
उन्होंने कहा, “आओ ! हम येरेमियस के विरुद्ध षड्यंत्र रचें। पुरोहितों से शिक्षा मिलती रहती है,' बृद्धिमानों से सत्परामर्श और नबियों से भविष्यवाणी। आओ ! हम उस पर झूठा आरोप लगायें, हम उसकी किसी भी बात पर ध्यान न दें।” हे प्रभु ! तू मेरी पुकार सुन, तू मेरे विलाप पर ध्यान दे। क्या भलाई के बदले में बुराई करना उचित है? उन्होंने तो मेरे लिए गर्त्त खोदा है। याद कर कि उनके पक्ष में बोलने और उन पर से तेरा क्रोध दूर करने के लिए मैं तेरे सामने खड़ा रहा।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : हे प्रभु ! तू दयासागर है। मुझे बचाने की कृपा कर।
उन्होंने मेरे लिए जो जाल बिछाया है, तू मुझे उस से छुड़ा, क्योंकि तू ही मेरा सहारा है। मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों सौंप देता हूँ। हे प्रभु ! तू ही मेरा उद्धार करेगा।
मैं लोगों की निन्दा सुनता रहता हूँ, मैं चारों ओर आतंक से घिरा हुआ हूँ। वे मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रचते हैं, वे मुझे मार डालना चाहते हैं।
हे प्रभु ! तुझ पर ही मेरा भरोसां है। मैंने कहा, तू ही मेरा ईश्वर है। तेरे ही हाथों मेरा भाग्य है। शत्रुओं और अत्याचारियों से मुझे बचा।
प्रभु कहते हैं, "संसार की ज्योति मैं हूँ। जो मेरा अनुसरण करता है, उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी।”
येसु येरुसालेम के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। बारहों को अलग ले जा कर उन्होंने रास्ते में उन से कहा,’‘ देखो, हम येरुसालेम जा रहे हैं। मानव पुत्र महायाजकों और शास्त्रियों के हवाले कर दिया जायेगा। वे उसे प्राणदण्ड की आज्ञा सुना कर ग़ैरयहूदियों के हवाले कर देंगे, जिससे वे उसका उपहास करें, उसे कोड़े लगायें और क्रूस पर चढ़ायें; लेकिन तीसरे दिन वह जी उठेगा।” उस समय जेबेदी के पुत्रों की माता अपने पुत्रों के साथ येसु के पास आयी और उसने दण्डवत् करके उन से एक निवेदन करना चाहा। येसु ने उस से कहा, “क्या चाहती हो? '' उसने उत्तर दिया, “ये मेरे दो बेटे हैं। आप आज्ञा दीजिए कि आपके राज्य में एक आपके दायें बैठे और एक आपके बायें।” येसु ने उन से कहा, “तुम नहीं जानते कि क्या माँग रहे हो। जो प्याला मैं पीने वाला हूँ, क्या तुम उसे पी सकते हो? '' उन्होंने उत्तर दिया,’‘हम पी सकते हैं।”' इस पर येसु ने उन से कहा,’‘ मेरा प्याला तो तुम पिओगे, किन्तु तुम्हें अपने दायें या बायें बैठने देने का अधिकार मेरा नहीं है। वे स्थान उन लोगों के लिए हैं, जिनके लिए मेरे पिता ने उन्हें तैयार किया है।” जब दस प्रेरितों को यह मालूम हुआ, तो वे दोनों भाइयों पर क्रुध हो गये। येसु ने अपने शिष्यों को अपने पास बुला कर कहा, “तुम जानते हो कि संसार के अधिपति अपनी प्रजा पर निरंकुश शासन करते हैं और सत्ताधारी लोगों पर अधिकार जताते हैं। तुम में ऐसी बात नहीं होगी। जो तुम लोगों में बड़ा होना चाहे, वह तुम्हारा सेवक बने और जो तुम में प्रधान होना चाहे, वह तुम्हारा दास बने; क्योंकि मानव पुत्र भी अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने तथा बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है।”
प्रभु का सुसमाचार।
क्योंकि मानव पुत्र भी अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने तथा बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है।
जब येसु अपने दुःखभोग और मरण की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्होंने एक बार फिर अपनी पीड़ा के बारे में बताया। लेकिन उनके शिष्य अब भी इस सोच में थे कि उन्हें येसु के राज्य में कौन-सा ऊँचा पद मिलेगा। याकूब और योहन ने, अपनी माँ के ज़रिए, येसु से विषेष जगह माँगी। लेकिन येसु हमें एक अलग रास्ता दिखाते हैं -विनम्रता और दूसरों के लिए त्याग से भरे प्रेम का रास्ता। ईश्वर के राज्य में असली महानता किसी ओहदे या ताकत से नहीं, बल्कि येसु की तरह प्यार और नम्रता से सेवा करने में है। इस दुनिया में जहाँ ज़्यादातर लोग ताकत और पहचान चाहते हैं, येसु हमें बुलाते हैं कि हम चुपचाप दूसरों की मदद करें।आज आप किसी की सेवा करने का एक तरीका चुनिए -जैसे किसी दुखी दोस्त की बात सुनना, किसी ज़रूरतमंद की मदद करना, या बिना नाम बताए कोई अच्छा काम करना। जब हम सेवा करते हैं, तब हम येसु जैसे बनते हैं।
हे प्रभु येसु, आप इस दुनिया में दूसरों की सेवा करने आए, ना कि खुद सेवा पाने के लिए। मुझे सिखाइए कि मैं भी आपके रास्ते पर चल सकूँ -प्रेम, विनम्रता और खुले हृदय से सेवा कर सकूँ। आमेन।
✍ - फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)
"The Son of Man came not to be served but to serve, and to give his life as a ransom for many." (Matthew 20:28)
As Jesus journeys toward His Passion, He speaks again of His suffering and death. Yet the disciples are still thinking about power and positions. James and John, through their mother, ask for places of honor in Jesus’ kingdom. But Jesus teaches a different path—the path of humble service and self-giving love. True greatness in the Kingdom of God is not about authority or status, but about serving others with love and humility, just as Jesus did. In a world that values power and recognition, Jesus calls us to serve. Today, choose one way to serve someone around you—listen to a hurting friend, help someone in need, or do a small act of kindness without seeking credit. In serving, we become more like Christ. Lord Jesus, You came to serve, not to be served.
Teach me to follow Your example. Help me to serve with love, humility, and a generous heart. Amen.
✍ -Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)
दुष्ट व्यक्ति दूसरों का बुरा सोचते और बुरा ही करते हैं। ऐसे ही सोच के कुछ दुष्ट लोग नबी येरेमियाह के विरूद्ध षड़यंत्र रचते हैं। वे उनकी किसी भी बात पर ध्यान नहीं देते और उन पर झुठा आरोप लगाते हैं। नबियों पर दोष लगाना एवं उनके विरूद्ध षड़यंत्र रचना उनके शत्रु के लिए सामान्य बात बन चुकी थी। फिर भी नबी इन लोगों के लिए प्रभु ईश्वर से विनय करते हैं, ताकि प्रभु का क्रोध उन पर से हट जाये।
प्रभु येसु भी अपने मार्ग पर येरूसालेम की ओर आगे बढ़ रहे थे। वे उनके शिष्यों से अपने विरू़द्ध होने वाले षड़यंत्र के बारे में जिक्र करते हैं, और अपने दुःख भोग की भविष्यवाणी करते हैं। जेबेदी के पुत्रों की माता अपने पुत्रों का सांसारिक राज्य में अधिकारी बनाना चाहती है। प्रभु चाहते हैं कि हम सेवक बनें क्योंकि वे स्वयं सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने आये।
✍ - फादर साइमन मोहता (इंदौर धर्मप्रांत)
Wicked people think bad of others and do only bad. Some evil people with similar thinking hatch a conspiracy against Prophet Jeremiah. They do not pay attention to any of his words, but make false allegations against him. Blaming the prophets and plotting against them had become common for their enemies. Yet, the prophets pray to the Lord God for these people, so that the anger of the Lord may turn away from them.
The Lord Jesus was moving towards Jerusalem on his way. He tells his disciples about the conspiracy against him, and predicts his suffering. But the mother of Zebedee's sons wants to make her sons possessors in the earthly kingdom. The Lord wants us to be servants because He Himself did not come to be served but to serve.
✍ -Fr. Simon Mohta (Indore Diocese)
येसु के शिष्य अक्सर इस बारे में चर्चा करते थे कि उनमें से सबसे बड़ा कौन था। चूँकि वे अक्सर येसु के अधिकार को भौतिक और राजनीतिक समझते थे, इसलिए वे येसु द्वारा स्थापित किए जाने वाले राज्य में अपने पदों के बारे में भी चिंतित थे। येसु ने उन्हें मानव राज्य और ईश्वरीय राज्य के बीच का अंतर दिखाने की कोशिश की। शिष्य सांसारिक राज्य के मूल्यों के बारे में चिंतित थे जबकि ईश्वर के राज्य के मूल्य पूरी तरह से अलग थे। इसलिए प्रभु येसु उन्हें पदों को हासिल करने के बजाय दूसरों की सेवा करने में एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने की चुनौती देता है। आत्म-रिक्त होना ही शिष्यता का मार्ग है। यही रास्ता येसु ने दिखाया था। यही कारण है कि संत पौलुस ने फिलिप्पियों को स्वयं को दीन-हीन बनाने वाले मसीह के मनोभाव को अपनाने को कहा (देखें फिलिप्पियों 2:5-11)। येसु ने शिष्यों को यह भी सिखाया कि ईश्वर के राज्य में अधिकार केवल सेवा करने के लिए है, न कि दूसरों पर अधिकार जताने के लिए। आइए, हम मसीह के शिष्यों के रूप में ईश्वर के राज्य में महान गिने जाने के लिए क्रूस के मार्ग पर चलें।
✍ - फादर फ्रांसिस स्करिया
The disciples of Jesus often discussed about who among them was the greatest. Since they often misunderstood the authority of Jesus as something material and political they also bothered about their positions in the kingdom to be established by Jesus. Jesus tried to show them the contrast between the human kingdom and the divine kingdom. The disciples were bothered about the values of the earthly kingdom while the values of the kingdom of God were totally different. He therefore challenges to compete with each other in serving others rather than securing positions. Self-emptying is the way of discipleship. That was the way shown by Jesus. That is why St. Paul wrote to the Philippians to cultivate in themselves the mind of the self-emptying Christ (cf. Phil 2:5-11). Jesus also taught the disciples that the authority in the Kingdom of God is purely for service, not for lording it over others. As disciples of Christ let us walk the way of the cross to be counted great in the kingdom of God.
✍ -Fr. Francis Scaria
येसु तीसरी बार अपने निकटत्तम दुखभोग, क्रूसमरण तथा पुररूत्थान की घोषणा करते हैं। इस सुस्पष्ट तथा विस्तृत बातों से येसु इस बात को स्पष्ट करना चाहते थे कि उनका दुखभोग तथा क्रूस पर मरना एक संयोग और आकस्मिक नहीं वरन एक पूर्व-निर्धारित घटना होगी। इस पूर्व-घोषणा का मुख्य उद्देश्य यह था कि शिष्यगण इस घटनाक्रम से किसी भी प्रकार से हतोसाहित एवं विचलित न हो बल्कि विश्वास करे कि अंत में सबकुछ वैसा ही होगा जैसा कि येसु ने उन्हें पूर्व-सूचित किया था।
येसु का दुखभोग एवं मरण ईश्वर की मुक्तिदायक योजना का अभिन्न अंग था। येसु इस मुक्तिदायक योजना को पूरा करने आये थे। इसलिये उन्होंने स्वेच्छा एवं पूर्ण चेतना के साथ योजना को स्वीकारा तथा पूर्णता तक पहुंचाया। फिलिप्पियों के नाम पत्र से वचन इस बात का साक्ष्य तथा संक्षेप में प्रस्तुत करते हुये कहता है, ’’वह वास्तव में ईश्वर थे और उन को पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें, फिर भी उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया और उन्होंने मनुष्य का रूप धारण करने के बाद मरण तक, हाँ क्रूस पर मरण तक, आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन बना लिया।’’ (फिलिप्पियों 2ः6-8) येसु की बारी में प्राण-पीडा पुनः इस बात को प्रतिपादित करती हैं कि येसु ने पूर्ण ज्ञान, स्वतंत्रता एवं स्वेच्छा से इस योजना को अपनाया। येसु ने पिता द्वारा निर्धारित दुःखभोग के प्याले का पीना स्वीकारा।
✍ - फादर रोनाल्ड वाँन
Jesus announces to his disciples for the third time about his impending condemnation, suffering, crucifixion and rising from the death. By these explicit details Jesus makes it clear that his suffering and eventual death are not accidental but it would be an incident. Jesus foretold these things so that when they occur it should not be a scandal to the disciples. Their must not get devastated with the sudden turn of events but rather have faith to hold on till the end.
The passion and death were the part of the salvific plan of God. Jesus came to live up it. It was not easy to be rejected, betrayed, suffered and crucified but Jesus willingly and with complete consciousness accepted and accomplished the work. The verses from letter to the Philippians testify and summarize the willing sacrifice of Jesus “Though he was in the form of God, did not regard equality with God…, but emptied himself, taking the form of a slave, being born in human likeness. And being found in human form, he humbled himself and became obedient to the point of death—even death on a cross.” (Philippians 2:6-8). The agony at the garden of Gethsemane bears the testimony how Jesus was fully aware of what lies ahead as well as his freedom to choose. He chose what had been determined by the father.
✍ -Fr. Ronald Vaughan