात में ईश्वर से आशिष के लिये प्रार्थना करता है। काफी जद्दोजहद के बाद जब ईश्वर उसे आशिष और नया नाम प्रदान करते हैं तो याकूब नये आत्म-विश्वास के साथ अपने क्रोधित भाई से मिलने जाता है। याकूब की ईश्वर से यह मुलाकात काफी गहरी थी। अपने इस ईश्वरीय अनुभव के कारण उसे डर और अनिश्चिता पर विजय प्राप्त करने में मदद मिली। (देखिये उत्पत्ति 32:23-33)

आज के पहले पाठ में अब्राम के बुलावे का वर्णन मिलता है। ईश्वर ने उसे अविस्मणीय पुरस्कार की प्रतिज्ञा की तथा उससे कहा, ’’अपना देश, अपना कुटुम्ब और पिता का घर छोड़ दो और उस देश जाओ, जिसे मैं तुम्हें दिखाऊँगा।’’ (उत्पत्ति 12:1) अब्राम के लिये यह आसान बात नहीं होगी; किन्तु उसने ईश्वर की वाणी जिसमें उसे प्रतिज्ञायें की गयी थी को कभी भुलाया नहीं। उनकी इस यात्रा में अनेक उतार-चढाव आये किन्तु इब्राहीम सदैव दृढ बना रहा। अब्राम ने इन असंभव सी प्रतीत होने वाली प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने के लिये हमेशा ईश्वर की इस प्रतिज्ञा को आधार बनाया। क्योंकि वह जानता था कि ईश्वर सत्यप्रतिज्ञ है तथा अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में समर्थ है। इब्राहिम के विश्वास की प्रशंसा करते हुये इब्रानियों के नाम पत्र कहता है, ’’विश्वास के कारण इब्राहीम ने ईश्वर का बुलावा स्वीकार किया और यह न जानते हुए भी कि वह कहाँ जा रहे हैं, उन्होंने उस देश के लिए र्प्रस्थान किया, जिसका वह उत्तराधिकारी बनने वाले थे।’’ (इब्रानियों 11:8) ईश्वर के अनुभव के बल पर वे सदैव वफदार और ईमान बने रहे। इसलिये वे प्रकार विश्वास में वे हमारे पिता माने जाते हैं।

रूपांतरण हमें सिखाता है कि हमें हर परिस्थिति में येसु में विश्वास बनाये रखना चाहिये तथा उनके साथ बने रहना चाहिये। स्मरण रहें कि, ’’विश्वास के अभाव में कोई ईश्वर का कृपापात्र नहीं बन सकता।’’ (इब्रानियों 11:6)। हमारे जीवन के दुखभोग के द्वारा ही हम ख्रीस्त की महिमा को प्राप्त कर सकते हैं। आईये हम पिता की आज्ञा, ’’यह मेरा प्रिय पुत्र है इसकी सुनो’’ का पालन करे।

- फादर रोनाल्ड वाँन

प्रवचन - 02

आज के पाठों पर यदि हम गहन-मनन्-चिन्तन करते हैं तो विषय-वस्तु के रूप में हम रूपान्तरण, परिवर्तन व बदलाव पाते हैं।

गुरू अब्राहाम टवेरस्की अपने परदादे की कहानी बताता है जो अन्य गुरूओं के साथ तालमूद (यहूदी विधि-संग्रह) सीख रहा था। जलपान के लिए सीखने की कार्य को स्थगित करने का निर्णय लिया गया। कोई एक समुह जलपान खरीदने के लिए पैसा देने को तैयार हो गया। पर वहॉ कोई ऐसा शक्स नहीं था जो जलपान के लिए कुछ खरीद कर लाये। टवेरस्की के अनुसार उसके किताब Generation to Generation में उसके परदादे ने कहा-‘‘पैसा मुझे दे दो मेरा एक लड़का है जो जलपान के समान लाने जाने के लिए खुश होगा।

काफी समय गुजर जाने के बाद वह अन्त्तः जलपान के सामग्री लिए वापस आया। सबने देखा कि वह गुरू ने स्वयं जाकर यह कार्य किया। यह देखकर उन्हें बहुत बुरा लगने लगा। उनकी बेचैनी देखकर गुरू ने उन्हे समझाया-‘‘शायद मैंने आपलोगों को पथभ्रष्ट तो नहीं किया। देखिये कई लोग अपने यौवन में ही बुढ़ापा महसूस करने लगते हैं और वे वास्तव में बुजुर्ग बन जाते हैं। हमने कभी अपने यौवन की उत्साह, जोस और मिज़ाज को नहीं छोड़ा है। जैसे-जैसे मैं सज्जन होता गया मैं हमेंशा अपना जवान लड़के को साथ लेता रहा जो मैं था। यह काम उसी जवान लड़के ने जो मुझमें है, किया।’’

हमारा रूपान्तरण, बदलाव या परिवर्तन हमारे मनोवृत्ति, प्रवृति या सोच के बदलाव से शुरू होता है। संत आगस्टीन जो बहुत ही अनैतिकता का जीवन बिता रहा था उसे ईश्वरीय-अनुभव हुआ और वह पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया। जिन चीजों, घटनाओं एवं व्यक्तियों को वह पहले बहुमूल्य समझता था अब सबकुछ निर्मूल्य हो गया था। उसी प्रकार के परिवर्तन हम असीसी के संत फ्रांसिस में पाते हैं। उसके पिताजी बहुत बड़े व्यापारी थे। इसलिए फ्रांसिस को किसी प्रकार की कुछ भी कमी नहीं थी। लेकिन ईश्वर-अनुभव ने उसे पूर्ण रूप से रूपान्तिरित कर दिया। धन-दौलत, सौहरत सब कुछ मूल्यहीन और निरर्थक सिद्ध हुआ।

आज का प्रथम पाठ जो कि उत्पत्ति ग्रन्थ से लिया गया है ईश्वर के बुलाहट और अब्राम के बेझिझक प्रतिउत्तर को दर्शाता है। यह अब्राम और ईश्वर की पहली मुलाकात थी। यह पहली मुलाकात अब्राम को बेधर्मी से धर्मी और आविश्वास से सच्चे ईश्वर में विश्वासी बना दिया। अब्राम के पास सब कुछ था-जमीद-जयदाद, मवेशी। पर एक बात की कमी थी। उसका कोई संतान नहीं था। यह कमी सबकुछ होने के बावजूद खलती थी। क्योंकि उस समय एवं परिस्थियों के अनुसार सबसे विशाल कमी यही होती थी। अब्राम की ईश्वर के साथ इस मुलाकात में ईश्वर अब्राम के लिए एक चुनौति व अहवान दिया कि अब्राम के जरिये एक महान राष्ट्र उत्पन्न करेगा। इसके लिए ईश्वर की मांग असीम रही। अब्राम को अपना देश, अपना कुटुम्ब, अपने पिता का घर छोड़ना पड़ा। उसे अपना सपना, अपनी योजना, अपनी इच्छा एवं अपना विचार त्यागना पड़ा। संक्षेप में कहा जाए तो सब कुछ छोड़ना पड़ा। उनके विश्वास में बेझिझक उत्तर उसे विश्वास के पिता बना दिया। याने अब्राम ने सबकुछ त्याग दिया। अन्ततः उसे एक पुत्र हुआ। ईश्वर ने उसे भी बली चढ़ाने के लिए कहा। अब अब्राम पूर्ण रूप से बदल गया था। उनके विश्वास में बेझिझक उत्तर उसे विश्वास के पिता बना दिया। उसका नाम अब्राम से अब्राहाम हो गया। वह ईश्वर के चुनी हुई प्रजा का पिता बन गया। अब अब्रहाम की मनोवृति, प्रवृति एवं सोच बदल चुकी थी। इस प्रकार वह अपनी पुरानी जीवन-शैली त्याग कर पूर्ण रूप से ईश्वर के लिए समर्पित हो गया। तो अब्राहाम का रूपान्तरण या परिवर्तन ईश्वर के साथ भेंट से आरम्भ हुआ। ईश्वर का अब्राहाम के साथ मुलाकात अब्राहाम को पूर्ण रूप से परिवर्तन कर दिया।

आज के सुसमाचार में हमने येसु के रूपान्तरण के बारे में सुना। जब येसु प्रार्थना कर रहे थे तो येसु का रूपान्तरण हो गया। उनका मुखमंडल सूर्य की तरह दमक उठा और उनके वस्त्र प्रकाश के समान उज्जवल हो गये। यह हमें याद दिलाता है कि मुसा एवं एलियस की भी ईश्वर से मुलाकात में रूपान्तरण हुआ था (निर्गमन ग्रन्थ 3:14 एवं 34:29-35)। दोनों रूपान्तरण घटना में दोनों की ईश्वर से भेंट होती है। पुनः इस रूपान्तरण घटना में ईश्वर की उपस्थिति को देखते हैं। बादल से यह वाणी सुनाई पड़ी, ‘‘यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हॅूं; इसकी सुनो। ये वही वाणी हैं जो येसु के बापतिस्मा के समय सुनाई पड़ी थी। अतः यह येसु के रूपान्तरण के अर्थ को स्पष्ट कर जाती है कि ईश्वर येसु को अपने पुत्र के रूप में प्रटक करता है। ईश्वर का प्रिय जिससे ईश्वर अत्यन्त प्रसन्न है। अतः हमें उनकी सुननी चाहिए।

येसु के रूपान्तरण के समय मूसा और एलियस येसु से बात करते दिखाई देते है। संभवताः यह हो सकता है कि वे येसु के दुःखभोग, मरण और पुनरूत्थान के बारे में पिता ईश्वार की योजना के बारे में जिक्र कर रहे थे। येसु के रूपान्तरण से येसु के शिष्यों की मसीह की जो धारणा थी बदली होगी। क्योंकि इस घटना से येसु ईश्वर होने की झलक उन्हें प्राप्त हुआ। साथ-ही- साथ यह येसु के पुनरूत्थान की भी झलक थी। इसे येसु के शिष्य को पुनर्जिवित प्रभु येसु में विश्वास करने में मद्द सिद्ध होगी।

आज के दूसरे पाठ हमारे परिवर्तन व बदलाव के लिए आहवान है। यह पाठ हमें याद दिलाता है कि हम पवित्र जीवन बिताने के लिए बुलाये गयें हैं। पवित्रता का जीवन बिताने के लिए हमें काफी परिवर्तन एवं संयम की आवश्यकता है। इसी परिवर्तन व बदलाव के लिए तो हमारे चालीसा काल हमें प्रेरणा देती है। कुल मिलाकर यदि आज के पाठों और घटनाओं एवं चालीसा काल देखा जाए तो हमें एक ही संदेश मिलता है कि हमें परिवर्तन व बदलाव की आवश्यकता है। इसकी शुरूआत हमारे सोच से, विचार से, मनोवृतियों व प्रवृतियों से होती है। वदलाव व परिवर्तन में त्याग निहीत होती है। अब्राहाम को सबकुछ छोड़ना पड़ा था। उसी प्रकार हमें भी बहुत कुछ त्यागने व छोड़ने की आवश्यकता है। कोई भी बातों व चीजों को छोड़ना व त्यागना इतनी आसान नहीं होती है। जब हम कोई भी चीजों को छोड़ते व त्यागते हैं तो हमें दर्द महसूस होती है। अपितु यदि हमें बदलना है, परिवर्तन होना है तो हमें त्याग करना अनिवार्य है। अतः हमें उन सभी चीजों को त्यागना है जो ईश्वर को अप्रिय है, जो ईश्वर से हमें अलग करती है या जो हमें ईश्वर के विरूद्ध ले जाता है। उनको त्याग कर ही हम पवित्रता का जीवन बिता सकते है। उनको त्याग कर ही हम ईश्वर के करीब आ सकते हैं।

तो आइये प्रिय भाइयो-बहनों आज के पूजन समारोह में हम ईश्वर से यह कृपा मांगे कि जिन बातों व चीजों को त्याने की आश्वयकता है हम उसे त्याग सकें।

-फादर जीवन किशोर तिर्की